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Friday, 13 November 2009

ये प्रेम कहानी का सुखद अंत है

आज मैं जब सिनेमाहॉल पहुंचा तो हिसाब से मुझे इमरान खान और सोहा अली की तुम मिले मूवी देखनी चाहिए थी। लेकिन इस बार हालात कुछ जुदा थे। नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के भय और प्रलय के लम्बे-चौड़े पोस्टर देखकर मेरी पिछले तीन रोज से ही इच्छा हो रही थी कि इस बार बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड में किस्मत आजमाई जाए कि कितना मजा आता है। यूं मेरे लिए हॉलीवुड फिल्म देखना कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले तीन माह के अरसे में मैंने कोई हॉलीवुड फिल्म नहीं देखी थी या शायद कोई फिल्म ऐसी नहीं आई थी, जिसके सदके मैं सिनेमाहॉल में बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड फिल्म की अंग्रेजीदा टिकट खिड़की की ओर मुड़ता। फिर एक बात और, कि हालिया जब इमरान खान और शरमाती हुई सोहा अली होटल रामाडा में जयपुर के मीडिया से रूबरू हो रही थीं तो एक मौका हमें भी मिला और हमने भी उनकी एक झलक देख ली, इसलिए आधी उत्सुकता वहीं ढेर हो गई और इस बार हमने हिम्मत दिखाकर पलय-२०१२ का टिकट खरीद लिया। सहीं कहें जनाब, हिंसा के ढेर सारे सीन और धरती में उथल-पुथल की ये घटनाएं हमें सहज कम बनावटी अधिक दिखीं, दूसरे शब्दों में प्रलय का ये नजारा इमेजिनेशन की हदों को पार करने वाला था। वैसे हमारी हिन्दी फिल्मों में इस तरह के दृश्यों की कभी कल्पना भी नहीं की जाती और सैट पर इतना खर्चा करने की बात सुनकर शायद डायरेक्टर-प्रोड्यूसर फिल्म बनाने का इरादा ही मुल्तवी कर दें। इसलिए फिल्म को युवाओं के एक बड़े वर्ग ने सराहा और कहानी की रफ्तार की प्रशंसा की। मैं भी फिल्म में एक के बाद एक बदलते सीन्स और कॉमेडी को देखकर सुखद आश्चर्य महसूस कर रहा था। लेकिन फिर भी ये फिल्म मुझे इतनी अच्छी नहीं लगी, जितनी कि पिछले हफ्ते राजकुमार संतोषी की अजब प्रेम की गजब कहानी लगी थी। इस फिल्म को देखकर पहली नजर में ही कहा जा सकता है कि राजकुमार संतोषी की दर्शकों पर गहरी पकड़ है और वे यह भी जानते हैं कि फिल्म देखने के लिए मल्टीप्लेक्स में केवल ११वीं क्लास से लेकर यूजी फाइनल ईयर के स्टूडेंट ही जाते हैं, जिनके साथ यदि उनकी गर्लफ्रेंड होती है तो वे जरूर पिछली कतार में कोने की सीट कबाड़ते हैं और ऐसे मनचले किशोर युवाओं की संख्या अब कमतर विकसित शहरों में भी बढ़ रही है। निर्जीव पात्र के जरिए पत्रकार को सुनाते हुए कहानी की शुरुआत ही ऐसे हसोड़ सीन से होती है, जहां पांच युवाओं के हैप्पी क्लब का प्रेसिडेंट बिना ब्रेक वाली साइकिल पर सवार है। जो कि एक डाकू को पकड़वाने में सहायक बनता है। प्रेसिडेंट के इस किरदार को रणबीर कपूर ने बड़ी शिद्दत से निभाया है और यह सीधे युवाओं के दिल में उतरता है। कैटरीना कैफ की एंट्री बिल्कुल नेगेटिव तरीके से होती है, जो हैप्पी क्लब के नेक कार्य करने के इरादों से इस कदर प्रभावित होती है कि रणबीर से दोस्ती करना मंजूर कर लेती है। एकतरफा प्यार में डूबे रणबीर के लिए यह बात जन्नत की एक झलक पा लेने से कम नहीं होती। ख्वाबों में डूबा वह हर वो काम करने की कोशिश करता है जो कैटरीना पसंद करे। लिहाजा एक महीने तक शेफ की नौकरी करने पर भी उसे गुरेज नहीं होता। कहानी में ट्विस्ट तब पैदा होता है जब कैटरीना बगैर कुछ बताए गोवा निकल जाती है। यहां सड़क पर पैदा हुई अनाथ कैटरीना को उसके पालने वाले माता-पिता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए एक अमीर गोवानी के हवाले कर देना चाहते हैं जो उसे अपने साथ शादी नहीं करने पर उसके साथ जबरजिना करने के अपने धृष्ट और घृणित इरादे भी जता देता है। प्यार में नो डिमांड नो कम्प्लेंट का उसूल रखने वाले रणबीर और उसकी मित्र मंडली के सखा ऐन वक्त पर कैटरीना को वहां से सुरक्षित निकाल लाते हैं। एक प्यार करने वाले असली प्रेमी और दोस्त की असली परख यहीं होती है कि वह सबकुछ जानते-बूझते कि कैटरीना उससे प्यार नहीं करती, बल्कि पहले से ही किसी और को चाहती है, फिर भी रिस्क लेकर अपने घर में रखता है। कई रोचक मोड़ पार करने के बाद आखिर में कैटरीना को रणबीर के प्रति अपने प्यार का अहसास होता है।एक अहम बात मैं कहना चाहूंगा कि कैटरीना से एकतरफा प्यार करने वाले रणबीर ने एकबार भी अपनी ओर से प्यार का इजहार ही नहीं किया या फिर हिम्मत ही नहीं हुई। कुछ भी कहेंं, लेकिन एकतरफा प्यार ने आखिर रंग दिखाया और ऐन शादी के मौके पर कैटरीना ने अपने प्रेमी का दामन छोड़ रणबीर को अपना जीवनसाथी कबूल किया। शायद ये असली प्यार का ही असर है। मैं फिल्म की गजब कहानी, हल्के एक्शन, अच्छी कॉमेडी, बेहतर म्यूजिक के बदले इसे पांच में से साढ़े तीन स्टार देना पसंद करूंगा।

Monday, 2 November 2009

कामयाबी का लंदन प्रेम

मैं इस फिल्म को लेकर लम्बे अरसे से उत्सुकता से घिरा हुआ था। हम दिल दे चुके सनम, जिसमें अजय देवगन और सलमान एक साथ आए थे, मुझे बहुत पसंद आई थी। इसलिए इन दोनों अभिनेताओं को एक साथ देखने की लालसा थी और फिर उड़ते-उड़ते यह बात भी कानों में पड़ी थी कि कहानी का प्लॉट बहुत अच्छा है। शुक्रवार को मेरे अवकाश के रोज मुझे ऐनवक्त पर तब ऑफिस बुला लिया गया, जब मैं इस फिल्म का फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने जा रहा था, खिन्नता हुई, लेकिन ऑफिस आना भी आवश्यक था। शुक्रवार का अवकाश मैंने शनिवार को लिया और फिर इस फिल्म को देखने पहुंचा। हर किसी के कहानी कहने का तरीका अलग होता है। विपुल शाह अपनी शैली में पहले हास्य का रंग डालते हैं और फिर कहानी की कसावट के सहारे इसे भावुक बना देते हैं। नमस्ते लंदन के बाद अब लंदन ड्रीम्स इनकी हालिया फिल्म है। शुरुआत में ही बता दें, फिल्म को बहुत अच्छे तरीके से गढ़ा गया है, कहानी यूनिक न हो, लेकिन एक आम भारतीय को पसंद आने वाली है। फिर अजय देवगन का नैसर्गिक गंभीर रोल और सलमान का मस्तमौला अभिनय देखने के आदी दर्शकों को यहां अभिनय की नई ऊंचाईयां देखने को मिलेंगी। फिल्म का संगीत इसे दर्शकों के लिए एक बेहतर फिल्म बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।कहानी अजय देवगन के सपने को लेकर शुरू होती है जो उसने पंजाब के एक छोटे से गांव में देखा था। इस फिल्म को देखकर मुझे एक बात फिर से याद आ गई अधजल गगरी छलकत जाए। भरे हुए मटके में से पानी कभी उछलता नहीं है। इसलिए जो वास्तव में प्रतिभाशाली होते हैं, वे अपने बारे में डींग नहीं हांकते। अजय देवगन, पिता की मृत्यु के बाद अपने गांव के एक चाचा के साथ लंदन आ जाते हैं, मजेदार बात ये भी है कि बचपन से म्यूजिक सीखते हुए वो लंदन की गलियों में जवान हो जाते हैं और जो लंदन पुलिस उन्हें केवल कुछ मिनट फुटपाथ पर गाने की एवज में जेल में डाल देती है, इतने साल तक इल्लिगल रूप से बगैर वीजा के रहने पर एक नोटिस तक जारी नहीं करती। गांव से ही अजय का एक दोस्त है सलमान खान, जो उन्हीं गलियों में रहते हुए अलमस्त नौजवान के रूप में अपने कस्बेवालों को परेशान किए हुए है। फिल्म का ये हिस्सा दर्शकों को पर्याप्त रूप से हंसाने में कामयाब रहा है।एक दोस्त के लिए तो कम से कम ऐसा नहीं होता, लेकिन ईष्र्या की धधकती आग में अजय देवगन अपने उस दोस्त को, जिसने कभी गांव की गलियों में उसके सपने के जज्बे को देखकर अपने बचाए कुछ पैसों से एक बांसुरी खरीदकर उसे भेंट की थी, कई तरह के ड्रग्स, जिनके नाम गिनना भी मुहाल है, सलमान क बॉडी में पहुंचा देता है। सलमान अपने दोस्त की इस दगाबाजी से अनजान है और वह अभी भी अजय को अपने दोस्त से बढ़कर भगवान मानता है। कहानी यहां तक पहुंचती है कि अपने अंतिम शो, जो वेंबली स्टेडियम में हो रहा था, अजय देवगन सलमान के प्रति दर्शकों के प्यार को बर्दाश्त नहीं कर पाता और सच्चाई अपने आप सामने आ जाती है। सलमान का सुखद अभिनय जितना काबिलेतारीफ है, उससे कहीं अधिक प्रशंसा अजय देवगन के अभिनय की की जानी चाहिए। असिन अपने चुलबुले रंग में दर्शकों के सामने हैं और अपनी दूसरी हिन्दी फिल्म में ही बेहतर ढंग से अपनी भूमिका निभाने में सफल रही हैं। यह फिल्म उनके कॅरियर को नई ऊंचाईयां देने में सहायक होगी। वक्त, नमस्ते लंदन के बाद लंदन ड्रीम्स भी कामयाब रहेगी, ऐसी आशा की जा सकती है। फिल्मांकन और संगीत की दृष्टि से भी फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार दिए जा सकते हैं।

