Friday, 13 November 2009
ये प्रेम कहानी का सुखद अंत है
Monday, 2 November 2009
कामयाबी का लंदन प्रेम
Tuesday, 20 October 2009
मेरे गांव की दिवाली
Thursday, 15 October 2009
आगमन
जिन के अकुलाहट है भारी, तीन घड़ी तक कुछ नहीं कीन्हे।।
चौ. नगर द्वार आए जन-जन प्रभु राह तके और कछु नहीं दीखे।
सब ही बने गुरु इक-दूजे, अब आएंगे राम और सीते।।
चौ. दूर देखि उड़ती पग धूलि, मात् संग आए शत्रुघ्न।
भ्रात भरत की गति नहीं उज्ज्वल, बिसरे सब मात्-बांधवजन।।
चौ. नयन भरे जल, दरसन इच्छुक, प्रभु कैसे हों दरस तुम्हारे।
मो सम कौंन कृतघ्न दुनिया में, मोसे अच्छे लखन प्यारे।।
चौ. मंद गति, दीपक से उज्ज्वल, लखन संग आए त्रिपुरारी।
पीछे सीता और कपीश्वर, अवधजनों की भीड़ है भारी।।
चौ. चंचल नयन, गात कोमल और सिर पर जटा-जूट है भारी।
चौदह बरस बाद अवधीश्वर, झलक देख हर्षे नर-नारी।।
चौ. ज्यों पहुंचे प्रभु नगर द्वार पे, आशीर्वचन दियो कैकेई मां।
गुरू वशिष्ठ ने वचन सुनाए, सबसे गले मिले प्रभु कर्मा।।
सो. सब प्रसन्न नर-नारि, हर्षित मन दीपक जले।
अवध भाग गए जाग, भ्रात प्रेम की ये कथा।।
यदि आप उपरोक्त चौपाई और सोरठा का सारांश समझ गए हैं तो नीचे लिखी पंक्तियों पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, ये चौपाईयां रामायण या किसी अन्य धर्मग्रन्थ से नहीं ली गई हैं। इन चौपाईयों का लेखन मैंने अपनी अल्पबुद्धि से किया है। यदि किसी बंधुजन को कुछ गलत लगे और सुझाव देना चाहें तो स्वागत है।
अनुवाद: अयोध्या में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि के बाद वापस लौटने की खबर है। इससे लोग प्रसन्न हैं और अकुलाए हुए हैं। कई लोग तो अपना घरेलू कार्य छोड़े तीन प्रहर से प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ब्राह्मण जन लोगों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। सारे नगरवासी द्वार पर इकट्ठे हो गए हैं लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। प्रभु श्रीराम के आगमन के बारे में अटकलें लगाते हुए सब एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं और समझा रहे हैं कि प्रभु श्रीराम सीता और लक्ष्मण समेत जल्द ही यहां आएंगे। पैरों से उडऩे वाली रेत को देखकर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न तीनों माताओं को लेकर नगर द्वार पर पहुंचे। लेकिन भ्राता भरत की स्थिति अच्छी नहीं है। वे अभी भी श्रीराम के वनवास जाने के लिए खुद को उत्तरदायी मान रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें ध्यान ही नहीं है कि उनके आस-पास कौंन खड़ा है, वे केवल बड़े भाई राम के आगमन की राह तक रहे हैं। उनके नयनों में जल भरा हुआ है और उदास से खड़े भरत की प्रबल इच्छा है कि उन्हें जल्द से जल्द भगवान श्रीराम के दर्शन हो जाएं। वे मन में विचार कर रहे हैं कि मेरे समान कृतघ्न इस दुनिया में कौंन है। मुझसे अच्छा तो छोटा भाई लक्ष्मण है, जिसे चौदह वर्ष तक भैया की सेवा का मौका मिला है।इसी समय धीमे-धीमे चलते हुए प्रभु श्रीराम, जिनके चेहरे की आभा चारों ओर दीपक की रोशनी के समान फैली हुई है। लक्ष्मण और सीता समेत नगर द्वार पर पहुंचे। उनके पीछे ही वानर राजा सुग्रीव, हनुमान और बहुत सारे नगरवासी हो लिए हैं।चंचल नयनों वाले प्रभु श्रीराम जिनकी त्वचा अत्यन्त कोमल है, लेकिन सिर पर उनके अभी भी जटाएं लिपटी हुई हैं। लेकिन अयोध्यापति श्रीराम की चौदह वर्ष बाद झलक देखकर अयोध्या का हर नर-नारी प्रसन्न है और प्रभु श्रीराम की जय-जयकार कर रहा है।प्रभु श्रीराम जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे, सबसे पहले उन्होंने माता कैकेई के चरण छुए और उन्होंने श्रीराम को आर्शीवाद दिया। गुरू वशिष्ठ का आर्शीवाद लेकर प्रभु श्रीराम ने बहुत सारे नगरवासियों को भी गले लगाया।प्रसन्न मनों से अपने घर लौट रहे नगरवासियों ने घर-घर में दीपक जलाए, जिससे पूरी अयोध्या रोशन हो गई। दूसरी ओर भगवान श्रीराम और भरत के देर तक हुए मिलाप ने दो भाईयों के प्रेम की कथा कही, जिसे देखकर लगा कि अब सही मायनों में अयोध्या का भाग्योदय हुआ है।
Tuesday, 6 October 2009
धवन साहब आप बोर नहीं होते ?
