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Monday, 2 November 2009

कामयाबी का लंदन प्रेम

मैं इस फिल्म को लेकर लम्बे अरसे से उत्सुकता से घिरा हुआ था। हम दिल दे चुके सनम, जिसमें अजय देवगन और सलमान एक साथ आए थे, मुझे बहुत पसंद आई थी। इसलिए इन दोनों अभिनेताओं को एक साथ देखने की लालसा थी और फिर उड़ते-उड़ते यह बात भी कानों में पड़ी थी कि कहानी का प्लॉट बहुत अच्छा है। शुक्रवार को मेरे अवकाश के रोज मुझे ऐनवक्त पर तब ऑफिस बुला लिया गया, जब मैं इस फिल्म का फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने जा रहा था, खिन्नता हुई, लेकिन ऑफिस आना भी आवश्यक था। शुक्रवार का अवकाश मैंने शनिवार को लिया और फिर इस फिल्म को देखने पहुंचा। हर किसी के कहानी कहने का तरीका अलग होता है। विपुल शाह अपनी शैली में पहले हास्य का रंग डालते हैं और फिर कहानी की कसावट के सहारे इसे भावुक बना देते हैं। नमस्ते लंदन के बाद अब लंदन ड्रीम्स इनकी हालिया फिल्म है। शुरुआत में ही बता दें, फिल्म को बहुत अच्छे तरीके से गढ़ा गया है, कहानी यूनिक न हो, लेकिन एक आम भारतीय को पसंद आने वाली है। फिर अजय देवगन का नैसर्गिक गंभीर रोल और सलमान का मस्तमौला अभिनय देखने के आदी दर्शकों को यहां अभिनय की नई ऊंचाईयां देखने को मिलेंगी। फिल्म का संगीत इसे दर्शकों के लिए एक बेहतर फिल्म बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।कहानी अजय देवगन के सपने को लेकर शुरू होती है जो उसने पंजाब के एक छोटे से गांव में देखा था। इस फिल्म को देखकर मुझे एक बात फिर से याद आ गई अधजल गगरी छलकत जाए। भरे हुए मटके में से पानी कभी उछलता नहीं है। इसलिए जो वास्तव में प्रतिभाशाली होते हैं, वे अपने बारे में डींग नहीं हांकते। अजय देवगन, पिता की मृत्यु के बाद अपने गांव के एक चाचा के साथ लंदन आ जाते हैं, मजेदार बात ये भी है कि बचपन से म्यूजिक सीखते हुए वो लंदन की गलियों में जवान हो जाते हैं और जो लंदन पुलिस उन्हें केवल कुछ मिनट फुटपाथ पर गाने की एवज में जेल में डाल देती है, इतने साल तक इल्लिगल रूप से बगैर वीजा के रहने पर एक नोटिस तक जारी नहीं करती। गांव से ही अजय का एक दोस्त है सलमान खान, जो उन्हीं गलियों में रहते हुए अलमस्त नौजवान के रूप में अपने कस्बेवालों को परेशान किए हुए है। फिल्म का ये हिस्सा दर्शकों को पर्याप्त रूप से हंसाने में कामयाब रहा है।एक दोस्त के लिए तो कम से कम ऐसा नहीं होता, लेकिन ईष्र्या की धधकती आग में अजय देवगन अपने उस दोस्त को, जिसने कभी गांव की गलियों में उसके सपने के जज्बे को देखकर अपने बचाए कुछ पैसों से एक बांसुरी खरीदकर उसे भेंट की थी, कई तरह के ड्रग्स, जिनके नाम गिनना भी मुहाल है, सलमान क बॉडी में पहुंचा देता है। सलमान अपने दोस्त की इस दगाबाजी से अनजान है और वह अभी भी अजय को अपने दोस्त से बढ़कर भगवान मानता है। कहानी यहां तक पहुंचती है कि अपने अंतिम शो, जो वेंबली स्टेडियम में हो रहा था, अजय देवगन सलमान के प्रति दर्शकों के प्यार को बर्दाश्त नहीं कर पाता और सच्चाई अपने आप सामने आ जाती है। सलमान का सुखद अभिनय जितना काबिलेतारीफ है, उससे कहीं अधिक प्रशंसा अजय देवगन के अभिनय की की जानी चाहिए। असिन अपने चुलबुले रंग में दर्शकों के सामने हैं और अपनी दूसरी हिन्दी फिल्म में ही बेहतर ढंग से अपनी भूमिका निभाने में सफल रही हैं। यह फिल्म उनके कॅरियर को नई ऊंचाईयां देने में सहायक होगी। वक्त, नमस्ते लंदन के बाद लंदन ड्रीम्स भी कामयाब रहेगी, ऐसी आशा की जा सकती है। फिल्मांकन और संगीत की दृष्टि से भी फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार दिए जा सकते हैं।

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