Tuesday, 20 October 2009

मेरे गांव की दिवाली

पता नहीं क्यों, इस बार दिवाली पर घर जाने को लेकर मैं इतना उत्सुक नहीं था। आज से आठ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर आया था, दिवाली को लेकर बड़ा उल्लास रहता था और पन्द्रह दिन पहले से ही मंसूबे बनाने लगता था कि दिवाली पर क्या धमाल करना था। इस बार तो धनतेरस भी जयपुर में ही मना ली थी और लग ही नहीं रहा था कि गांव भी जाना है। गांव यात्रा और दीपावली के बाद वापस लौटने का अनुभव कुछ हद तक यादगार रहा, फिर भी एक कसक सी मन में रह गई है। घर जाने का प्लान ये बना कि मैं और अमित, दोनों एक साथ बाइक से ही घर चलें। रूप चतुर्दशी के रोज अलसुबह हम दोनों उठ गए थे और पौने छह बजे निकलने के लिए तैयार थे। जैसे ही दरवाजे से बाहर झांककर देखा तो पता चला कि इन्द्र देवता खासे महरबान हो गए हैं और आज शायद ही हमें निकले दें। खैर, सवा सात बजे वज्रधारी ने कुछ राहत दी और हम मौका देख झट से खिसक लिए। खिसकाव ज्यादा नहीं हुआ था और कानोता से कोई दो फर्लांग ही जा पाए थे कि फिर देवेन्द्र ने हमें दबोच लिया कि बच्चू आज इतनी आसानी से थोड़े न निकलने देंगे। बारिश का ये आलम अभी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, करीब पौने घंटे हम एक पेट्रोल पम्प की छत के नीचे टिके रहे। इस डर से कि कहीं पम्प मालिक इतनी देर ठहरने का कोई चार्ज न लगा दे, मैंने बाइक में २०० रुपए का पेट्रोल डलवा लिया। सूरज की एक हल्की सी किरण शायद कहीं से निकल आई थी, जिससे हम दोनों को उम्मीद बंधी कि आगे शायद मौसम इतना बेमिजाज नहीं है और हम आगे बढ़ सकते हैं। बाइक पर सवार होकर हम निकले, बमुश्किल साढ़े तीन किलोमीटर चले होंगे कि बारिश की बूंदों का वजन दोगुना हो गया और सिर पर टपकती ये बूंदें भी ओले के समान ही पड़ रही थीं। आगे एक उजाड़ सा पेड़ देख मैंने अमित से बाइक रोकने की बात कही, लेकिन अमित भी शायद आज इन्द्रदेव से पंगा लेने के मूड़ में था, उसने रफ्तार जारी रखी लेकिन हम कोई बंशीधर की तरह १६ कलाओं से अवतार लेने वाले भगवान विष्णु के अंश थोड़े ही हैं, जो मेघदेव के मुकाबले में गोवर्धन पर्वत को उठा लेते। बारिश की बूंदों से बेबस हो हमें आगे एक झोंपड़ी में शरण लेनी पड़ी। यहां बीसेक मिनट के वक्फे के बाद संभावना लग रही थी कि अब दौसा तक शायद ही कोई रुकावट आए। लेकिन मेघ देवता कुछ और ही सोचे हुए थे, बस्सी से पांच किलोमीटर पहले ही हमें फिर रोक लिया और इस बार ये ठहराव कोई एक घंटे तक चला। ऑफिस और घर-गांव की बातें करते हुए हम यहां ठहरे रहे। दूसरी चाय के बीच में अमित बोला, गुरुजी इस यात्रा को तो हम ब्लॉग पर लिखेंगे। मैंने कहा हां, यार अब तक की घटनाओं ने एक अच्छे संस्मरण का प्लॉट स्थापित कर दिया है। आगे भी यात्रा अच्छी रही तो दिवाली की इस यात्रा को आफिस पहुंचते ही जरूर लिखूंगा। तीसरी चाय समाप्त हो गई थी, पर धूजणी बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। बारिश के बहाव का सामना करते हुए बाइक चलाने के कारण अमित की हालत अधिक खस्ता थी। पास में ही सिगरेट की दुकान भी थी, अंतिम नवरात्र की शाम से पहले ऐसी स्थिति होती तो मैं चाय की चुस्कियों के साथ सिगरेट के कश भी लगा लेता, लेकिन इस बार मेरे हाथ रुक गए थे। अंतिम नवरात्र को मैंने एक प्रण लिया था और आखिरकार मैंने सिगरेट नहीं पी। इस बार सूरज ने शायद बादलों की ओट से निकलने में कुछ हद तक कामयाबी हासिल कर ली थी, इसलिए हम दोनों फिर से अपनी राह पर चल दिए थे। अमित को बाइक पर सवार होने का मौका क्या मिला, उसने बाइक को शायद स्कॉर्पियो समझ लिया था और बाइक की रेस एक साथ चालीस से बढ़कर पिचानवें तक पहुंच गई थी। मैंने कहा, भैया, ये बाइक है, हवा के झोंके हम दोनों को उड़ा देंगे, बोला गुरुजी आप पकड़कर बैठे रहो, क्योंकि अगले रुकाव तक मैं मेहंदीपुर बालाजी पहुंच जाना चाहता हूं। मैंने कहा, बालाजी की दूरी यहां से ७५ किलोमीटर है, बोला, अभी पचास मिनट में पहुंचते हैं। जनाब मैं तो नौसिखिया ड्राइवर हूं, लेकिन अमित की ड्राइवरी इस बार चरम पर रही। मुझे लगा हालिया बने चार लेन के इस हाइवे का पहला लुत्फ अमित ही उठाने जा रहा है। बाइक की स्पीड का सही अहसास तब हुआ जब एक तेजरफ्तार दौड़ती राजस्थान रोडवेज बस को पीछे छोड़ दिया, एक हुंडई सैंट्रो को ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया और अपनी प्रेमिका के साथ पल्सर पर सवार एक कॉलेज युवक को एक साथ क्रॉस कर तेजी से पीछे छोड़ दिया। अमित की बालाजी पहुंचने की तमन्ना फिर से अधूरी रह गई और इन्द्रदेव ने इस बार हमें दौसा पार करते ही रोक लिया। मैंने तेज सांस ली और हम एक मिष्ठान भंडार में प्याज कचौरी खाने में तल्लीन हो गए। बाहर बारिश हो रही थी और बातचीत का माध्यम फिर से गांव की गलियों और शहर की स्ट्रीट्स के बीच में भटकने लगा। अभी घर पहुंच भी नहीं पाया था कि रास्ते में गांव के दो भाई मिल गए। उन्होंने मेरे पत्रकार होने और अपनी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर विस्तार से चर्चा की। सफर की थकान के बावजूद आधे घंटे तक यह ज्ञानचर्चा होती रही। दोपहर डेढ बजे मैं घर पहुंच गया। पता नहीं कैसे, लेकिन ऐसा हर बार होता था, मैं जब भी गांव जाता था, मेरे छह साल के भतीजे को अपने आप इत्तिला मिल जाती थी कि मैं घर आ रहा हूं और वो आधे रास्ते में ही मुझे पकड़ लेता कि चाचू मेरे लिए क्या लाए हो। इस बार भी उसने रास्ते में ही मुझे घेर लिया और अपनी रिश्वत मांगनी शुरू कर दी। मैंने बैग में से ड्राई फ्रूट्स का पैकेट निकाला और उसे पकड़ाकर अपनी जान छुड़ाई। घर पहुंचा तो मम्मी ने कई जगह से छूकर नब्ज चैक की कि कहीं मैं रास्ते में दुबला तो नहीं हो गया हूं और ढंग से खाना खाता हूं या नहीं। मम्मी ने फिर भी कह ही दिया कि दो महीने में ही कितना दुबला हो गया है, जबकि पिताजी की राय में जन्माष्टमी पर मेरे पिछले गांव के दौरे से दिवाली की अवधि में मेरा वजन घटने की बजाय कुछ बढ़ गया था। दिवाली वाले रोज सुबह से ही घर पर माहौल बड़ा उल्लासजनक था। मेरी साढ़े तीन साल की भतीजी के क्रेकर कलेक्शन में कई तरह की रंगीन फुलझड़ी और लाल पटाखे थे, जिन्हें वो बड़े चाव से मुझे दिखा रही थी। भतीजा इस बात की शिकायत कर रहा था कि उसके कुल १२ रॉकेट में से एक किसने चुरा लिया था। गांव का माहौल भी सदाबहार नजर आ रहा था। आज काम की चिंता कम ही लोगों को थी, लेकिन फिर भी सरसों की बुआई और गेहूं की फसल के लिए सिंचाई की मशक्कत जारी थी। मेरे पिताजी धार्मिक प्रवृत्ति के हैं और उन्होंने सुबह ही कह दिया था कि वे आज श्रीमद्भागवत कथा सुनने के लिए पड़ौस के गांव में जाएंगे। मेरे बड़े भैया उन्हें सुबह ग्यारह बजे पांच किमी दूर उस दूसरे गांव में छोडऩे चले गए थे। हालांकि मम्मी को यह नहीं सुहा रहा था कि वे त्योहार के रोज भी कथा सुनने जाते, लेकिन पिताजी कहां मानने वाले थे। भैया उन्हें दोपहर में कथा में छोड़कर आ गए। दिन में मैं अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला और स्कूल की पढ़ाई से लेकर अब तक की उन्नति की यादें ताजा हुईं। वही हुआ जिसका डर था, पिताजी को लेकर बड़े भैया कथा सुनकर शाम को छह बजे घर लौटे और मम्मी को गुस्सा आ गया कि वे त्योहार के रोज भी देर तक दूसरे गांव में कथा सुनते रहे थे। मेरी मम्मी हर चीज को व्यवस्थित ढंग से पूरा करना चाहती हैं, उन्हें समय पर हर कार्य पूरा चाहिए, इसलिए जब पिताजी देर से लौटे तो इस बात पर दस मिनट तक बहस होती रही कि दिन ढले गांव के मंदिर में अब तक भोग लगा दिया जाना चाहिए था, जो पिताजी की कथा की वजह से लेट हो गया था। बाद में बड़े भैया मंदिर गए और उन्होंने वहां प्रसाद का भोग लगाया। मैंने रोशनी के लिए घर पर मोमबत्तियां जलाईं और भाभी ने घर में घी के दीपक जलाए। अब फुलझड़ी-पटाखे फोडऩे की बारी मेरे भतीजे-भतीजी की थी, जो सुबह से ही इस बात की प्लानिंग कर रहे थे कि किसको कितने पटाखे चलाने हैं। इससे एक घंटे पहले मैंने अपने कुछ दोस्तों को दिवाली के मैसेज किए और अपने कुछ खास परिचित और मित्रों को फोन करके दीपावली की बधाई दी। मेरा मानना है कि मैसेज एक फॉर्मलिटी होती है, लेकिन जिन्हें आप अपना अच्छा मित्र या नजदीकी समझते हैं, उन्हें हमेशा फोन पर बातचीत करनी चाहिए। इसलिए शाम को ठीक पांच बजे जब मैंने अपनी एक फ्रेंड को, जो कहती हैं कि अभी हम फ्रेंड बन पाए हैं या नहीं, इस बारे में निर्णय होना बाकी है, को फोन किया, उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। मैंने सोचा शायद कहीं व्यस्त होंगीं। फोन के रिप्लाई की कुछ मिनटों की प्रतीक्षा घंटों में तब्दील हुई, आखिर मैंने अपनी ओर से पहल करते हुए शाम को सवा आठ बजे उन्हें लक्ष्मी-गणेश का शुभ दीपावली लिखा एक मल्टीमीडिया मैसेज भेज दिया। इस मैसेज के जवाब की प्रतीक्षा में मेरी रात कट गई, हालांकि इन्हीं फ्रेंड का दावा है कि आपके एक नजदीकी का इग्नोरेंस आपको उससे कहीं अधिक दुख देता है, जितना कि उसके द्वारा कहे हुए सौ कठोर शब्द। इन कठोर शब्दों को उन्होंने अपनी भाषा में रूड वड्र्स कहा है। सुबह हुई और इस बार फिर मेरे भतीजे और भतीजी में ठन गई थी। मेरे बड़े भैया खेतों की जुताई पर जाने वाले थे और भतीजे की जिद थी कि वो ट्रैक्टर की सवारी करेगा और हमारे खेत वो खुद ही जोतेगा। मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं छह साल की उम्र का था तो ट्रैक्टर को देखते ही डर जाता था कि पता नहीं कब कुचल देगा और उसी उम्र में मेरा भतीजा ट्रैक्टर की सवारी गांठने की कह रहा था, यह समय में बदलाव का सूचक है। भतीजी की जिद भी ट्रैक्टर में बैठकर खेतों में घूमने की थी। आखिर मामला इस बात पर तय हुआ कि दोनों बच्चों को दो-दो रुपए दे दिए जाएं। भतीजे को रिश्वत की आदत अधिक थी, इसलिए वो पांच रुपए लेकर राजी हुआ। आज का दिन गोवर्धन पूजा का दिन था, इसलिए दोपहर से ही मम्मी और भाभी चार भैंसों के गोबर को लेकर उसे एक पर्वतरूपी मनुष्य का आकार देने में लग गई थीं। साथ में श्रीकृष्ण भगवान और उनके साथी ग्वालों को भी आकार दिया गया, माध्यम था गोबर। शाम हो गई थी और अभी तक मुझे अपनी ऑफिस के कुलीग्स के बहुत कम दिवाली संदेश प्राप्त हुए थे। जबकि मेरे विचार से मैं सभी लोगों को मैसेज या फोन करके बधाई दे चुका था, लेकिन जवाबों की प्रतीक्षा अब तक थी। शाम छह बजे इस बारे में मेरी ऑफिस में मेरी मुंहबोली बहन से बात हुई, उसने कहा कि भैया, कई बार ऐसा हो जाता है। लेकिन मैं इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। क्यों हम कुलीग्स के पास भी एक-दूसरे को विश करने लायक टाइम नहीं था। घर पर बड़े भैया, भाभी, मम्मी, बुआ, पिताजी, बड़ी बहन और बच्चों ने हंसी-खुशी से गोवर्धन पूजा की, मैं भी पूजा में शामिल हुआ, पर उतना प्रसन्न नहीं था।मैं दिवाली मनाकर लौट आया हूं, रास्ते में बहुत सी ऐसी बातें हुईं, जिन्हें शब्दों में लिख पाना कठिन है। इस बार की दिवाली बहुत अच्छी रही, मैंने अच्छे से मनाई, पर फिर भी कुछ कसक सी बाकी रह गई। अफसोस, मेरी दूरियां भगवान श्रीराम के प्रयासों के बावजूद फना नहीं हो सकीं।