Sunday, 4 October 2009
विदेश यात्रा
आज उनकी बांछें खिली हुई थीं। शायद इतनी प्रसन्नता उन्हें तब भी नहीं हुई होगी जब वे शादी के मंडप में सात फेरों को निभाने की प्रक्रिया में उलझे हुए थे। शायद यही शब्द ठीक है, वे बचपन से ही बड़े तेज बुद्धि रहे थे। समय की बर्बादी उन्हें कभी नहीं सुहाती और फेरों की प्रक्रिया में पंडितजी ने कोई दो-ढाई घंटे से ज्यादा ही टाइम ले लिया था। कॉलेज टाइम से पैसे कमाने की ऐसी चाहत लगी कि जब छात्रनेता थे तो चंदे से इकट्ठे हुए पैसों में से साठ फीसदी तो उन्हीं की जेब में आते थे। फिर वे कार्यकर्ता बन गए थे। किसके तबादले को मंत्रीजी से सहमति दिलानी है और किसको ठंडे बस्ते में लगाना है, यह उनके लिए बड़ा आसान था। और अब तो वे विदेश मंत्रालय के मुखिया हो गए थे। विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का रुतबा कम तो नहीं होता।
अभी कल ही सूचना मिली थी कि इसरो वाले वैज्ञानिकों ने चांद पर झंडा गाड़ दिया था। आज एक खुशखबरी उन्हें मिल गई थी कि यहां के वैज्ञानिकों ने जो सूचनाएं जुटाई थीं, उनके कुछ मामलों का अध्ययन नासा के वैज्ञानिकों से कराया जाए और वे इस दल का नेतृत्व करें। मंत्रीजी के शरीर का रोंया रोंया खुशी के मारे कांप रहा था, हाथों-हाथ बीवी को सूचना दी और मायके तक के लोगों के अमरीका जाने की पैकिंग शुरू हो गई। साला तो जाएगा ही, साले की बीवी और उनके बेटे-बेटियों का जाना जरूरी है। आखिर इसरो के वैज्ञानिकों ने नासा के वैज्ञानिकों से कुछ साठगांठ कर ली और यहां की गुप्त बातें वहां के वैज्ञानिकों को बेच दीं तो उन्हें वॉच कौंन करेंगा, मंत्रीजी की बीवी ने सीख दी। आखिर फाइनल हो गया कि तीन वैज्ञानिकों की गैरजिम्मेदराना हरकतों पर नजर रखने के लिए परिवार के कम से कम १३ लोग तो होने ही चाहिएं।
मंत्रीजी विमान में चढऩे को तैयार हो गए थे। उनके साथ कुल १३ लोगों का लवाजमा था। बेटे-बेटियों समेत ६ लोग तो वे ही थे, बाकी बीवी के मायके और खुद के घर के लोग थे। तीन वैज्ञानिक भी थे, एक के सिर और दाढ़ी के बाल ऐसे बढ़े हुए थे, जैसे वर्षोंं से शेविंग के लिए समय ही नहीं मिला हो। मंत्रीजी की बड़ी बेटी ने नाक सिकोड़ी, नॉनसेंस, कैसे भालू की तरह लग रहा है। साथ में छोटी बेटी भी मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी थी। वैज्ञानिकों की टोली में एक के साथ उनकी वाइफ भी थीं। अब मंत्रीजी की भोंहें टेढ़ी हो गई थी। डॉ. अय्यर, क्या हम किसी हनीमून पर जा रहे हैं। आपको पता है एक आदमी के अमरीका जाने पर कितना खर्चा होता है। आप क्या सरकारी पैसे को फिजूल का समझते हैं जो आपकी वाइफ पर खर्च दिया जाए। आपने शायद सुना नहीं सोनियाजी और उनके बेटे राहुल खर्चा बचाने के लिए कैटल क्लास में यात्रा कर रहे हैं। हम भी इकोनॉमी क्लास में टिकिट्स बुक करा रहे थे, पर पीए ने गलती से बिजनेस क्लास की टिकिट्स ले ली हैं।
डॉ. अय्यर के लिए यह अनुभव कुछ अटपटा था। वह देख रहे थे नेताजी के १३ सदस्यीय परिवार को। और उन तीन वैज्ञानिकों के साथ केवल उनकी एक पत्नी थी। लेकिन सर, मैं अपनी पत्नी का खर्चा खुद उठा लूंगा। फिर भी, नेताजी का पारा १०४ फॉरेनहाइट पर चढ़ गया था। आप वहां पर हनीमून मनाएंगे या नासा साइंटिस्ट्स के साथ रिसर्च पर ध्यान देंगे। बात बस बढऩे वाली थी कि डॉ. अय्यर की वाइफ ने हस्तक्षेप किया और अपने वापस लौटने की बात कही। डॉ. अय्यर नाखुश थे। जब डॉ. अय्यर की वाइफ वापस चलीं गईं, तो मंत्रीजी की अटकी सांस दुबारा वापस लौटी। मंत्रीजी अब पीए और अपने कुनबे समेत अमरीकन एयरलाइंस की फ्लाइट में बिजनेस क्लास की सीटों पर सवार हो गए थे। मंत्रीजी के साले के बेटे-बेटी सीटों पर लेटने का अभ्यास कर रहे थे, ऐसी सीट शायद उन्होंने पहली बार देखी थी, जिस पर बैठ सकते हैं और सोने का प्रयास भी।
मंत्रीजी की अमरीका यात्रा सफल रही। इसरो के चंद्रयान के नतीजे बड़े सुखद रहे थे। वास्तव में चंद्रयान ने ऐसी तस्वीरें जुटाई थीं, जो नासा के वैज्ञानिकों के लिए भी अब तक अजूबा रही थीं। मंत्रीजी दो हफ्तों के बिजी शेड्यूल के बाद वापस वतन लौटे तो उनका फूलमालाओं से स्वागत किया गया। हर किसी की माला मंत्रीजी और उनकी पत्नी की ओर मुड़ रही थी। मंत्रीजी के बच्चे और साली-सलहज की किस्मत भी चरम पर थी, इसलिए दो-तीन मालाएं उनके गले में भी पड़ गई थीं। रिसर्च वर्क से थके-मांदे वैज्ञानिक उपेक्षित से एक कोने में खड़े थे। उनकी इस हालत पर मंत्रीजी को तरस आ गया था, इसलिए आखिर में बची दो मालाएं तीन में से दो वैज्ञानिकों के गले में भी डलवा दीं। अगले दिन अखबारों में मंत्रीजी की बड़ी सी तस्वीर भी छपी थी और थे उनकी अमरीका यात्रा की सफलता के किस्से। वैज्ञानिकों की तस्वीर भी थी, इन्सैट में लगाई गई थी, छोटी सी, लिखा था इसरो के सफल वैज्ञानिक।
