Tuesday, 20 October 2009
मेरे गांव की दिवाली
पता नहीं क्यों, इस बार दिवाली पर घर जाने को लेकर मैं इतना उत्सुक नहीं था। आज से आठ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर आया था, दिवाली को लेकर बड़ा उल्लास रहता था और पन्द्रह दिन पहले से ही मंसूबे बनाने लगता था कि दिवाली पर क्या धमाल करना था। इस बार तो धनतेरस भी जयपुर में ही मना ली थी और लग ही नहीं रहा था कि गांव भी जाना है। गांव यात्रा और दीपावली के बाद वापस लौटने का अनुभव कुछ हद तक यादगार रहा, फिर भी एक कसक सी मन में रह गई है। घर जाने का प्लान ये बना कि मैं और अमित, दोनों एक साथ बाइक से ही घर चलें। रूप चतुर्दशी के रोज अलसुबह हम दोनों उठ गए थे और पौने छह बजे निकलने के लिए तैयार थे। जैसे ही दरवाजे से बाहर झांककर देखा तो पता चला कि इन्द्र देवता खासे महरबान हो गए हैं और आज शायद ही हमें निकले दें। खैर, सवा सात बजे वज्रधारी ने कुछ राहत दी और हम मौका देख झट से खिसक लिए। खिसकाव ज्यादा नहीं हुआ था और कानोता से कोई दो फर्लांग ही जा पाए थे कि फिर देवेन्द्र ने हमें दबोच लिया कि बच्चू आज इतनी आसानी से थोड़े न निकलने देंगे। बारिश का ये आलम अभी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, करीब पौने घंटे हम एक पेट्रोल पम्प की छत के नीचे टिके रहे। इस डर से कि कहीं पम्प मालिक इतनी देर ठहरने का कोई चार्ज न लगा दे, मैंने बाइक में २०० रुपए का पेट्रोल डलवा लिया। सूरज की एक हल्की सी किरण शायद कहीं से निकल आई थी, जिससे हम दोनों को उम्मीद बंधी कि आगे शायद मौसम इतना बेमिजाज नहीं है और हम आगे बढ़ सकते हैं। बाइक पर सवार होकर हम निकले, बमुश्किल साढ़े तीन किलोमीटर चले होंगे कि बारिश की बूंदों का वजन दोगुना हो गया और सिर पर टपकती ये बूंदें भी ओले के समान ही पड़ रही थीं। आगे एक उजाड़ सा पेड़ देख मैंने अमित से बाइक रोकने की बात कही, लेकिन अमित भी शायद आज इन्द्रदेव से पंगा लेने के मूड़ में था, उसने रफ्तार जारी रखी लेकिन हम कोई बंशीधर की तरह १६ कलाओं से अवतार लेने वाले भगवान विष्णु के अंश थोड़े ही हैं, जो मेघदेव के मुकाबले में गोवर्धन पर्वत को उठा लेते। बारिश की बूंदों से बेबस हो हमें आगे एक झोंपड़ी में शरण लेनी पड़ी। यहां बीसेक मिनट के वक्फे के बाद संभावना लग रही थी कि अब दौसा तक शायद ही कोई रुकावट आए। लेकिन मेघ देवता कुछ और ही सोचे हुए थे, बस्सी से पांच किलोमीटर पहले ही हमें फिर रोक लिया और इस बार ये ठहराव कोई एक घंटे तक चला। ऑफिस और घर-गांव की बातें करते हुए हम यहां ठहरे रहे। दूसरी चाय के बीच में अमित बोला, गुरुजी इस यात्रा को तो हम ब्लॉग पर लिखेंगे। मैंने कहा हां, यार अब तक की घटनाओं ने एक अच्छे संस्मरण का प्लॉट स्थापित कर दिया है। आगे भी यात्रा अच्छी रही तो दिवाली की इस यात्रा को आफिस पहुंचते ही जरूर लिखूंगा। तीसरी चाय समाप्त हो गई थी, पर धूजणी बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। बारिश के बहाव का सामना करते हुए बाइक चलाने के