Thursday, 15 October 2009

आगमन

चौ. कोऊ कहे आए दशरथनंदन, विप्रजनों ने प्रवचन दीन्हे।
जिन के अकुलाहट है भारी, तीन घड़ी तक कुछ नहीं कीन्हे।।
चौ. नगर द्वार आए जन-जन प्रभु राह तके और कछु नहीं दीखे।
सब ही बने गुरु इक-दूजे, अब आएंगे राम और सीते।।
चौ. दूर देखि उड़ती पग धूलि, मात् संग आए शत्रुघ्न।
भ्रात भरत की गति नहीं उज्ज्वल, बिसरे सब मात्-बांधवजन।।
चौ. नयन भरे जल, दरसन इच्छुक, प्रभु कैसे हों दरस तुम्हारे।
मो सम कौंन कृतघ्न दुनिया में, मोसे अच्छे लखन प्यारे।।
चौ. मंद गति, दीपक से उज्ज्वल, लखन संग आए त्रिपुरारी।
पीछे सीता और कपीश्वर, अवधजनों की भीड़ है भारी।।
चौ. चंचल नयन, गात कोमल और सिर पर जटा-जूट है भारी।
चौदह बरस बाद अवधीश्वर, झलक देख हर्षे नर-नारी।।
चौ. ज्यों पहुंचे प्रभु नगर द्वार पे, आशीर्वचन दियो कैकेई मां।
गुरू वशिष्ठ ने वचन सुनाए, सबसे गले मिले प्रभु कर्मा।।
सो. सब प्रसन्न नर-नारि, हर्षित मन दीपक जले।
अवध भाग गए जाग, भ्रात प्रेम की ये कथा।।

यदि आप उपरोक्त चौपाई और सोरठा का सारांश समझ गए हैं तो नीचे लिखी पंक्तियों पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, ये चौपाईयां रामायण या किसी अन्य धर्मग्रन्थ से नहीं ली गई हैं। इन चौपाईयों का लेखन मैंने अपनी अल्पबुद्धि से किया है। यदि किसी बंधुजन को कुछ गलत लगे और सुझाव देना चाहें तो स्वागत है।

अनुवाद: अयोध्या में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि के बाद वापस लौटने की खबर है। इससे लोग प्रसन्न हैं और अकुलाए हुए हैं। कई लोग तो अपना घरेलू कार्य छोड़े तीन प्रहर से प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ब्राह्मण जन लोगों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। सारे नगरवासी द्वार पर इकट्ठे हो गए हैं लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। प्रभु श्रीराम के आगमन के बारे में अटकलें लगाते हुए सब एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं और समझा रहे हैं कि प्रभु श्रीराम सीता और लक्ष्मण समेत जल्द ही यहां आएंगे। पैरों से उडऩे वाली रेत को देखकर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न तीनों माताओं को लेकर नगर द्वार पर पहुंचे। लेकिन भ्राता भरत की स्थिति अच्छी नहीं है। वे अभी भी श्रीराम के वनवास जाने के लिए खुद को उत्तरदायी मान रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें ध्यान ही नहीं है कि उनके आस-पास कौंन खड़ा है, वे केवल बड़े भाई राम के आगमन की राह तक रहे हैं। उनके नयनों में जल भरा हुआ है और उदास से खड़े भरत की प्रबल इच्छा है कि उन्हें जल्द से जल्द भगवान श्रीराम के दर्शन हो जाएं। वे मन में विचार कर रहे हैं कि मेरे समान कृतघ्न इस दुनिया में कौंन है। मुझसे अच्छा तो छोटा भाई लक्ष्मण है, जिसे चौदह वर्ष तक भैया की सेवा का मौका मिला है।इसी समय धीमे-धीमे चलते हुए प्रभु श्रीराम, जिनके चेहरे की आभा चारों ओर दीपक की रोशनी के समान फैली हुई है। लक्ष्मण और सीता समेत नगर द्वार पर पहुंचे। उनके पीछे ही वानर राजा सुग्रीव, हनुमान और बहुत सारे नगरवासी हो लिए हैं।चंचल नयनों वाले प्रभु श्रीराम जिनकी त्वचा अत्यन्त कोमल है, लेकिन सिर पर उनके अभी भी जटाएं लिपटी हुई हैं। लेकिन अयोध्यापति श्रीराम की चौदह वर्ष बाद झलक देखकर अयोध्या का हर नर-नारी प्रसन्न है और प्रभु श्रीराम की जय-जयकार कर रहा है।प्रभु श्रीराम जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे, सबसे पहले उन्होंने माता कैकेई के चरण छुए और उन्होंने श्रीराम को आर्शीवाद दिया। गुरू वशिष्ठ का आर्शीवाद लेकर प्रभु श्रीराम ने बहुत सारे नगरवासियों को भी गले लगाया।प्रसन्न मनों से अपने घर लौट रहे नगरवासियों ने घर-घर में दीपक जलाए, जिससे पूरी अयोध्या रोशन हो गई। दूसरी ओर भगवान श्रीराम और भरत के देर तक हुए मिलाप ने दो भाईयों के प्रेम की कथा कही, जिसे देखकर लगा कि अब सही मायनों में अयोध्या का भाग्योदय हुआ है।

Tuesday, 6 October 2009

धवन साहब आप बोर नहीं होते ?

वे फिल्म बनाए चले जा रहे हैं और हमारी मजबूरी यह है कि हम फिल्म नहीं देखें तो टाइम कैसे पास हो। दिवाली की छुट्टियां होने ही वाली हैं ऐसे में सिनेमाघरों में लम्बे समय बाद डेविड धवन की फिल्म लगी है डू नॉट डिस्टर्ब। फिल्म लग ही गई है, तो देखना भी बनता है, नहीं तो मीमांसा कैसे करेंगे। इस दशक के बीच में जब तक गोविन्दा और धवन साहब के बीच सुलह नहीं हुई थी और झगड़ा कांटे की टक्कर का था, तो दर्शक बड़े फायदे में रहे। प्रियदर्शन साहब ने डू नॉट डिस्टर्ब देख रहे मेरी बगल वाली सीट पर बैठे भाई साहब की तरह किसी को बड़ी वल्गर फिल्म है,कहने का मौका नहीं दिया। और दूसरे उनकी फिल्में सार्थक और सहज हास्य की कॉमेडी फिल्मों के लिए हमेशा याद की जाएंगी। बात चाहे हेराफेरी, चुप चुपके, हंगामा जैसी शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों की हो या ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी मालामाल वीकली और हलचल जैसी फिल्मों की। हर जगह प्रियन साहब ने अपनी छाप छोड़ी और एक अपने धवन साहब हैं, जो द्विअर्थी और बेतुके संवाद एवं भद्दे दृश्यों के जरिए फिल्म को हिट कराना चाहते हैं। राजपाल यादव और रणवीर शौरी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों को केवल चुनिंदा दृश्यों तक सीमित कर दिया गया है। एक अमीर बिगड़ैल के किरदार में आए गोविन्दा अपनी पत्नी से खुश नहीं हैं और एक हाई-फाई मॉडल का हाथ थामना चाहते हैं। पत्नी के किरदार में सुष्मिता भी डेढ सयानी हैं और वे पहले ही अपने पति की जलील हरकतों को जानने के लिए अपने दोस्त डिटेक्टिव को लगा चुकी हैं। फिल्म के दृश्यों को देखकर लगता है, जैसे जबरदस्ती रबड़ की मांनिद खींचा जा रहा हो। त्रिकोण में फंसते हैं रितेश देखमुख, जो अमीर गोविन्दा की गलतियों को छुपाने के एवज में अपनी सातवीं पीढ़ी तक के खानपान का इंतजाम कर लेना चाहते हैं। आधारहीन विषय को लेकर लिखी गई कहानी, अपने सही बहाव में नहीं है। ढाई घंटे अवधि की फिल्म में दर्शक की नजरें सही मायनों में पर्दे की तरफ उन्हीं दृश्यों में जाकर टिकती हैं, जब स्क्रीन पर सोहेल खान दिखाई देता है। सोहेल का कुछ मिनटों का आक्रामक रूप अच्छा बन पड़ा है। अभिनय के लिहाज से भी उन्होंने बेहतर प्रयास किया है। सुष्मिता सेन को पत्नी का किरदार थमाकर उनके साथ न्याय किया गया है, अब वे एक्ट्रेस के रोल में जमती भी नहीं हैं। हाई-फाई मॉडल की आयुसीमा से अब लारा दत्ता का पत्ता कट चुका है, इस तरह के रोल में अब बिपासा ही अच्छी लगती हैं, पूरी फिल्म में उनके चेहरे के भावों को देखकर लगता भी नहीं, कि किसी पाठशाला से उन्होंने एक्टिंग के किसी अक्षर की पढ़ाई भी की है। रितेश देशमुख और राजपाल यादव के काम को अच्छा कहा जा सकता है। रणवीर शौरी थिएटर के मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन उन्हें सही रोल नहीं मिल पाया है। फिल्म के गीत-संगीत का पक्ष भी कमजोर ही रहा है। पूरी फिल्म में केवल एक गीत कुछ मिनटों के लिए आपको सही लग सकता है। बेबो नाम का यह गीत भी युवाओं में चचंल किस्म की कुछ विदेशी सोच वाली संतानों को पसंद आ सकता है। फिल्म की शूटिंग की बैकग्राउंड देखकर लगता नहीं कि धवन साहब ने अधिक खर्चा किया होगा। फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ भी नहीं है। मुझे इजाजत मिले और पांच स्टार में से धवन साहब की इस नई फिल्म को अंक देने को कहा जाए तो डेढ से अधिक स्टार देने की हिमाकत नहीं कर सकता। क्योंकि ढाई घंटे की फिल्म में मैंने भी अपना टाइम परदा निहारने में कम अपने मोबाइल पर मैसेजिंग में अधिक बिताया था। इसलिए जिन बंधु-बांधवों ने फिल्म नहीं देखी है, वे अपना टाइम और पैसा बिल्कुल भी खर्च न करें।