Monday, 28 September 2009
ये दूरियां
ये दूरियां
निखिल का रोम-रोम खुशी से झूम रहा था, शाम को ऑफिस से घर के लिए निकलने में नौ बज गए थे। यूं तो आठ बजे तक घर पहुंचना बहुत जरूरी होता था, क्योंकि इस वक्त के बाद घर पहुंचने पर उसके पापा इसे बच्चों में गलत संस्कार की नीति से देखते थे। पिताजी के संस्कार भी अजीब थे, सही कहें तो मेट्रो सिटी के लिहाज से इनमें मॉडर्नाइजेशन होना ही चाहिए था, ऐसा केवल निखिल की सोच कहती थी। भई, आठ बजे तो शाम होती है, इसके बाद ही शहर में रंगीनी और रोशनियों को देखने का मजा आता है। लेकिन निखिल को यह सब देखने की इजाजत नहीं थी। शाम आठ बजे तक ऑफिस से आकर खाना खाना और बाद में बीस-पच्चीस मिनट कम्प्यूटर पर वर्क करना, एक-दो घंटे मन लगा तो किसी किताब को पढऩा, फिर गहरी नींद सुबह छह बजे ही खुल पाती थी। दो घंटे अखबार पढऩा निखिल की रोज की आदत थी। और दीन-दुनिया की खबर रखने के लिए अखबार पढऩा जरूरी है, यह निखिल की बचपन से मान्यता थी, जो उसके पिताजी ने ही सिखाई थी। बात गुरुवार शाम की हो रही थी, जब निखिल को ऑफिस से निकलते-निकलते नौ बज गए थे। यूं तो सात बजे ही उसने अपना काम पूरा कर लिया था, लेकिन आज बात कुछ खास थी। वह एक एड एजेंसी में क्रिएटिव राइटिंग के जॉब पर था, जिसमें केवल चंद उम्दा और आकर्षित करने वाले शब्द लिखने के एवज में उसे कामचलाऊ मासिक सैलेरी मिलती थी। रोज की पढऩे की आदतों ने ही शायद उसे क्रिएटिव बना दिया था, उसे भी याद नहीं कि उसने प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों और वेदप्रकाश शर्मा जैसे थड़ी पर बिकने वाले राइटर्स के कितने नोवल्स पढ़ लिए थे। इसका असर उसकी क्रिएटिविटी पर भी था, शायद इसीलिए वह हर एड को नया क्रिएटिव मोड देता और बॉस हमेशा उसकी पीठ थपथपाता, लेकिन इसका असर कभी सैलेरी में देखने को नहीं मिला, क्योंकि सैलेरी पीठ थपथपाने की तुलना में उतनी अच्छी नहीं थी। फिर भी उसे अपने ऑफिस वर्क से कोई गिला नहीं था। आज जब उसने एक नई इम्पोर्टेड गाड़ी के खाडिय़ों में दौड़ते जैसे विज्ञापन को आखिरी टच दिया था तो घड़ी में केवल पौने सात बजे थे। लेकिन वह ऑफिस में रात नौ बजे तक रुका रहा।
पिछले कुछ महीनों से वह अपने ऑफिस के नीचे वाली फ्लोर पर एक मोबाइल कम्पनी में जॉब करने वाली लड़की पर फिदा था। इन मायनों में नहीं कि दिल हथेली पर रखकर कुछ दिन बाद कह दिया हो कि मैं तुम्हारे लिए चांद तोड़कर ला सकता हूं या तुम जैसी खूबसूरत तो कैटरीना कैफ भी नहीं है। इस तरह की लच्छेदार बातें करना तो उसे जैसे आता ही नहीं था। हां, कागज पर भले ही वह उन लच्छेदार बातों को हजार गुना बेहतर तरीके से अंजाम दे सकता हो, लेकिन लड़की के सामने पड़ते ही जैसे जीभ हकलाने लगती, गला सूखने लगता और क्रिएटिव माइंड से सोचने पर भी गिने-चुने शब्द ही निकल पाते थे। इस बात का अंदाजा उसे अब तक नहीं था कि लड़कियों से बात करते वक्त उसके साथ ऐसा क्यों होता था। पिछले तीन-चार माह से तनुजा से उसकी बात होने लगी थी। यूं उन दोनों के परिचय को सालभर का अरसा हो गया था, लेकिन यह परिचय कभी हाय-हल्लो के रूप में मुंडी हिलाने से आगे कभी नहीं बढ़ पाया था। लेकिन अब इसमें बदलाव दिख रहा था। पिछले तीन-चार महीने से उनमें ठीक-ठाक बात होने लगी थी। चार महीने पहले की बात है जब वह ऑफिस से निकल रहा था। उसी समय तनुजा से मुलाकात हो गई। निखिल आज बॉस के बिहेवियर से खफा था, उसने इतना अच्छा एड क्रिएट किया था, लेकिन क्लाइंट की ओर से कम्प्लेन आने के बाद बॉस ने उस एड को वाहियात करार दे दिया था। उसका मूड खराब था, सो लिफ्ट से नीचे आते वक्त भी चेहरा गुस्से से भरा हुआ था। एक फ्लोर नीचे जब लिफ्ट में तनुजा अंदर दाखिल हुई तो निखिल का गुस्सा भी कम हो गया। शायद वह तनुजा को अपनी कमजोरी दिखाना नहीं चाह रहा था, लेकिन वह इमोशनली बहुत कमजोर था और यदि कोई उसके साथ थोड़ी भी सुहानुभूति दिखाता तो पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देता। आज तनुजा