कारण अमित की हालत अधिक खस्ता थी। पास में ही सिगरेट की दुकान भी थी, अंतिम नवरात्र की शाम से पहले ऐसी स्थिति होती तो मैं चाय की चुस्कियों के साथ सिगरेट के कश भी लगा लेता, लेकिन इस बार मेरे हाथ रुक गए थे। अंतिम नवरात्र को मैंने एक प्रण लिया था और आखिरकार मैंने सिगरेट नहीं पी। इस बार सूरज ने शायद बादलों की ओट से निकलने में कुछ हद तक कामयाबी हासिल कर ली थी, इसलिए हम दोनों फिर से अपनी राह पर चल दिए थे। अमित को बाइक पर सवार होने का मौका क्या मिला, उसने बाइक को शायद स्कॉर्पियो समझ लिया था और बाइक की रेस एक साथ चालीस से बढ़कर पिचानवें तक पहुंच गई थी। मैंने कहा, भैया, ये बाइक है, हवा के झोंके हम दोनों को उड़ा देंगे, बोला गुरुजी आप पकड़कर बैठे रहो, क्योंकि अगले रुकाव तक मैं मेहंदीपुर बालाजी पहुंच जाना चाहता हूं। मैंने कहा, बालाजी की दूरी यहां से ७५ किलोमीटर है, बोला, अभी पचास मिनट में पहुंचते हैं। जनाब मैं तो नौसिखिया ड्राइवर हूं, लेकिन अमित की ड्राइवरी इस बार चरम पर रही। मुझे लगा हालिया बने चार लेन के इस हाइवे का पहला लुत्फ अमित ही उठाने जा रहा है। बाइक की स्पीड का सही अहसास तब हुआ जब एक तेजरफ्तार दौड़ती राजस्थान रोडवेज बस को पीछे छोड़ दिया, एक हुंडई सैंट्रो को ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया और अपनी प्रेमिका के साथ पल्सर पर सवार एक कॉलेज युवक को एक साथ क्रॉस कर तेजी से पीछे छोड़ दिया। अमित की बालाजी पहुंचने की तमन्ना फिर से अधूरी रह गई और इन्द्रदेव ने इस बार हमें दौसा पार करते ही रोक लिया। मैंने तेज सांस ली और हम एक मिष्ठान भंडार में प्याज कचौरी खाने में तल्लीन हो गए। बाहर बारिश हो रही थी और बातचीत का माध्यम फिर से गांव की गलियों और शहर की स्ट्रीट्स के बीच में भटकने लगा। अभी घर पहुंच भी नहीं पाया था कि रास्ते में गांव के दो भाई मिल गए। उन्होंने मेरे पत्रकार होने और अपनी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर विस्तार से चर्चा की। सफर की थकान के बावजूद आधे घंटे तक यह ज्ञानचर्चा होती रही। दोपहर डेढ बजे मैं घर पहुंच गया। पता नहीं कैसे, लेकिन ऐसा हर बार होता था, मैं जब भी गांव जाता था, मेरे छह साल के भतीजे को अपने आप इत्तिला मिल जाती थी कि मैं घर आ रहा हूं और वो आधे रास्ते में ही मुझे पकड़ लेता कि चाचू मेरे लिए क्या लाए हो। इस बार भी उसने रास्ते में ही मुझे घेर लिया और अपनी रिश्वत मांगनी शुरू कर दी। मैंने बैग में से ड्राई फ्रूट्स का पैकेट निकाला और उसे पकड़ाकर अपनी जान छुड़ाई। घर पहुंचा तो मम्मी ने कई जगह से छूकर नब्ज चैक की कि कहीं मैं रास्ते में दुबला तो नहीं हो गया हूं और ढंग से खाना खाता हूं या नहीं। मम्मी ने फिर भी कह ही दिया कि दो महीने में ही कितना दुबला हो गया है, जबकि पिताजी की राय में जन्माष्टमी पर मेरे पिछले गांव के दौरे से दिवाली की अवधि में मेरा वजन घटने की बजाय कुछ बढ़ गया था। दिवाली वाले रोज सुबह से ही घर पर माहौल बड़ा उल्लासजनक था। मेरी साढ़े तीन