Sunday, 4 October 2009

विदेश यात्रा

आज उनकी बांछें खिली हुई थीं। शायद इतनी प्रसन्नता उन्हें तब भी नहीं हुई होगी जब वे शादी के मंडप में सात फेरों को निभाने की प्रक्रिया में उलझे हुए थे। शायद यही शब्द ठीक है, वे बचपन से ही बड़े तेज बुद्धि रहे थे। समय की बर्बादी उन्हें कभी नहीं सुहाती और फेरों की प्रक्रिया में पंडितजी ने कोई दो-ढाई घंटे से ज्यादा ही टाइम ले लिया था। कॉलेज टाइम से पैसे कमाने की ऐसी चाहत लगी कि जब छात्रनेता थे तो चंदे से इकट्ठे हुए पैसों में से साठ फीसदी तो उन्हीं की जेब में आते थे। फिर वे कार्यकर्ता बन गए थे। किसके तबादले को मंत्रीजी से सहमति दिलानी है और किसको ठंडे बस्ते में लगाना है, यह उनके लिए बड़ा आसान था। और अब तो वे विदेश मंत्रालय के मुखिया हो गए थे। विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का रुतबा कम तो नहीं होता।
अभी कल ही सूचना मिली थी कि इसरो वाले वैज्ञानिकों ने चांद पर झंडा गाड़ दिया था। आज एक खुशखबरी उन्हें मिल गई थी कि यहां के वैज्ञानिकों ने जो सूचनाएं जुटाई थीं, उनके कुछ मामलों का अध्ययन नासा के वैज्ञानिकों से कराया जाए और वे इस दल का नेतृत्व करें। मंत्रीजी के शरीर का रोंया रोंया खुशी के मारे कांप रहा था, हाथों-हाथ बीवी को सूचना दी और मायके तक के लोगों के अमरीका जाने की पैकिंग शुरू हो गई। साला तो जाएगा ही, साले की बीवी और उनके बेटे-बेटियों का जाना जरूरी है। आखिर इसरो के वैज्ञानिकों ने नासा के वैज्ञानिकों से कुछ साठगांठ कर ली और यहां की गुप्त बातें वहां के वैज्ञानिकों को बेच दीं तो उन्हें वॉच कौंन करेंगा, मंत्रीजी की बीवी ने सीख दी। आखिर फाइनल हो गया कि तीन वैज्ञानिकों की गैरजिम्मेदराना हरकतों पर नजर रखने के लिए परिवार के कम से कम १३ लोग तो होने ही चाहिएं।
मंत्रीजी विमान में चढऩे को तैयार हो गए थे। उनके साथ कुल १३ लोगों का लवाजमा था। बेटे-बेटियों समेत ६ लोग तो वे ही थे, बाकी बीवी के मायके और खुद के घर के लोग थे। तीन वैज्ञानिक भी थे, एक के सिर और दाढ़ी के बाल ऐसे बढ़े हुए थे, जैसे वर्षोंं से शेविंग के लिए समय ही नहीं मिला हो। मंत्रीजी की बड़ी बेटी ने नाक सिकोड़ी, नॉनसेंस, कैसे भालू की तरह लग रहा है। साथ में छोटी बेटी भी मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी थी। वैज्ञानिकों की टोली में एक के साथ उनकी वाइफ भी थीं। अब मंत्रीजी की भोंहें टेढ़ी हो गई थी। डॉ. अय्यर, क्या हम किसी हनीमून पर जा रहे हैं। आपको पता है एक आदमी के अमरीका जाने पर कितना खर्चा होता है। आप क्या सरकारी पैसे को फिजूल का समझते हैं जो आपकी वाइफ पर खर्च दिया जाए। आपने शायद सुना नहीं सोनियाजी और उनके बेटे राहुल खर्चा बचाने के लिए कैटल क्लास में यात्रा कर रहे हैं। हम भी इकोनॉमी क्लास में टिकिट्स बुक करा रहे थे, पर पीए ने गलती से बिजनेस क्लास की टिकिट्स ले ली हैं।
डॉ. अय्यर के लिए यह अनुभव कुछ अटपटा था। वह देख रहे थे नेताजी के १३ सदस्यीय परिवार को। और उन तीन वैज्ञानिकों के साथ केवल उनकी एक पत्नी थी। लेकिन सर, मैं अपनी पत्नी का खर्चा खुद उठा लूंगा। फिर भी, नेताजी का पारा १०४ फॉरेनहाइट पर चढ़ गया था। आप वहां पर हनीमून मनाएंगे या नासा साइंटिस्ट्स के साथ रिसर्च पर ध्यान देंगे। बात बस बढऩे वाली थी कि डॉ. अय्यर की वाइफ ने हस्तक्षेप किया और अपने वापस लौटने की बात कही। डॉ. अय्यर नाखुश थे। जब डॉ. अय्यर की वाइफ वापस चलीं गईं, तो मंत्रीजी की अटकी सांस दुबारा वापस लौटी। मंत्रीजी अब पीए और अपने कुनबे समेत अमरीकन एयरलाइंस की फ्लाइट में बिजनेस क्लास की सीटों पर सवार हो गए थे। मंत्रीजी के साले के बेटे-बेटी सीटों पर लेटने का अभ्यास कर रहे थे, ऐसी सीट शायद उन्होंने पहली बार देखी थी, जिस पर बैठ सकते हैं और सोने का प्रयास भी।
मंत्रीजी की अमरीका यात्रा सफल रही। इसरो के चंद्रयान के नतीजे बड़े सुखद रहे थे। वास्तव में चंद्रयान ने ऐसी तस्वीरें जुटाई थीं, जो नासा के वैज्ञानिकों के लिए भी अब तक अजूबा रही थीं। मंत्रीजी दो हफ्तों के बिजी शेड्यूल के बाद वापस वतन लौटे तो उनका फूलमालाओं से स्वागत किया गया। हर किसी की माला मंत्रीजी और उनकी पत्नी की ओर मुड़ रही थी। मंत्रीजी के बच्चे और साली-सलहज की किस्मत भी चरम पर थी, इसलिए दो-तीन मालाएं उनके गले में भी पड़ गई थीं। रिसर्च वर्क से थके-मांदे वैज्ञानिक उपेक्षित से एक कोने में खड़े थे। उनकी इस हालत पर मंत्रीजी को तरस आ गया था, इसलिए आखिर में बची दो मालाएं तीन में से दो वैज्ञानिकों के गले में भी डलवा दीं। अगले दिन अखबारों में मंत्रीजी की बड़ी सी तस्वीर भी छपी थी और थे उनकी अमरीका यात्रा की सफलता के किस्से। वैज्ञानिकों की तस्वीर भी थी, इन्सैट में लगाई गई थी, छोटी सी, लिखा था इसरो के सफल वैज्ञानिक।

Monday, 28 September 2009

ये दूरियां

आजकल कहानी लिखने का चस्का लगा है। कुछ समय पहले मैंने अपने गांव की पृष्ठभूमि को लेकर एक रियल स्टोरी लिखी थी। आज कुछ शहरी सीमा में अतिक्रमण करने का प्रयास कर रहा हूं। कह नहीं सकता कि शहरी युवा मन को किस हद तक समझ सका हूं, यह निर्णय आप पर छोड़ता हूं। ....फुर्सत हो तो आप भी कुछ मिनट भुगतें।