ने भी बस ऐसे ही पूछ लिया कि मूड खराब क्यों है। फिर तो बस वह अपनी रामकहानी बयां करने लगा। लिफ्ट से नीचे आते ही पार्किंग में बीसियों मिनट अपनी प्रतिभा और बॉस की खामियों की डींग हांकता रहा। उसे यह भी ख्याल न रहा कि तनुजा उसकी बातों से बोर तो नहीं हो रही है। तनुजा ने जब उसे कुछ सुहानुभूति दिखाई तो वह निपट बालकों की तरह अपनी हर बात उसे बताने लगा। यह शायद निखिल का भरोसा था या तनुजा की सुहानुभूति कि अब वह अपनी बहुत सारी पर्सनल बातें भी तनुजा को बता देता। अब उनकी अक्सर फोन पर तो नहीं, लेकिन एसएमएस के जरिए बातें होतीं। बीच में एक बात तो भूल ही गए निखिल जितना रिजर्व किस्म का था, तनुजा उतनी ही चंचल। चंचल इस किस्म में नहीं कि हर किसी के साथ बातचीत करती हो या हर किसी से मुस्कराकर बात करती हो। तनुजा की चंचलता का दायरा भी कुछ लोगों के साथ तक सीमित था। वह जिनसे बात करती थी, उनमें चुनिंदा लोग ही शामिल होते थे। वह केवल कुछ लोगों के साथ ही हंस-मुस्कराकर बात करती थी। निखिल को आज तक समझ में नहीं आया कि तनुजा उससे बात कैसे कर लेती थी, क्योंकि खुद उसकी तो कभी भी आगे से बात करने की हिम्मत ही नहीं होती थी। तनुजा कुछ पूछ भी लेती तो एक बार सुनने पर तो वह सवाल ही नहीं समझ पाता और हड़बड़ाहट में कुछ भी नहीं बोल पाता था। हां, ये अलग बात थी कि तनुजा उसे बहुत समय से पसंद आ गई थी। तनुजा की निश्छल मुस्कान और सीधी साफ बातें उसे बहुत पसंद थीं। एसएमएस की बातें अब निखिल के दिल तक उतरने लगी थीं, वह अब मन ही मन शायद तनुजा को चाहने भी लगा था, लेकिन इस मामले में उसका स्वभाव उसका साथ नहीं दे रहा था। एसएमएस पर तो वह काफी बातें कर लेता, लेकिन अभी भी तनुजा के सामने कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं होती थी, कि पता नहीं कौंनसी बात तनुजा को बुरी लग जाए और वह उसकी बात का बुरा मानकर उससे बातचीत करना ही बंद कर दे। वह हमेशा यही सोचता कि किस तरह तनुजा को खुश रखे और किस प्रयास से तनुजा को खुशी मिलेगी। ऑफिस वर्क में भी उसका कम मन लगता, वह तो अब दिन-रात बस तनुजा के ख्वाबों में डूबा रहता। और आज तो कमाल ही हो गया था, जब तनुजा उसके साथ-साथ ऑफिस के नीचे से आधा किलोमीटर दूर तक घूमते हुए आ गई थी। इस वक्फे में उनके बीच एक-दूसरे की फैमिली और फ्रेंड्स के बारे में कई बातें हुई थी। इसलिए वह आज इतना खुश था। नौ बजे तक ऑफिस में ही बैठा रहा, खुशी इतनी ज्यादा थी कि न पापा की डांट की चिंता थी न ही मम्मी के बनाए हुए स्वादिष्ट खाने की। वह ऑफिस के नीचे पार्किंग में था कि राजन का फोन आ गया, बोला गुरुजी आज तो आ जाओ, निखिल इंकार न कर सका, वह चल पड़ा।
वह एक मयखाना था। मयखाना शब्द शायद पुराना हो गया है, आज की मेट्रो सिटी में अब ये नाम बार और पब में तब्दील हो गए हैं। बार में राजन और उसके दो दोस्त पहले ही मौजूद थे। बीयर मंगवाई गई। ऐसा नहीं था कि आज निखिल पहली बार बीयर पीने जा रहा था, पापा-मम्मी से चोरी-छुपे कई बार वह दोस्तों के साथ बीयर के घूंट लगा चुका था। बार में किसी परिचित के मिलने की संभावना हो सकती थी। एक बीयर के सिप लेते हुए उसने बीच में तीन सिगरेट भी फूंक दी थीं। राजन भी फुल मूड़ में था। राजन कुछ समय पहले एक कम्पनी में जॉब करता था, लेकिन आजकल खुद का कुछ बिजनेस खड़ा करने की फिराक में था। राजन पास के ही गांव का रहने वाला था और निखिल का अच्छा दोस्त था। लास्ट सिप लेते हुए पता चला कि वह पूरी एक बीयर पेट में उतार चुका है। दस बजे पापा का फोन आया तो झूठ बोल दिया कि प्रमोशन मिला है, इसलिए फ्रेंड्स के साथ पार्टी में है और आज घर नहीं लौट पाऊंगा। उस रात वह राजन के घर पर ही सोया। यह बीयर पीने की आदत अब जोर पकडऩे लगी थी और जो बीयर के घूंट वह साल में एक-दो बार लगाता था, वह आंकड़ा अब महीने में पूरा होने लगा था। पापा उसके घर न पहुंचने की आदत से परेशान हो चले थे, अक्सर घर नहीं आने पर रोज डांटते भी थे, लेकिन वह ऑफिस वर्क की वजह से लेट होने का बहाना बना देता। रात में राजन के घर सो जाने की बात कह देता। यह बहाने चल रहे थे, पापा सहन कर रहे थे। रात तीन बजे की बात थी, जब झपाक से निखिल की नींद उड़ गई थी, लाइट जलाकर देखी तो पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था। शायद उसने कोई बुरा ख्वाब देखा था। क्या देखा था, यह सोचने की जरूरत नहीं थी, उसे सपने की घटना पूरी तरह याद आ गई थी। वह साढ़े दस बजे सोया था। आज ख्वाब में उसने तनुजा को दुल्हन के रूप में देखा था। आज उसकी किसी और के साथ शादी हो रही थी, यह कल्पना करते ही जैसे निखिल का दिमाग फटने जैसी स्थिति में हो गया था। वह तनुजा की शादी की कल्पना भी नहीं कर सकता था।