ये दूरियां
निखिल का रोम-रोम खुशी से झूम रहा था, शाम को ऑफिस से घर के लिए निकलने में नौ बज गए थे। यूं तो आठ बजे तक घर पहुंचना बहुत जरूरी होता था, क्योंकि इस वक्त के बाद घर पहुंचने पर उसके पापा इसे बच्चों में गलत संस्कार की नीति से देखते थे। पिताजी के संस्कार भी अजीब थे, सही कहें तो मेट्रो सिटी के लिहाज से इनमें मॉडर्नाइजेशन होना ही चाहिए था, ऐसा केवल निखिल की सोच कहती थी। भई, आठ बजे तो शाम होती है, इसके बाद ही शहर में रंगीनी और रोशनियों को देखने का मजा आता है। लेकिन निखिल को यह सब देखने की इजाजत नहीं थी। शाम आठ बजे तक ऑफिस से आकर खाना खाना और बाद में बीस-पच्चीस मिनट कम्प्यूटर पर वर्क करना, एक-दो घंटे मन लगा तो किसी किताब को पढऩा, फिर गहरी नींद सुबह छह बजे ही खुल पाती थी। दो घंटे अखबार पढऩा निखिल की रोज की आदत थी। और दीन-दुनिया की खबर रखने के लिए अखबार पढऩा जरूरी है, यह निखिल की बचपन से मान्यता थी, जो उसके पिताजी ने ही सिखाई थी। बात गुरुवार शाम की हो रही थी, जब निखिल को ऑफिस से निकलते-निकलते नौ बज गए थे। यूं तो सात बजे ही उसने अपना काम पूरा कर लिया था, लेकिन आज बात कुछ खास थी। वह एक एड एजेंसी में क्रिएटिव राइटिंग के जॉब पर था, जिसमें केवल चंद उम्दा और आकर्षित करने वाले शब्द लिखने के एवज में उसे कामचलाऊ मासिक सैलेरी मिलती थी। रोज की पढऩे की आदतों ने ही शायद उसे क्रिएटिव बना दिया था, उसे भी याद नहीं कि उसने प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों और वेदप्रकाश शर्मा जैसे थड़ी पर बिकने वाले राइटर्स के कितने नोवल्स पढ़ लिए थे। इसका असर उसकी क्रिएटिविटी पर भी था, शायद इसीलिए वह हर एड को नया क्रिएटिव मोड देता और बॉस हमेशा उसकी पीठ थपथपाता, लेकिन इसका असर कभी सैलेरी में देखने को नहीं मिला, क्योंकि सैलेरी पीठ थपथपाने की तुलना में उतनी अच्छी नहीं थी। फिर भी उसे अपने ऑफिस वर्क से कोई गिला नहीं था। आज जब उसने एक नई इम्पोर्टेड गाड़ी के खाडिय़ों में दौड़ते जैसे विज्ञापन को आखिरी टच दिया था तो घड़ी में केवल पौने सात बजे थे। लेकिन वह ऑफिस में रात नौ बजे तक रुका रहा।
पिछले कुछ महीनों से वह अपने ऑफिस के नीचे वाली फ्लोर पर एक मोबाइल कम्पनी में जॉब करने वाली लड़की पर फिदा था। इन मायनों में नहीं कि दिल हथेली पर रखकर कुछ दिन बाद कह दिया हो कि मैं तुम्हारे लिए चांद तोड़कर ला सकता हूं या तुम जैसी खूबसूरत तो कैटरीना कैफ भी नहीं है। इस तरह की लच्छेदार बातें करना तो उसे जैसे आता ही नहीं था। हां, कागज पर भले ही वह उन लच्छेदार बातों को हजार गुना बेहतर तरीके से अंजाम दे सकता हो, लेकिन लड़की के सामने पड़ते ही जैसे जीभ हकलाने लगती, गला सूखने लगता और क्रिएटिव माइंड से सोचने पर भी गिने-चुने शब्द ही निकल पाते थे। इस बात का अंदाजा उसे अब तक नहीं था कि लड़कियों से बात करते वक्त उसके साथ ऐसा क्यों होता था। पिछले तीन-चार माह से तनुजा से उसकी बात होने लगी थी। यूं उन दोनों के परिचय को सालभर का अरसा हो गया था, लेकिन यह परिचय कभी हाय-हल्लो के रूप में मुंडी हिलाने से आगे कभी नहीं बढ़ पाया था। लेकिन अब इसमें बदलाव दिख रहा था। पिछले तीन-चार महीने से उनमें ठीक-ठाक बात होने लगी थी। चार महीने पहले की बात है जब वह ऑफिस से निकल रहा था। उसी समय तनुजा से मुलाकात हो गई। निखिल आज बॉस के बिहेवियर से खफा था, उसने इतना अच्छा एड क्रिएट किया था, लेकिन क्लाइंट की ओर से कम्प्लेन आने के बाद बॉस ने उस एड को वाहियात करार दे दिया था। उसका मूड खराब था, सो लिफ्ट से नीचे आते वक्त भी चेहरा गुस्से से भरा हुआ था। एक फ्लोर नीचे जब लिफ्ट में तनुजा अंदर दाखिल हुई तो निखिल का गुस्सा भी कम हो गया। शायद वह तनुजा को अपनी कमजोरी दिखाना नहीं चाह रहा था, लेकिन वह इमोशनली बहुत कमजोर था और यदि कोई उसके साथ थोड़ी भी सुहानुभूति दिखाता तो पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देता। आज तनुजा ने भी बस ऐसे ही पूछ लिया कि मूड खराब क्यों है। फिर तो बस वह अपनी रामकहानी बयां करने लगा। लिफ्ट से नीचे आते ही पार्किंग में बीसियों मिनट अपनी प्रतिभा और बॉस की खामियों की डींग हांकता रहा। उसे यह भी ख्याल न रहा कि तनुजा उसकी बातों से बोर तो नहीं हो रही है। तनुजा ने जब उसे कुछ सुहानुभूति दिखाई तो वह निपट बालकों की तरह अपनी हर बात उसे बताने लगा। यह शायद निखिल का भरोसा था या तनुजा की सुहानुभूति कि अब वह अपनी बहुत सारी पर्सनल बातें भी तनुजा को बता देता। अब उनकी अक्सर फोन पर तो नहीं, लेकिन एसएमएस के जरिए बातें होतीं। बीच में एक बात तो भूल ही गए निखिल जितना रिजर्व किस्म का था, तनुजा उतनी ही चंचल। चंचल इस किस्म में नहीं कि हर किसी के साथ बातचीत करती हो या हर किसी से मुस्कराकर बात करती हो। तनुजा की चंचलता का दायरा भी कुछ लोगों के साथ तक सीमित था। वह जिनसे बात करती थी, उनमें चुनिंदा लोग ही शामिल होते थे। वह केवल कुछ लोगों के साथ ही हंस-मुस्कराकर बात करती थी। निखिल को आज तक समझ में नहीं आया कि तनुजा उससे बात कैसे कर लेती थी, क्योंकि खुद उसकी तो कभी भी आगे से बात करने की हिम्मत ही नहीं होती थी। तनुजा कुछ पूछ भी लेती तो एक बार सुनने पर तो वह सवाल ही नहीं समझ पाता और हड़बड़ाहट में कुछ भी नहीं बोल पाता था। हां, ये अलग बात थी कि तनुजा उसे बहुत समय से पसंद आ गई थी। तनुजा की निश्छल मुस्कान और सीधी साफ बातें उसे बहुत पसंद थीं। एसएमएस की बातें अब निखिल के दिल तक उतरने लगी थीं, वह अब मन ही मन शायद तनुजा को चाहने भी लगा था, लेकिन इस मामले में उसका स्वभाव उसका साथ नहीं दे रहा था। एसएमएस पर तो वह काफी बातें कर लेता, लेकिन अभी भी तनुजा के सामने कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं होती थी, कि पता नहीं कौंनसी बात तनुजा को बुरी लग जाए और वह उसकी बात का बुरा मानकर उससे बातचीत करना ही बंद कर दे। वह हमेशा यही सोचता कि किस तरह तनुजा को खुश रखे और किस प्रयास से तनुजा को खुशी मिलेगी। ऑफिस वर्क में भी उसका कम मन लगता, वह तो अब दिन-रात बस तनुजा के ख्वाबों में डूबा रहता। और आज तो कमाल ही हो गया था, जब तनुजा उसके साथ-साथ ऑफिस के नीचे से आधा किलोमीटर दूर तक घूमते हुए आ गई थी। इस वक्फे में उनके बीच एक-दूसरे की फैमिली और फ्रेंड्स के बारे में कई बातें हुई थी। इसलिए वह आज इतना खुश था। नौ बजे तक ऑफिस में ही बैठा रहा, खुशी इतनी ज्यादा थी कि न पापा की डांट की चिंता थी न ही मम्मी के बनाए हुए स्वादिष्ट खाने की। वह ऑफिस के नीचे पार्किंग में था कि राजन का फोन आ गया, बोला गुरुजी आज तो आ जाओ, निखिल इंकार न कर सका, वह चल पड़ा।
वह एक मयखाना था। मयखाना शब्द शायद पुराना हो गया है, आज की मेट्रो सिटी में अब ये नाम बार और पब में तब्दील हो गए हैं। बार में राजन और उसके दो दोस्त पहले ही मौजूद थे। बीयर मंगवाई गई। ऐसा नहीं था कि आज निखिल पहली बार बीयर पीने जा रहा था, पापा-मम्मी से चोरी-छुपे कई बार वह दोस्तों के साथ बीयर के घूंट लगा चुका था। बार में किसी परिचित के मिलने की संभावना हो सकती थी। एक बीयर के सिप लेते हुए उसने बीच में तीन सिगरेट भी फूंक दी थीं। राजन भी फुल मूड़ में था। राजन कुछ समय पहले एक कम्पनी में जॉब करता था, लेकिन आजकल खुद का कुछ बिजनेस खड़ा करने की फिराक में था। राजन पास के ही गांव का रहने वाला था और निखिल का अच्छा दोस्त था। लास्ट सिप लेते हुए पता चला कि वह पूरी एक बीयर पेट में उतार चुका है। दस बजे पापा का फोन आया तो झूठ बोल दिया कि प्रमोशन मिला है, इसलिए फ्रेंड्स के साथ पार्टी में है और आज घर नहीं लौट पाऊंगा। उस रात वह राजन के घर पर ही सोया। यह बीयर पीने की आदत अब जोर पकडऩे लगी थी और जो बीयर के घूंट वह साल में एक-दो बार लगाता था, वह आंकड़ा अब महीने में पूरा होने लगा था। पापा उसके घर न पहुंचने की आदत से परेशान हो चले थे, अक्सर घर नहीं आने पर रोज डांटते भी थे, लेकिन वह ऑफिस वर्क की वजह से लेट होने का बहाना बना देता। रात में राजन के घर सो जाने की बात कह देता। यह बहाने चल रहे थे, पापा सहन कर रहे थे। रात तीन बजे की बात थी, जब झपाक से निखिल की नींद उड़ गई थी, लाइट जलाकर देखी तो पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था। शायद उसने कोई बुरा ख्वाब देखा था। क्या देखा था, यह सोचने की जरूरत नहीं थी, उसे सपने की घटना पूरी तरह याद आ गई थी। वह साढ़े दस बजे सोया था। आज ख्वाब में उसने तनुजा को दुल्हन के रूप में देखा था। आज उसकी किसी और के साथ शादी हो रही थी, यह कल्पना करते ही जैसे निखिल का दिमाग फटने जैसी स्थिति में हो गया था। वह तनुजा की शादी की कल्पना भी नहीं कर सकता था।ऐसा नहीं है कि तनुजा उसकी बुरी आदतों से बिल्कुल अपरिचित थी। निखिल को भले ही यह खामख्याली रही हो। एक बार जब वह दोनों एक शादी के फंक्शन में मिले तो निखिल ताजा-ताजा बीयर के घूंट और सिगरेट फूंककर राजन के साथ शादी में पहुंचा था। शायद बातचीत के दौरान सिगरेट की बू या बीयर की बदबू का झोंका तनुजा की नाक तक पहुंच गया था कि तनुजा का हाथ स्वयमेव ही नाक पर पहुंच गया। तनुजा ने उस वक्त तो नहीं लेकिन अगले रोज ऑफिस में उसे चेताया कि ये आदतें अच्छी नहीं हैं। निखिल तनुजा से कितना प्यार करता है, शायद तनुजा इस बात से परिचित नहीं थी, लेकिन वह उसे अपना एक दोस्त मानने लगी थी। तनुजा की इस चेतावनी का बिल्कुल सीधा असर हुआ और उसी रोज निखिल ने बीयर और सिगरेट नहीं पीने की कसम ले ली। शायद निखिल ने इस बात को इस तरह लिया था कि तनुजा भी अब उससे ज्यादा नहीं तो कुछ-कुछ प्यार करने लगी है। अब उसके कदम जमीन पर नहीं, आसमान पर पहुंच गए थे। अब वह बिल्कुल बदल गया था। राजन के उकसाने पर भी बार की ओर उसके कदम नहीं उठते थे। अब वह अपनी पुरानी दिनचर्या में, एक शरीफ युवक बनने की प्रक्रिया में लौट रहा था। अब बीयर और सिगरेट से उसने दूरियां पैदा कर ली थीं। निखिल और तनुजा की दोस्ती सही ट्रेक पर चल रही थी कि दो महीने बाद तनुजा ने अपनी सगाई पक्की होने की सूचना निखिल को सुनाई। धरती में दरार पैदा होने की बातें तो शायद गलत होती हों, लेकिन निखिल यह एक वाक्य सुनते ही जड़वत रह गया था। तनुजा ने पूछा कि क्या हुआ तो, एक मिनट बाद वह कुछ सोच पाने की स्थिति में आ पाया था। तब उसने चकनाचूर दिल के साथ तनुजा को सगाई की बधाई दी। उसने हालांकि तनुजा को कभी प्रपोज नहीं किया था, और न ही कभी प्यार करने की बात बोली थी। लेकिन उसकी ख्वाबों की फेहरिस्त तनुजा को अपने घर दुल्हन के रूप में लाने तक पहुंच चुकी थी। वह अपने और तनुजा के भावी जीवन की बड़ी-बड़ी कल्पनाएं कर चुका था। ठीक पन्द्रह दिन बाद तनुजा की सगाई होनी थी। बीच के चौदह दिन निखिल का दिल कितने खून के आंसू रोया था, यह बयां कर पाना मुश्किल है। घर में गुमसुम रहना, ऑफिस में सिरदर्द की बात कहकर काम को टालना और हर वक्त अपनी गलतियों को कोसना। अब निखिल की रिजर्व किस्म और क्रिएटिव माइंड भी जैसे कुंद पडऩे लगे थे। सगाई के ठीक एक रोज पहले तनुजा ने फोन किया था कि उसे सगाई में जरूर आना है। वह सगाई के रोज घर में कमरे में ही बंद रहा। पता नहीं क्या-क्या सोचता रहा। वह सोच रहा था कि तनुजा ने उसका साथ क्यों छोड़ दिया, लेकिन असल में उनका साथ था ही कब, वे तो आपस में एक अच्छे मित्र ही बन पाए थे। उनके बीच शायद प्यार का रिश्ता तो अभी पनपा ही नहीं था। नहीं, निखिल ने इस विचार को झटक दिया, अगर ऐसा ही था तो क्यों निखिल का दिल दर्द से डूबा हुआ लग रहा था, क्यों तनुजा का चेहरा याद आते ही उसकी आंखें पलभर में गीली होने लगती हैं। उसे प्यार हुआ था, तनुजा को वह दिलोजान से चाहने लगा था, यहां तक कि तनुजा के साथ अपनी जिंदगी बसाने के लिए वह अपने संस्कारवादी परिवार के संस्कारों को भी तोड़ सकता था। वह अपने पापा और मम्मी की डांट, उनका गुस्सा, बड़े भैया की फटकार भी सहन कर सकता था। लेकिन शायद यह प्यार एकतरफा होकर रह गया था। उसने तनुजा को कभी अपनी बात समझाने की चेष्टा ही नहीं की थी। दो महीने बाद तनुजा की शादी हो गई। निखिल शादी में जाने की सोच भी नहीं सकता था। तनुजा की शादी के रोज भी उसने छुट्टी नहीं ली थी। उस रोज शाम आठ बजे जब वह ऑफिस से निकला तो सोच रहा था कि अब तनुजा के दरवाजे पर उसकी बारात आ गई होगी। इन दो महीनों में उसकी हालत दयनीय हो गई थी। वह ऑफिस से निकलकर पार्किंग में आया तो राजन का फोन आ गया। राजन कह रहा था, अरे गुरुजी आप तो याद ही नहीं करते, यहीं बार में बैठे हैं, मूड़ हो तो आप भी आ जाओ। निखिल ने फोन काट दिया, उसे तनुजा की चेतावनी याद आ रही थी। तनुजा की चेतावनी पर उसने अपने आपको बिल्कुल सुधार लिया था। उसे बीयर और सिगरेट से चिढ़ हो गई थी। तनुजा के लिए उसने खुद को बिल्कुल बदल लिया था। लेकिन आज तनुजा की शादी है। निखिल यह दर्द सहन नहीं कर पा रहा था। डेढ़ घंटे तक वह पार्किंग में इन्हीं बातों पर मनन करता रहा, आखिर दस बजे उसके कदम मयखाने की ओर उठने लगे थे, अब उसे पापा की डांट और तनुजा की चेतावनी बेमानी लग रही थी। उसके और शराब के बीच की दूरियां घट रही थीं और बढ़ गई थीं तनुजा और उसके बीच की दूरियां। प्यार के दर्द, शराब और सिगरेट के जंजाल में वह कितने दिन जी पाया, यह कह पाना मुश्किल है। कहानी लिखने से पहले मैंने भी इस कहानी के ऐसे क्लाइमेक्स की कल्पना नहीं की थी।
- एक बात आखिर में और कह दूं, लव आजकल फिल्म का गीत ये दूरियां मुझे बहुत पसंद आया है, कहानी का टाइटल इसी की उपज है। कहानी के बारे में यह भी याद रखें कि निखिल के पिता के रूप में मैं यदि ५० वर्ष की उम्र का रहा होता और मेरा फरजन्देआलम ऐसी आदतों का शिकार होता तो शायद उसके गम में मैं भी इस फानी दुनिया से रुख्सत हो गया होता। क्योंकि जालिम हम भी कम इमोशनल नहीं हैं इस दुनिया में।

Monday, 7 September 2009

शीशे की अयोध्या

तब मेरी उम्र बमुश्किल आठ या नौ बरस रही होगी, हमारे छोटे से गांव में एक मिडिल तक स्कूल था, बचपन में पढ़ाई करने कम, हम खेलकूद के लिए स्कूल अधिक जाते। कभी नीम, पीपल के पेड़ों पर चढ़कर लुकाछिपी खेलना तो कभी गुल्ली डंडा के खेल में फैसला नहीं होने पर एक दूसरे से झगड़ पडऩा। दोपहर में आधे घंटे के लिए स्कूल से छुट्टी मिलती तो रास्ते में धूल उड़ाते, एक दूसरे को टंगड़ी लगाते घर पहुंचते। मैं शाम को घर पर बड़े भैया के साथ रामायण पाठ करता, यही कोई एक-डेढ घंटे। रामायण के अंतिम कांड में रामराज्य का वर्णन था, मुझे भी अपने गांव का माहौल उस समय रामराज्य से कम नजर नहीं आता था। और मैं गांव को अयोध्या समझता।
... यह रोज की बात थी, हमारे घर के बड़े से आंगन में हमें एक हरिजन वृद्धा झाड़ू बुहारते हुए मिलती। उम्र यही कोई साठ वर्ष रही होगी, चेहरे पर घनी झुर्रियां और आगे से दांतविहीन पोपले होठों को खोलकर वह हंसते हुए हमारा स्वागत करतीं। अम्मा से रोटी की मांग करते मैं जब आंगन में उछलकूद मचाता, तो वह मुस्कुराते हुए कहतीं कि बेटा ज्यादा शैतानी नहीं करते। मैं रोटी खाता रहता और उनको झाड़ू बुहारते देखता रहता। इस मेहनत के बदले उन्हें हमारे घर से मिलती एक गेहूं की मोटी रोटी। यह हमारे घर की रीत नहीं, बल्कि गांव के सभी घरों से उन्हें झाड़ू के बदले एक-एक रोटी दी जाती। फिर भी वह खुश थीं।
कह नहीं सकता, लेकिन मुझे शुरू से ही उनसे कुछ लगाव हो गया। नाम था बादामी। मैं उन्हेंं अम्मा कहने लगा। हल्की झीनी पैबन्द लगी साड़ी और हाथ में झाड़ू लिए वह पूरे गांव का फेरा लगातीं। एक बात और उनके साथ गबरू कुत्ता होता। गधे से थोड़ा कम ऊंचाई का यह कुत्ता देखने में ही खतरनाक लगता, इसलिए गांव के लोग कुत्ते के नजदीक नहीं आते। मैं बादामी अम्मा का थोड़ा नजदीकी था, इसलिए गबरू मुझसे कुछ नहीं कहता था। इस बात से दूसरे बच्चों के बीच मेरी कुछ धाक जम गई थी। दूसरे बच्चों को मैं गबरू के नाम से उन्हें डरा भी देता था। इतनी समझ नहीं थी, फिर भी १५० घरों के छोटे गांव में सबसे परिचित हो गया था। बादामी अम्मा के सात बेटे थे।
ज्यादा कुछ काम तो उनका परिवार करता नहीं था। न तो गांव के दूसरे किसानों की तरह खेती का काम था, न ही कभी भेंस या गाय जैसे पशुओं का पालन करते थे। हरिजन होने के कारण गाय रखने पर तो शायद पूरा गांव उनके विरोध में उतर आता। मेरी अम्मा भी कैसे अक्सर मुझे डांटती थीं, जब मैं बादामी अम्मा को छू लेता। डांटते हुए हाथ के हाथ नहलाने की जिद करतीं, मैं रोने लगता तो पानी के छींटे मारकर मुझे पवित्र करतीं और फिर बादामी से दूर रहने को कहतीं। इसमें क्या रहस्य था, तब समझ नहीं आता था। और हां, एक बात और अक्सर मेरी बड़ी दीदी कहानी सुनातीं कि पहले बादल धरती पर बहुत नीचे थे। एक बार बादामी सिर पर कूड़े का टोकरा उठाए जा रही थीं। बादल कुछ ज्यादा नीचे हो गए, तो बादामी का टोकरा बादलों से अटक गया। बादामी को गुस्सा आया तो झाड़ू से बादल को पीटने लगीं, पिटाई के डर से बादल इतना ऊंचा हो गया कि फिर कभी धरती के नजदीक नहीं आया। कहानी सुनाते ही दीदी हंसने लगती और मैं बादामी अम्मा के इस चमत्कार का लोहा मानता कि बादामी अम्मा से तो बादल भी डरते हैं।
बादामी अम्मा का छठा बेटा सुनील मेरी ही क्लास में था। वह हरिजनों का पहला बच्चा था, जो स्कूल तक पहुंचने में कामयाब हुआ था, वरना उससे बड़े दूसरे बेटे तो सुअर, भेड़-बकरी ही चराते थे। बादामी अम्मा के पांच बेटों की शादी हो गई थी। इस बार जब उनके पांचवें बेटे की शादी हुई तो वो नई-नवेली बहू को लेकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने आई। अब बादामी अम्मा को काम से राहत हुई, अब उन्हें झाड़ू लगाने और कूड़े का टोकरा उठाने से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा शायद बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन मेरी अम्मा बतातीं थीं कि बादामी अम्मा की बड़ी बहुएं मेहनत नहीं करना चाहतीं, इसलिए वे बादामी अम्मा से अलग रहती हैं। ऐसा शायद दस दिन हुआ होगा जब बादामी अम्मा को झाड़ू नहीं लगाना पड़ा। ग्यारहवें दिन जब मैं स्कूल से इंटरवैल के टाइम पर घर पहुंचा तो बादामी अम्मा को फिर झाड़ू पकड़े पाया। आज अम्मा के साथ उनकी पांचवीं बहू भी नहीं थी, साथ था तो गबरू और झाड़ू। अब बादामी अम्मा को फिर से काम करना पड़ रहा था, पांचवा बेटा भी अब उनसे अलग हो गया था। लेकिन हमारे लिए बादामी अम्मा का वही प्यार बरकरार था। शायद बादामी अम्मा को काम करना अच्छा लगता था, इसलिए वह पूरे गांव का झाड़ू निकालने के बाद भी हंसती रहती थीं।
दिन गुजरते गए, मैं गांव के मिडिल स्कूल से पास होकर सैकण्डरी स्कूल में आ गया, चार साल बाद भी हालत जस के तस थे। बादामी अम्मा की दिनचर्या यथावत थी, वह रोज झाड़ू निकालतीं और गावं के हर घर से एक रोटी पातीं। मैं अब भी दिल से उनके नजदीक था। टाइम मिलने पर उनके गबरू के साथ खेलता, बादामी अम्मा अब भी मुझे दुलार करतीं। मेरी अम्मा के साथ अपने बेटे-बहुओं की बातें बतातीं, पर उन्हें शायद कोई गिला नहीं था। इन दिनों एक आश्चर्यजनक परिवर्तन मैं अपनी अम्मा में देख रहा था, अब जब मैं बादामी अम्मा के साथ खेलता तो वह मुझे डांटती नहीं थी। न ही कभी नहलाने की जिद करतीं। अब बादामी अम्मा के हाथ-पैर जवाब देने लग गए थे। कुछ दिन पहले उनके छठे बेटे सुनील, जो आठवीं क्लास तक मेरा क्लासमेट रहा था, की शादी हो गई थी। अब वह भी अपनी बीवी के साथ अलग रहने लग गया था।
पन्द्रह दिन की छुट्टियों के बाद वापस भाई साहब ने जयपुर बुला लिया अब डॉक्टरी में प्रवेश के लिए पीएमटी का एग्जाम देना था। मैं डॉक्टर तो नहीं बन पाया, लेकिन एक समाचार पत्र में संवाददाता हो गया था। गांव का जीवन भी जैसे एक बिसरी पृष्ठभूमि की तरह पीछे छूटने लगा था। पिताजी ने फोन कर गांव आने को कहा। चार दिन की छुट्टी थी। मैं गांव पहुंचा ही था, कि अम्मा ने सूचना दी, बेटा आज सुबह बादामी चल बसी। मैं एकाएक कुछ समझ न सका। लेकिन अभी तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। मेरे पूछने पर अम्मा ने बताया कि सभी बहुएं अलग रह रही थीं, हाथ-पांव भी साथ छोड़ गए थे। पिछले कुछ दिनों से झाड़ू लगाने भी नहीं आई। शायद बीमारी से मौत हो गई। एक बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी। बादामी अम्मा अब सब कष्टों से दूर थीं। मेरे बचपन के गांव का रामराज्य और अयोध्या जैसा अनुभव अब पीछे छूट गया था। वह शायद शीशे की अयोध्या थी, जो अब चकनाचूर हो गई थी।

Wednesday, 5 August 2009

आजकल का 'लव'