ऐसा नहीं है कि तनुजा उसकी बुरी आदतों से बिल्कुल अपरिचित थी। निखिल को भले ही यह खामख्याली रही हो। एक बार जब वह दोनों एक शादी के फंक्शन में मिले तो निखिल ताजा-ताजा बीयर के घूंट और सिगरेट फूंककर राजन के साथ शादी में पहुंचा था। शायद बातचीत के दौरान सिगरेट की बू या बीयर की बदबू का झोंका तनुजा की नाक तक पहुंच गया था कि तनुजा का हाथ स्वयमेव ही नाक पर पहुंच गया। तनुजा ने उस वक्त तो नहीं लेकिन अगले रोज ऑफिस में उसे चेताया कि ये आदतें अच्छी नहीं हैं। निखिल तनुजा से कितना प्यार करता है, शायद तनुजा इस बात से परिचित नहीं थी, लेकिन वह उसे अपना एक दोस्त मानने लगी थी। तनुजा की इस चेतावनी का बिल्कुल सीधा असर हुआ और उसी रोज निखिल ने बीयर और सिगरेट नहीं पीने की कसम ले ली। शायद निखिल ने इस बात को इस तरह लिया था कि तनुजा भी अब उससे ज्यादा नहीं तो कुछ-कुछ प्यार करने लगी है। अब उसके कदम जमीन पर नहीं, आसमान पर पहुंच गए थे। अब वह बिल्कुल बदल गया था। राजन के उकसाने पर भी बार की ओर उसके कदम नहीं उठते थे। अब वह अपनी पुरानी दिनचर्या में, एक शरीफ युवक बनने की प्रक्रिया में लौट रहा था। अब बीयर और सिगरेट से उसने दूरियां पैदा कर ली थीं। निखिल और तनुजा की दोस्ती सही ट्रेक पर चल रही थी कि दो महीने बाद तनुजा ने अपनी सगाई पक्की होने की सूचना निखिल को सुनाई। धरती में दरार पैदा होने की बातें तो शायद गलत होती हों, लेकिन निखिल यह एक वाक्य सुनते ही जड़वत रह गया था। तनुजा ने पूछा कि क्या हुआ तो, एक मिनट बाद वह कुछ सोच पाने की स्थिति में आ पाया था। तब उसने चकनाचूर दिल के साथ तनुजा को सगाई की बधाई दी। उसने हालांकि तनुजा को कभी प्रपोज नहीं किया था, और न ही कभी प्यार करने की बात बोली थी। लेकिन उसकी ख्वाबों की फेहरिस्त तनुजा को अपने घर दुल्हन के रूप में लाने तक पहुंच चुकी थी। वह अपने और तनुजा के भावी जीवन की बड़ी-बड़ी कल्पनाएं कर चुका था। ठीक पन्द्रह दिन बाद तनुजा की सगाई होनी थी। बीच के चौदह दिन निखिल का दिल कितने खून के आंसू रोया था, यह बयां कर पाना मुश्किल है। घर में गुमसुम रहना, ऑफिस में सिरदर्द की बात कहकर काम को टालना और हर वक्त अपनी गलतियों को कोसना। अब निखिल की रिजर्व किस्म और क्रिएटिव माइंड भी जैसे कुंद पडऩे लगे थे। सगाई के ठीक एक रोज पहले तनुजा ने फोन किया था कि उसे सगाई में जरूर आना है। वह सगाई के रोज घर में कमरे में ही बंद रहा। पता नहीं क्या-क्या सोचता रहा। वह सोच रहा था कि तनुजा ने उसका साथ क्यों छोड़ दिया, लेकिन असल में उनका साथ था ही कब, वे तो आपस में एक अच्छे मित्र ही बन पाए थे। उनके बीच शायद प्यार का रिश्ता तो अभी पनपा ही नहीं था। नहीं, निखिल ने इस विचार को झटक दिया, अगर ऐसा ही था तो क्यों निखिल का दिल दर्द से डूबा हुआ लग रहा था, क्यों तनुजा का चेहरा याद आते ही उसकी आंखें पलभर में गीली होने लगती हैं। उसे प्यार हुआ था, तनुजा को वह दिलोजान से चाहने लगा था, यहां तक कि तनुजा के साथ अपनी जिंदगी बसाने के लिए वह अपने संस्कारवादी परिवार के संस्कारों को भी तोड़ सकता था। वह अपने पापा और मम्मी की डांट, उनका गुस्सा, बड़े भैया की फटकार भी सहन कर सकता था। लेकिन शायद यह प्यार एकतरफा होकर रह गया था। उसने तनुजा को कभी अपनी बात समझाने की चेष्टा ही नहीं की थी। दो महीने बाद तनुजा की शादी हो गई। निखिल शादी में जाने की सोच भी नहीं सकता था। तनुजा की शादी के रोज भी उसने छुट्टी नहीं ली थी। उस रोज शाम आठ बजे जब वह ऑफिस से निकला तो सोच रहा था कि अब तनुजा के दरवाजे पर उसकी बारात आ गई होगी। इन दो महीनों में उसकी हालत दयनीय हो गई थी। वह ऑफिस से निकलकर पार्किंग में आया तो राजन का फोन आ गया। राजन कह रहा था, अरे गुरुजी आप तो याद ही नहीं करते, यहीं बार में बैठे हैं, मूड़ हो तो आप भी आ जाओ। निखिल ने फोन काट दिया, उसे तनुजा की चेतावनी याद आ रही थी। तनुजा की चेतावनी पर उसने अपने आपको बिल्कुल सुधार लिया था। उसे बीयर और सिगरेट से चिढ़ हो गई थी। तनुजा के लिए उसने खुद को बिल्कुल बदल लिया था। लेकिन आज तनुजा की शादी है। निखिल यह दर्द सहन नहीं कर पा रहा था। डेढ़ घंटे तक वह पार्किंग में इन्हीं बातों पर मनन करता रहा, आखिर दस बजे उसके कदम मयखाने की ओर उठने लगे थे, अब उसे पापा की डांट और तनुजा की चेतावनी बेमानी लग रही थी। उसके और शराब के बीच की दूरियां घट रही थीं और बढ़ गई थीं तनुजा और उसके बीच की दूरियां। प्यार के दर्द, शराब और सिगरेट के जंजाल में वह कितने दिन जी पाया, यह कह पाना मुश्किल है। कहानी लिखने से पहले मैंने भी इस कहानी के ऐसे क्लाइमेक्स की कल्पना नहीं की थी।