अभी ताजा-ताजा फिल्म देखी है, लव आजकल। फिल्म देखने जब सिनेमाहॉल पहुंचे, गलती हुई, जो सिनेमाघर कह दिया। ऐसा कैसा सिनेमाहॉल जहां दोपहर के शो का टिकट 140 रुपए में मिलता है। तीन बजे का 160 में, छह बजे का 170 में और नाइट शो का टिकट मांगा तो 180 रुपए देने पड़ेंगे। यहां टिकट की कीमत भी 'लवÓ की सांसों की तरह हर घंटे के हिसाब से बढ़ती है। फिल्म में भी कुछ ऐसा ही दिखाया है। पहली बाईलॉन के चुनिंदा घंटों में सिनेतारिका सितारे की बांहों में आ जाती है और फिर इसे किस में बदलते देर नहीं लगती। अब आप हमारी बात को पुरानी मानसिकता कहकर खारिज कर देंगे। रूढि़वादी विचारधारा का मानुष कह कर हमें अपशब्द कहने की बात भी दिमाग में ला रहे होंगे। आज के जमाने में किस कर लेना कौंनसा गलत है। चलिए नहीं कहते गलत, अभी थोड़ी देर और झेलिए, आपको भी रुढि़वादी विचारक साबित न कर दिया तो हमारा नाम बदल दीजिएगा। यूं लव के भी आजकल कई मायने हो गए हैं। जवां छोकरे की जुबां और धड़कन में हर दूसरी लड़की के लिए यह कशिश जोर मारती है। बाईलॉन के बाद चंद मिनटों की बातचीत जब कुछ टाइम चल जाए और मोहतरमा आपको एक मुस्कराहट दे दे तो जनाब को आई लव यू कहते देर नहीं लगती। फिर लव की पटरी दौड़ती है रेस्टोरेंट और कॉफी हाउस की ओर, डिस्कोथेक में अधनंगे नांच की ओर, कुछ कसर बाकी रह जाए तो 'पीनेÓ की स्थिति का फायदा उठाने की हो सकती है। फिर 21वीं सदी के खुलेपन का एक और फायदा देखिए, बाद में आपस में बता भी देते हैं कि लव के किन क्षणों में उन्होंने 'लवÓ किस-किस तरह से किया था। फिल्म देखते-देखते हमने कितने ही लोगों को इन डायलॉग्स पर खीसें निपोरते देखा था। फिर बारी आती है ब्रेक अप की और एक-दूसरे से दूर चले जाने की। नायक-नायिका में अभी भी लव के कीटाणु जोर मार रहे हैं, इसलिए मन की असली बात एक दूसरे को बताने की कोशिश कर रहे हैं। 65 के टाइम के वीर सिंह को एक ही बार में पता चल गया था कि उसे लव हो गया। नायक भी कोशिश कर रहा है, 15-16 बार में से एकाध बार का लव तो ध्यान आ जाए। पर नहीं आता ध्यान, आता है तो बर्बाद करके। गोल्डन गेट के सपने को चकनाचूर करके। ठहरिए, हम बीच में एक बात तो भूल ही गए। जब दोनों को लव का पता ही नहीं चलता तो नायिका एक दूसरे 'कबाब में हड्डीÓ से शादी कर लेती है। 'कबाब में हड्डीÓ की उपमा हमने नहीं दी, ये फख्र हमारी पीछे वाली सीट पर बैठे एक भाई साहब को हासिल हुआ। शादी करते वक्त भी अमर प्रेमियों को पता नहीं चलता कि कीटाणु अब विशाल बीमारी का रूप लेने वाले हैं, लेकिन ऐन हनीमून से पहले नायिका को 'असली लवÓ का पता चल जाता है। वह 'कबाब की हड्डीÓ को छोडऩे को तैयार हो जाती है और कहती है कि वह उसके साथ नहीं रह सकती। अब पीछे की सीट पर बैठे भाई साहब की सारी सहानुभूति 'कबाब की हड्डीÓ के साथ थी। वो अब नायिका को गालियां देने के मूड में थे। अब वे रुढि़वादी हो गए थे। अब उन्हें नायक-नायिका से मतलब नहीं था, वे चाहते थे कि नायिका 'कबाब की हड्डीÓ को ही अपना पति मान ले। क्यों साहब हैं न आप भी हमारी तरह रूढि़वादी, ये सीन तो आपको भी नहीं सुहा रहा होगा। चलिए छोडि़ए आप भी सोच रहे होंगे कहां से लिखकर कहां तक घसीट दिया। सच बताएं जब हम ये आर्टिकल लिख रहे थे, शायद हमारे चढ़ी हुई थी।अजी नहीं साहब दारू नहीं, लव की खुमारी!

Saturday, 18 July 2009

लालू की रेल में घुसपैठ

बात एकदम सही है और वाजिब भी, दो मंजिला ट्रेन चलाने का आइडिया भूतपूर्व मंत्री साहब दें और वाहवाही लूटें ममतादी। इसलिए लालूजी का गुस्सा दिखाना एकदम उचित है। और हो भी क्यों नहीं साहब वर्षोंं से घाटे में चल रही रेल को मुनाफे में इस तरह दिखाया कि आईआईएम और हार्वर्ड मैनजमेंट के तुर्रमखां विशेषज्ञ भी अन्दाजा नहीं लगा पाए कि रेल को इतना फायदा हो कैसे रहा है। अब ममता दीदी भी उनकी तर्ज पर रेल का प्रबंधन करना चाहती हैं, तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन बात एक ही बुरी है कि सारे आइडिए निकले लालूजी की खोपड़ी से और लागू करने की जय-जय ममता उठा रही हैं। लालू यादव ने उन्हें जो खुले चैलेंज दिए हैं उनसे हम तो सौ फीसदी सहमत हैं और प्रतीक्षा करिए आर्टिकल पूरा पढऩे तक आपकी मुंडी भी सहमति में ऊपर-नीचे हिलने लगेगी।
सबसे बड़ी बात मैनेजमेंट की है। जिस रेल को बड़े-बड़े मैनेजमेंट विशेषज्ञ मुनाफे में लाने की तरकीब नहीं ला पाए उसे हमारे लालूजी ने साबित कर दिखाया। शुरू से ही इसके लिए विलायती प्लानिंग्स की बजाय देशी नुस्खों से काम चलाया। अरे साहब बड़े-बड़े वीवीआईपीज को मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पिलवा दी। मालभाड़े में भले ही आपकी जेब निचोड़ी हो, लेकिन आवाजाही में एक पैसा भी किराया नहीं बढ़ाया। और ऐसा पूरे पांच साल चला। रेल के अन्दर भी छप्पनभोग उपलब्ध कराए। कुली भाईयों की तो जैसे लॉटरी लग गई, लालूजी अवतार की कुछ ऐसी कृपा हुई कि सबको पक्की नौकरी दे दी। रेल दुर्घटनाएं भले ही खूब हुई हों, और होनी को भला टाल भी कौंन सकता है, लेकिन मृतकों के परिजनों को क्या कम सहायता दी। लालूजी के इन मंत्रों की गूंज तो आईआईएम के गुरुओं तक पहुंची इसलिए लालूजी से गेस्ट लेक्चर कराया। और विदेशी हार्वर्ड के मैनेजर्स ने भी अपने लालूजी का लोहा माना और उन्हें अपना गुरू बना लिया।
अब आप बार-बार यह मत कहो कि लालूजी ने रेलवे को अपनी गायों की तरह दुहा। सब फायदे के पद अपने लम्बे-चौड़े कुटुम्ब वालों को दे दिए। सारी रेल योजनाएं बिहार के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गईं। बिहार के गांव-गांव को लोहपथगामिनी से जोड़ दिया और बेचारे हमारे करौली वाले अभी रेल को काले धुंए वाले लम्बे वाहन के अलावा पहचान ही नहीं पाते। रेल के डिब्बे बनाने वाले कारखाने और दूसरे उद्योग संयंत्र भी बिहारियों को दे दिए। दरअसल ये सब बातें आपकी दकियानूसी और छोटी सोच की हैं। अरे भई जब सारा देश रेलवे के फायदे से मंत्रमुग्ध हो तो अपने भाई-भतीजों को नौकरियों में फिट कर देना कौंनसी बुरी बात है। अब रेल के डिब्बों की फैक्ट्री कहीं तो खुलनी ही थीं, बिहार में खोल दीं तो कौंनसा गुनाह कर दिया। और अन्त-पन्त तो रेल ने करौली में भी दर्शन देने ही हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालूजी ने एक से एक योजनाएं बनाईं। पैसा तो हर योजना में खर्च होता है। लागू करने में टाइम तो लगता ही है, अब टाइम कुछ ज्यादा लग गया तो यह तो कोई बात नहीं हुई कि ममताजी फायदा उठा लें। लालूजी की बात से हम एकदम सहमत हैं कि दो मंजिला ट्रेन को चलाओगे कैसे, कहां-कहां ऊपर के बिजली के तार हटाओगे और कहां-कहां सुरंगों को ऊंची करोगे। ऐसे काम अंजाम देने का नुस्खा तो केवल अपने लालूजी को आता है। आपने भले ही न सुना हो, पर हमारे कान इतने कच्चे नहीं हैं, चारे की पूरी आमदनी कैसे राख हो गई, इसकी भनक हमें भी है। इसलिए लालूजी से बड़ा मैनेज कर सकने वाला विशेषज्ञ कोई हो ही नहीं सकता। अब ममतादी बिना बात के ही उन्हें श्वेत पत्र जारी करने की धमकी दें यह अच्छी बात तो नहीं है। हमारी नजर में लालूजी जैसा ईमानदार आदमी अब तक रामराज्य में भी नहीं हुआ होगा, इसलिए ममतादी समझ लीजिए कि वे आपकी गीदड़ भभकियों में आने वाले नहीं ।

कमाई की गणित

लो जी साब ये तो कमाल हो गया! हमारे मीडिया वाले जिस तरह सचिन और माही की कमाई पर निगाह गड़ाए बैठे रहते हैं। और हर दस-पन्द्रह दिन में एक नॉन स्टॉप खबर बना देते हैं, कि बोर्ड फलां खिलाड़ी को इतना पैकेज दे रहा है और फलां खिलाड़ी ने गेम-कम-एड की कमाई से नया रेस्टोरेंट खरीद लिया है। लेकिन कमाई क्या होती है ये तो पहली बार अब पता चला है। आपको भले ही यह सुनकर कोई फर्क नहीं पड़ा हो, लेकिन सच मानिए हमारे होश तो अब तक ठिकाने नहीं हैं। टेनिस में बादशाहत की कुर्सी तक पहुंच चुके फेडरर से हमें तो बहुत जलन हो रही है। जनाब ने एक साल में ही 48 करोड़ की कमाई की है और हमारे धोनी-सचिन आठ नौ करोड़ ही कमा पाते हैं। बापूजी ने खूब समझाया कि बेटा पढ़ाई-लिखाई करके या तो डॉक्टर बन जाना नहीं तो कहीं किसी खेल-वेल में ही लग जाना। हमने भी कोशिश खूब की पर पढ़ाई की मोटी-मोटी किताबों को देखते ही नींद आने लगती। पिताजी खूब कहते पर हमारा मन चन्द्रकांता संतति और प्रेमचंद के ज्ञान खजाने के अलावा कहीं न लगा। साथ में रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाले सस्ते उपन्यासों का भी ऐसा चस्का लगा कि जनाब स्नातक आते-आते हमारी गाड़ी पचास प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाई। खैर गलती हुई और अब हो भी क्या सकता है। पर एक बात आपको बता दें हमारा किस्मत पर अटल विश्वास है, इसलिए जब तकदीक में कलमघसीट बनना लिखा था तो भला होनी को कौंन टाल सकता है।ऐसा नहीं है कि हमने बापू का नाम बिल्कुल ही मिट्टी में मिल जाने दिया। जब डॉक्टरी में दाखिला नहीं मिल पाया तो हमने बापूजी के दूसरे नुस्खे पर अमल करना शुरू कर दिया। रोज सुबह सवाई मान सिंह स्टेडियम में जाते और क्रिकेट की प्रैक्टिस करते। अब आप यह कहेंगे कि हमने क्रिकेट में जाने की ही क्यों सोची, तो आपको बता दें कि टीवी पर मैच आते वक्त आदमी खाने का कौर निगलना भूल सकता है पर नजर टीवी से इतर नहीं फिरा सकता। तो हम रोज एसएमएस स्टेडियम जाते। पर ससुर किस्मत ने यहां भी दगा दिया, जब कोच साहब के सामने हमने पहली बार खेला तो गेंद नजदीक आते-आते हमारी आंखें मिच गईं और गेंद ने हमारी विकेट उड़ा दी। गेंद के डर से हमारी आंख बंद होने को कोच साहब ने ताक लिया और अगले रोज से न आने की हिदायत दी।हिम्मत हमने यहां भी नहीं हारी और पांच फुट तीन इंच की अपनी कम लम्बाई बढ़ाने के लिए दोस्त की सलाह पर जिम जाना शुरू कर दिया। क्रिकेट खेलने के पीछे एक वजह यह भी थी कि साहब इतनी कम लम्बाई पर हमें और कहीं तो दाखिला मिल नहीं सकता था। खैर खुद को दूसरा सचिन समझने की भूल हमारी खत्म हुई और हमने जिम में कदम रखा। जिम वाले भाई साहब ने पहले दिन ही धमका दिया कि लम्बाई तो बढ़ेगी नहीं, सीना बढ़ाने-बाजू फुलाने के चक्कर में लम्बाई कम होने के चांस अधिक हैं। तो साहब यहां से भी तौबा बुली और हम इस दुनिया में आ गए। आज आपके सामने व्यथा कह दी तो दिल हल्का हो गया। हालांकि बापूजी ने यहां भी हमारी नालायकी समझी और कहा कि हमने जानबूझकर क्रिकेट में नाम रोशन नहीं किया। जब कलमघसीट नौकरी में कदम रख रहे थे तो फिर बापूजी ने नई सीख दी, बेटा प्रेमचन्द और दूसरे लेखक, पत्रकार अपनी कमाई से बच्चे नहीं पाल पाते। पर लेखकी का शौक ऐसा सिर चढ़ा कि अब तक नहीं उतरा। इसलिए रोज कहीं न कहीं कुछ लिखकर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। आज आपके सामने यह नया तुर्रा छोड़ दिया इसलिए आप अब तक हमें भुगत रहे हैं। खुदा खैर करे!