- एक बात आखिर में और कह दूं, लव आजकल फिल्म का गीत ये दूरियां मुझे बहुत पसंद आया है, कहानी का टाइटल इसी की उपज है। कहानी के बारे में यह भी याद रखें कि निखिल के पिता के रूप में मैं यदि ५० वर्ष की उम्र का रहा होता और मेरा फरजन्देआलम ऐसी आदतों का शिकार होता तो शायद उसके गम में मैं भी इस फानी दुनिया से रुख्सत हो गया होता। क्योंकि जालिम हम भी कम इमोशनल नहीं हैं इस दुनिया में।
Monday, 7 September 2009
शीशे की अयोध्या
... यह रोज की बात थी, हमारे घर के बड़े से आंगन में हमें एक हरिजन वृद्धा झाड़ू बुहारते हुए मिलती। उम्र यही कोई साठ वर्ष रही होगी, चेहरे पर घनी झुर्रियां और आगे से दांतविहीन पोपले होठों को खोलकर वह हंसते हुए हमारा स्वागत करतीं। अम्मा से रोटी की मांग करते मैं जब आंगन में उछलकूद मचाता, तो वह मुस्कुराते हुए कहतीं कि बेटा ज्यादा शैतानी नहीं करते। मैं रोटी खाता रहता और उनको झाड़ू बुहारते देखता रहता। इस मेहनत के बदले उन्हें हमारे घर से मिलती एक गेहूं की मोटी रोटी। यह हमारे घर की रीत नहीं, बल्कि गांव के सभी घरों से उन्हें झाड़ू के बदले एक-एक रोटी दी जाती। फिर भी वह खुश थीं।
कह नहीं सकता, लेकिन मुझे शुरू से ही उनसे कुछ लगाव हो गया। नाम था बादामी। मैं उन्हेंं अम्मा कहने लगा। हल्की झीनी पैबन्द लगी साड़ी और हाथ में झाड़ू लिए वह पूरे गांव का फेरा लगातीं। एक बात और उनके साथ गबरू कुत्ता होता। गधे से थोड़ा कम ऊंचाई का यह कुत्ता देखने में ही खतरनाक लगता, इसलिए गांव के लोग कुत्ते के नजदीक नहीं आते। मैं बादामी अम्मा का थोड़ा नजदीकी था, इसलिए गबरू मुझसे कुछ नहीं कहता था। इस बात से दूसरे बच्चों के बीच मेरी कुछ धाक जम गई थी। दूसरे बच्चों को मैं गबरू के नाम से उन्हें डरा भी देता था। इतनी समझ नहीं थी, फिर भी १५० घरों के छोटे गांव में सबसे परिचित हो गया था। बादामी अम्मा के सात बेटे थे।
ज्यादा कुछ काम तो उनका परिवार करता नहीं था। न तो गांव के दूसरे किसानों की तरह खेती का काम था, न ही कभी भेंस या गाय जैसे पशुओं का पालन करते थे। हरिजन होने के कारण गाय रखने पर तो शायद पूरा गांव उनके विरोध में उतर आता। मेरी अम्मा भी कैसे अक्सर मुझे डांटती थीं, जब मैं बादामी अम्मा को छू लेता। डांटते हुए हाथ के हाथ नहलाने की जिद करतीं, मैं रोने लगता तो पानी के छींटे मारकर मुझे पवित्र करतीं और फिर बादामी से दूर रहने को कहतीं। इसमें क्या रहस्य था, तब समझ नहीं आता था। और हां, एक बात और अक्सर मेरी बड़ी दीदी कहानी सुनातीं कि पहले बादल धरती पर बहुत नीचे थे। एक बार बादामी सिर पर कूड़े का टोकरा उठाए जा रही थीं। बादल कुछ ज्यादा नीचे हो गए, तो बादामी का टोकरा बादलों से अटक गया। बादामी को गुस्सा आया तो झाड़ू से बादल को पीटने लगीं, पिटाई के डर से बादल इतना ऊंचा हो गया कि फिर कभी धरती के नजदीक नहीं आया। कहानी सुनाते ही दीदी हंसने लगती और मैं बादामी अम्मा के इस चमत्कार का लोहा मानता कि बादामी अम्मा से तो बादल भी डरते हैं।
बादामी अम्मा का छठा बेटा सुनील मेरी ही क्लास में था। वह हरिजनों का पहला बच्चा था, जो स्कूल तक पहुंचने में कामयाब हुआ था, वरना उससे बड़े दूसरे बेटे तो सुअर, भेड़-बकरी ही चराते थे। बादामी अम्मा के पांच बेटों की शादी हो गई थी। इस बार जब उनके पांचवें बेटे की शादी हुई तो वो नई-नवेली बहू को लेकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने आई। अब बादामी अम्मा को काम से राहत हुई, अब उन्हें झाड़ू लगाने और कूड़े का टोकरा उठाने से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा शायद बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन मेरी अम्मा बतातीं थीं कि बादामी अम्मा की बड़ी बहुएं मेहनत नहीं करना चाहतीं, इसलिए वे बादामी अम्मा से अलग रहती हैं। ऐसा शायद दस दिन हुआ होगा जब बादामी अम्मा को झाड़ू नहीं लगाना पड़ा। ग्यारहवें दिन जब मैं स्कूल से इंटरवैल के टाइम पर घर पहुंचा तो बादामी अम्मा को फिर झाड़ू पकड़े पाया। आज अम्मा के साथ उनकी पांचवीं बहू भी नहीं थी, साथ था तो गबरू और झाड़ू। अब बादामी अम्मा को फिर से काम करना पड़ रहा था, पांचवा बेटा भी अब उनसे अलग हो गया था। लेकिन हमारे लिए बादामी अम्मा का वही प्यार बरकरार था। शायद बादामी अम्मा को काम करना अच्छा लगता था, इसलिए वह पूरे गांव का झाड़ू निकालने के बाद भी हंसती रहती थीं।
दिन गुजरते गए, मैं गांव के मिडिल स्कूल से पास होकर सैकण्डरी स्कूल में आ गया, चार साल बाद भी हालत जस के तस थे। बादामी अम्मा की दिनचर्या यथावत थी, वह रोज झाड़ू निकालतीं और गावं के हर घर से एक रोटी पातीं। मैं अब भी दिल से उनके नजदीक था। टाइम मिलने पर उनके गबरू के साथ खेलता, बादामी अम्मा अब भी मुझे दुलार करतीं। मेरी अम्मा के साथ अपने बेटे-बहुओं की बातें बतातीं, पर उन्हें शायद कोई गिला नहीं था। इन दिनों एक आश्चर्यजनक परिवर्तन मैं अपनी अम्मा में देख रहा था, अब जब मैं बादामी अम्मा के साथ खेलता तो वह मुझे डांटती नहीं थी। न ही कभी नहलाने की जिद करतीं। अब बादामी अम्मा के हाथ-पैर जवाब देने लग गए थे। कुछ दिन पहले उनके छठे बेटे सुनील, जो आठवीं क्लास तक मेरा क्लासमेट रहा था, की शादी हो गई थी। अब वह भी अपनी बीवी के साथ अलग रहने लग गया था।
पन्द्रह दिन की छुट्टियों के बाद वापस भाई साहब ने जयपुर बुला लिया अब डॉक्टरी में प्रवेश के लिए पीएमटी का एग्जाम देना था। मैं डॉक्टर तो नहीं बन पाया, लेकिन एक समाचार पत्र में संवाददाता हो गया था। गांव का जीवन भी जैसे एक बिसरी पृष्ठभूमि की तरह पीछे छूटने लगा था। पिताजी ने फोन कर गांव आने को कहा। चार दिन की छुट्टी थी। मैं गांव पहुंचा ही था, कि अम्मा ने सूचना दी, बेटा आज सुबह बादामी चल बसी। मैं एकाएक कुछ समझ न सका। लेकिन अभी तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। मेरे पूछने पर अम्मा ने बताया कि सभी बहुएं अलग रह रही थीं, हाथ-पांव भी साथ छोड़ गए थे। पिछले कुछ दिनों से झाड़ू लगाने भी नहीं आई। शायद बीमारी से मौत हो गई। एक बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी। बादामी अम्मा अब सब कष्टों से दूर थीं। मेरे बचपन के गांव का रामराज्य और अयोध्या जैसा अनुभव अब पीछे छूट गया था। वह शायद शीशे की अयोध्या थी, जो अब चकनाचूर हो गई थी।
Wednesday, 5 August 2009
आजकल का 'लव'
Saturday, 18 July 2009
लालू की रेल में घुसपैठ
सबसे बड़ी बात मैनेजमेंट की है। जिस रेल को बड़े-बड़े मैनेजमेंट विशेषज्ञ मुनाफे में लाने की तरकीब नहीं ला पाए उसे हमारे लालूजी ने साबित कर दिखाया। शुरू से ही इसके लिए विलायती प्लानिंग्स की बजाय देशी नुस्खों से काम चलाया। अरे साहब बड़े-बड़े वीवीआईपीज को मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पिलवा दी। मालभाड़े में भले ही आपकी जेब निचोड़ी हो, लेकिन आवाजाही में एक पैसा भी किराया नहीं बढ़ाया। और ऐसा पूरे पांच साल चला। रेल के अन्दर भी छप्पनभोग उपलब्ध कराए। कुली भाईयों की तो जैसे लॉटरी लग गई, लालूजी अवतार की कुछ ऐसी कृपा हुई कि सबको पक्की नौकरी दे दी। रेल दुर्घटनाएं भले ही खूब हुई हों, और होनी को भला टाल भी कौंन सकता है, लेकिन मृतकों के परिजनों को क्या कम सहायता दी। लालूजी के इन मंत्रों की गूंज तो आईआईएम के गुरुओं तक पहुंची इसलिए लालूजी से गेस्ट लेक्चर कराया। और विदेशी हार्वर्ड के मैनेजर्स ने भी अपने लालूजी का लोहा माना और उन्हें अपना गुरू बना लिया।
अब आप बार-बार यह मत कहो कि लालूजी ने रेलवे को अपनी गायों की तरह दुहा। सब फायदे के पद अपने लम्बे-चौड़े कुटुम्ब वालों को दे दिए। सारी रेल योजनाएं बिहार के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गईं। बिहार के गांव-गांव को लोहपथगामिनी से जोड़ दिया और बेचारे हमारे करौली वाले अभी रेल को काले धुंए वाले लम्बे वाहन के अलावा पहचान ही नहीं पाते। रेल के डिब्बे बनाने वाले कारखाने और दूसरे उद्योग संयंत्र भी बिहारियों को दे दिए। दरअसल ये सब बातें आपकी दकियानूसी और छोटी सोच की हैं। अरे भई जब सारा देश रेलवे के फायदे से मंत्रमुग्ध हो तो अपने भाई-भतीजों को नौकरियों में फिट कर देना कौंनसी बुरी बात है। अब रेल के डिब्बों की फैक्ट्री कहीं तो खुलनी ही थीं, बिहार में खोल दीं तो कौंनसा गुनाह