Tuesday, 7 July 2009

निवेश का खेल

ऑस्ट्रेलिया में दिनों-दिन हो रही हमारे छात्रों की पिटाई ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के दिल में चिंता का गहरा जख्म बना दिया है। मंत्री साहब की चिंता वाजिब है और अब उन्होंने इसके लिए एक रामबाण इलाज भी खोज लिया है। ऐसा नहीं है की अब हमारे बच्चे कहीं पढ़ नहीं पाएंगे या विदेशी शिक्षा नहीं ले पाएंगे। जनाब की मानें तो अब यहीं पर सारे छात्रों को बुला लिया जाए और छात्र ही क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों को यहीं खुलवा लेंगे। हमारे पास क्या जर- जमीन की कमी है जो विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुदान में नहीं दे सकते! भई आखिर ये हमारे सपूतों के भविष्य का मामला है। और इसकी चिंता मंत्री साहब को नहीं होगी तो क्या हमें होगी। विदेशी संस्थानों को यहाँ बुलाने को पढ़ी- लिखी भाषा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। और जब विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आयेंगे तो हमारी शिक्षा अपने आप विलायत के स्तर की हो जायेगी। वैसे भूलने की बात नहीं है, पर मंत्री साहब के पास बहुत काम होते हैं, इसलिए भूलना बड़ी बात भी नहीं है। साहब आपको याद दिला दें, जब- जब यहाँ विदेशी निवेश हुआ है, हमेशा घाटा ही हुआ। अपनी मूंछ ऊँची रखने वाले राजाओं की आपसी मारकाट में तेमूरलंग, मुग़ल राजाओं का निवेश हुआ तो ऐसी लूटमार मची कि सोने कि चिडिया कहलाने वालोँ के खाने के लाले पड़ गए। फिर गोरों की 'फूट डालो और राज करोÓ की कूटनीति के निवेश को हमने दो सदी तक भुगता। एक कम्पनी के नाम से घुसपैठ बनाकर गोरे साहब ऐसे जमे कि निकलने का नाम ही नहीं लिया, ये तो भला हो अपने गांधी बाबा का, जिन्होंने एक अधझुकी लाठी के सहारे ही फिरंगियों को धूल चटा दी। मियां मुर्शरफ ने भी यहां गजब का निवेश किया। एक तरफ तो साहब आगरा में बातचीत करने आए और दूसरी तरफ करगिल में घुसपैठियों की पूरी फौज घुसा दी। हमारी सरकार भी इतने दिन बाद जागी कि सैकड़ों जवानों की बलि चढ़ गई। चीनी भाईयों के निवेश की चोट तो सीमारेखा की क्षति के रूप में अब भी दुखती है। सेबी ने निवेश की खुली छूट दी तो हमारे दौड़ते सांड की हवा निकल गई और सेंसेक्स 25 से 8 हजार पर गिर गया। और अपनी बातें याद नहीं हैं तो पड़ौसी मुल्क की तरफ निगाह घुमा लें। मियां मुर्शरफ और उनके पूर्वज राष्टï्रपतियों ने अमरीकी अंकल को पाकिस्तान में घुसने की इजाजत क्या दी, अंकलजी लाठी के बल पर जमकर ही बैठ गए, और साहब ऐसा निवेश किया कि अब वायु, जल, थल सब तरह के अड्डे पाक सीमा में बना लिए हैं। अब तो पाकिस्तान इन अड्डों की जमीन पर अपना हक भी नहीं जता सकता। अफगानिस्तान में तालिबान की उत्पत्ति और पतन, नेपाल में माओवादियों की दादागिरी, सब विदेशी निवेश के परिणाम हैं। इसलिए विदेशी निवेश को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझना हर चमकती चीज को सोना समझना है। यूं मंत्री साहब की मर्जी है, वे जब चाहें, जिसे चाहें झण्डाबरदार बनाकर यहां निवेश करा सकते हैं, हम कौंन होते हैं, रोकने वाले। अपन तो साहब खाली-पीली सलाह दे सकते हैं, मानो या न मानो।

yeh alekh न्यूज़ टुडे jaipur के 7 july ke ank me prakashit hua है।

Sunday, 8 February 2009

भीष्म को कैसे क्षमा कर दें.

मुझे महाभारत का एक प्रसंग याद आ रहा है। जब भीष्म विदुर के साथ बात करते हुए कहते हैं, मैं कभी भी पांडवों का बुरा नही सोच सकता। न ही कभी उनके हितों के साथ समझोता करूँगा, लेकिन विदुर जीवन में मुझसे कुछ ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं जिनका प्रायश्चित करना नामुमकिन है। एक अपाहिज अंधे की जिद पर मैंने पिताविहीन पांडवों को कुंती समेत वारणावत भेज दिया था। तब इस दुर्योधन ने उन्हें .जला मारने की कुचेष्टा की, इसने जुए के जरिये द्रोपदी का अपमान किया, लेकिन मैं कई अवसरों पर शांत रहा। आज जब पांडव १३ वर्ष के वनवास के बाद वापस हस्तिनापुर आना चाहते हैं। तब भी इस दुर्बुद्धि ध्रतराष्ट्र को उनके आने पर शोक है। जब भी मैं इसके हित की बात करना चाहता हूँ, यह पुत्रमोह में पड़कर रोने लगता है। आख़िर यह भी तो मेरे बेटे के समान है, मैं इसे भी रुलाना नहीं चाहता। उस समय विदुर का प्रश्न जैसे ज़माने भर की कड़वाहट लिए हुए था, तातश्री फिर आपको ये राज्य ध्रतराष्ट्र को सौंप देना चाहिए, क्योंकि आप पांडवों के आंसू देखने के आदी हो चुके हैं। आपको ये भी ध्यान नहीं है कि न केवल इन्द्रप्रस्थ बल्कि हस्तिनापुर के सिंघासन पर भी युधिष्ठिर का ही हक़ बनता है। इसलिए ये आपका कर्तव्य है कि आप युधिष्ठिर को ससम्मान उसका राज्य दिलवाएं। आप जानते हैं कि अब उनके साथ मुरली मनोहर भी हैं और वैसे भी यदि युद्ध हुआ तो अर्जुन और भीम ही किसी भी देश की कितनी भी बड़ी सेना और रथियों को हरा सकते हैं। फिर आपको किस प्रमाण की आवश्यकता है वैसे भी सारे कुरु योद्धाओं ने विराट युद्ध में अर्जुन के बाणों का स्वाद चख ही लिया है। बड़बोले कर्ण, घमंडी अश्वत्थामा, असभ्य दुर्योधन नीच दुशासन और आप जैसे महान योद्धा, गुरु द्रोण, आचार्यवर कृप आदि सब वीरों को अकेले पार्थ ने पीछे कर दिया था। आपके श्वेत अम्बर के अलावा उसने सबके वस्त्र भी उतार लिए थे। क्या फिर भी अंध भ्राता धृतराष्टï्र और मदांध दुर्योधन उनसे युद्ध करना चाहते हैं। क्या आप भूल गए हैं कि उन्होंने वचन निभाने की खातिर 13 वर्ष का वनवास पूरा किया है। एक वर्ष तक तो चाकर जैसी स्थिति में विराटनरेश की सेवा में बिताए हैं। क्या आपको नहीं पता कि अज्ञातवास की अवधि में पांडवों ने द्रोपदी समेत कितने कष्टï झेले हैं। यकायक पितामह भीष्म विचलित हो उठे। हाथ स्वयमेव सिर पकडऩे वाली मुद्रा में हो गए। विदुर तुम्हारी एक-एक बात जब सुनता हूं तो ह्रïदय में तीर की नोक जैसे चुभती है, लेकिन मैं क्या करूं। मैंने प्रतिज्ञा करते समय यह भी कसम खाई थी कि मैं हस्तिनापुर नरेश की आज्ञा की सदैव पालना करूंगा। मान लिया कि धृतराष्टï्र मेरे पुत्र जैसा है, लेकिन फिर भी वह राजा है और उसकी आज्ञा की खिलाफत करना मेरे वश में नहीं है। मेरी अटल प्रतिज्ञा है कि जो भी हस्तिनापुर को टेढ़ी नजर से देखेगा, मैं उसे बख्शूंगा नहीं, चाहे वह मेरे प्रिय पांडव पुत्र ही क्यों न हों। हालांकि यह जख्म मुझे आज भी टीसता है कि विधाता मैंने ऐसी कठोर प्रतिज्ञा क्यों की। मैं यह भी जानता हूं कि युद्ध हुआ तो अर्जुन के तीर किसी भी योद्धा को जीवित न छोड़ेंगे। मैं भी अजेय नहीं हूं। द्रोण शिष्य को धर्नुविद्या में कुछ नुस्खे तो ऐसे आते हैं कि भगवान शंकर के अतिरिक्त उसे धनुर्युद्ध में जीतना किसी के लिए भी संभव नहीं है। तुम ही बताओ क्या मुझे अच्छा लगेगा जब मेरा प्रिय अर्जुन मेरी छाती बींधेगा या अपने गुरु द्रोण के ह्रïदयस्थल में घाव बनाएगा या अपने बांधवों को मृत्यु के घाट उतारेगा, नहीं कदापि नहीं विदुर। मैं ऐसा नहीं चाहता, लेकिन नियति यदि यह चाहती है तो भला मैं ऐसा होने से कैसे रोक सकता हूं। सारांश: प्रस्तुत आख्यान के जरिए भीष्म पितामह के कर्तव्यबोध और उनकी विवशताओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

Tuesday, 27 January 2009

अभी जवान है इंडिया

सुबह से एक भाई साहब रेडियो पर चिल्ला रहे थे कि आज मुझे मोबाइल पर किसी ने गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओ का संदेश नही भेजा है। और बात यदि वैलेंटाइन डे की होती तो अब तक पचासों संदेश आ जाते। अरे भइया इस देश की बात ही ऐसी है। अभी एक भाई साहब ने भारत को अंग्रेजों की नजर में सपेरों का देश की तरह साबित करते हुए स्लुमदोग करोड़पति नाम से फ़िल्म बना डाली। इनकी माने तो हमारा देश अभी भी झोपड़पट्टी का कुत्ता है। जिसके पास दूसरो के सामने हाथ फेलाने के सिवा कोई काम नहीं। लेकिन ये भी गौरतलब है कि हमारे देश के वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजिनियर, आईटी एक्सपर्ट ही अमरीका को चला रहे हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में इकोनोमी के लिहाज से हमारे देश की कन्डीशन विश्व में सबसे बेहतर मानी जा रही है। और सबसे बड़ी बात, हमारे देश में युवाशक्ति विश्व में सबसे ज्यादा है। इसलिए कहें, अभी जवान है इंडिया।