कर दिया। और अन्त-पन्त तो रेल ने करौली में भी दर्शन देने ही हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालूजी ने एक से एक योजनाएं बनाईं। पैसा तो हर योजना में खर्च होता है। लागू करने में टाइम तो लगता ही है, अब टाइम कुछ ज्यादा लग गया तो यह तो कोई बात नहीं हुई कि ममताजी फायदा उठा लें। लालूजी की बात से हम एकदम सहमत हैं कि दो मंजिला ट्रेन को चलाओगे कैसे, कहां-कहां ऊपर के बिजली के तार हटाओगे और कहां-कहां सुरंगों को ऊंची करोगे। ऐसे काम अंजाम देने का नुस्खा तो केवल अपने लालूजी को आता है। आपने भले ही न सुना हो, पर हमारे कान इतने कच्चे नहीं हैं, चारे की पूरी आमदनी कैसे राख हो गई, इसकी भनक हमें भी है। इसलिए लालूजी से बड़ा मैनेज कर सकने वाला विशेषज्ञ कोई हो ही नहीं सकता। अब ममतादी बिना बात के ही उन्हें श्वेत पत्र जारी करने की धमकी दें यह अच्छी बात तो नहीं है। हमारी नजर में लालूजी जैसा ईमानदार आदमी अब तक रामराज्य में भी नहीं हुआ होगा, इसलिए ममतादी समझ लीजिए कि वे आपकी गीदड़ भभकियों में आने वाले नहीं ।
कमाई की गणित
Tuesday, 7 July 2009
निवेश का खेल
ऑस्ट्रेलिया में दिनों-दिन हो रही हमारे छात्रों की पिटाई ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के दिल में चिंता का गहरा जख्म बना दिया है। मंत्री साहब की चिंता वाजिब है और अब उन्होंने इसके लिए एक रामबाण इलाज भी खोज लिया है। ऐसा नहीं है की अब हमारे बच्चे कहीं पढ़ नहीं पाएंगे या विदेशी शिक्षा नहीं ले पाएंगे। जनाब की मानें तो अब यहीं पर सारे छात्रों को बुला लिया जाए और छात्र ही क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों को यहीं खुलवा लेंगे। हमारे पास क्या जर- जमीन की कमी है जो विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुदान में नहीं दे सकते! भई आखिर ये हमारे सपूतों के भविष्य का मामला है। और इसकी चिंता मंत्री साहब को नहीं होगी तो क्या हमें होगी। विदेशी संस्थानों को यहाँ बुलाने को पढ़ी- लिखी भाषा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। और जब विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आयेंगे तो हमारी शिक्षा अपने आप विलायत के स्तर की हो जायेगी। वैसे भूलने की बात नहीं है, पर मंत्री साहब के पास बहुत काम होते हैं, इसलिए भूलना बड़ी बात भी नहीं है। साहब आपको याद दिला दें, जब- जब यहाँ विदेशी निवेश हुआ है, हमेशा घाटा ही हुआ। अपनी मूंछ ऊँची रखने वाले राजाओं की आपसी मारकाट में तेमूरलंग, मुग़ल राजाओं का निवेश हुआ तो ऐसी लूटमार मची कि सोने कि चिडिया कहलाने वालोँ के खाने के लाले पड़ गए। फिर गोरों की 'फूट डालो और राज करोÓ की कूटनीति के निवेश को हमने दो सदी तक भुगता। एक कम्पनी के नाम से घुसपैठ बनाकर गोरे साहब ऐसे जमे कि निकलने का नाम ही नहीं लिया, ये तो भला हो अपने गांधी बाबा का, जिन्होंने एक अधझुकी लाठी के सहारे ही फिरंगियों को धूल चटा दी। मियां मुर्शरफ ने भी यहां गजब का निवेश किया। एक तरफ तो साहब आगरा में बातचीत करने आए और दूसरी तरफ करगिल में घुसपैठियों की पूरी फौज घुसा दी। हमारी सरकार भी इतने दिन बाद जागी कि सैकड़ों जवानों की बलि चढ़ गई। चीनी भाईयों के निवेश की चोट तो सीमारेखा की क्षति के रूप में अब भी दुखती है। सेबी ने निवेश की खुली छूट दी तो हमारे दौड़ते सांड की हवा निकल गई और सेंसेक्स 25 से 8 हजार पर गिर गया। और अपनी बातें याद नहीं हैं तो पड़ौसी मुल्क की तरफ निगाह घुमा लें। मियां मुर्शरफ और उनके पूर्वज राष्टï्रपतियों ने अमरीकी अंकल को पाकिस्तान में घुसने की इजाजत क्या दी, अंकलजी लाठी के बल पर जमकर ही बैठ गए, और साहब ऐसा निवेश किया कि अब वायु, जल, थल सब तरह के अड्डे पाक सीमा में बना लिए हैं। अब तो पाकिस्तान इन अड्डों की जमीन पर अपना हक भी नहीं जता सकता। अफगानिस्तान में तालिबान की उत्पत्ति और पतन, नेपाल में माओवादियों की दादागिरी, सब विदेशी निवेश के परिणाम हैं। इसलिए विदेशी निवेश को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझना हर चमकती चीज को सोना समझना है। यूं मंत्री साहब की मर्जी है, वे जब चाहें, जिसे चाहें झण्डाबरदार बनाकर यहां निवेश करा सकते हैं, हम कौंन होते हैं, रोकने वाले। अपन तो साहब खाली-पीली सलाह दे सकते हैं, मानो या न मानो।
yeh alekh न्यूज़ टुडे jaipur के 7 july ke ank me prakashit hua है।