साल की भतीजी के क्रेकर कलेक्शन में कई तरह की रंगीन फुलझड़ी और लाल पटाखे थे, जिन्हें वो बड़े चाव से मुझे दिखा रही थी। भतीजा इस बात की शिकायत कर रहा था कि उसके कुल १२ रॉकेट में से एक किसने चुरा लिया था। गांव का माहौल भी सदाबहार नजर आ रहा था। आज काम की चिंता कम ही लोगों को थी, लेकिन फिर भी सरसों की बुआई और गेहूं की फसल के लिए सिंचाई की मशक्कत जारी थी। मेरे पिताजी धार्मिक प्रवृत्ति के हैं और उन्होंने सुबह ही कह दिया था कि वे आज श्रीमद्भागवत कथा सुनने के लिए पड़ौस के गांव में जाएंगे। मेरे बड़े भैया उन्हें सुबह ग्यारह बजे पांच किमी दूर उस दूसरे गांव में छोडऩे चले गए थे। हालांकि मम्मी को यह नहीं सुहा रहा था कि वे त्योहार के रोज भी कथा सुनने जाते, लेकिन पिताजी कहां मानने वाले थे। भैया उन्हें दोपहर में कथा में छोड़कर आ गए। दिन में मैं अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला और स्कूल की पढ़ाई से लेकर अब तक की उन्नति की यादें ताजा हुईं। वही हुआ जिसका डर था, पिताजी को लेकर बड़े भैया कथा सुनकर शाम को छह बजे घर लौटे और मम्मी को गुस्सा आ गया कि वे त्योहार के रोज भी देर तक दूसरे गांव में कथा सुनते रहे थे। मेरी मम्मी हर चीज को व्यवस्थित ढंग से पूरा करना चाहती हैं, उन्हें समय पर हर कार्य पूरा चाहिए, इसलिए जब पिताजी देर से लौटे तो इस बात पर दस मिनट तक बहस होती रही कि दिन ढले गांव के मंदिर में अब तक भोग लगा दिया जाना चाहिए था, जो पिताजी की कथा की वजह से लेट हो गया था। बाद में बड़े भैया मंदिर गए और उन्होंने वहां प्रसाद का भोग लगाया। मैंने रोशनी के लिए घर पर मोमबत्तियां जलाईं और भाभी ने घर में घी के दीपक जलाए। अब फुलझड़ी-पटाखे फोडऩे की बारी मेरे भतीजे-भतीजी की थी, जो सुबह से ही इस बात की प्लानिंग कर रहे थे कि किसको कितने पटाखे चलाने हैं। इससे एक घंटे पहले मैंने अपने कुछ दोस्तों को दिवाली के मैसेज किए और अपने कुछ खास परिचित और मित्रों को फोन करके दीपावली की बधाई दी। मेरा मानना है कि मैसेज एक फॉर्मलिटी होती है, लेकिन जिन्हें आप अपना अच्छा मित्र या नजदीकी समझते हैं, उन्हें हमेशा फोन पर बातचीत करनी चाहिए। इसलिए शाम को ठीक पांच बजे जब मैंने अपनी एक फ्रेंड को, जो कहती हैं कि अभी हम फ्रेंड बन पाए हैं या नहीं, इस बारे में निर्णय होना बाकी है, को फोन किया, उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। मैंने सोचा शायद कहीं व्यस्त होंगीं। फोन के रिप्लाई की कुछ मिनटों की प्रतीक्षा घंटों में तब्दील हुई, आखिर मैंने अपनी ओर से पहल करते हुए शाम को सवा आठ बजे उन्हें लक्ष्मी-गणेश का शुभ दीपावली लिखा एक मल्टीमीडिया मैसेज भेज दिया। इस मैसेज के जवाब की प्रतीक्षा में मेरी रात कट गई, हालांकि इन्हीं फ्रेंड का दावा है कि आपके एक नजदीकी का इग्नोरेंस आपको उससे कहीं अधिक दुख देता है, जितना कि उसके द्वारा कहे हुए सौ कठोर शब्द। इन कठोर शब्दों को उन्होंने अपनी भाषा में रूड वड्र्स कहा है। सुबह हुई और इस बार फिर मेरे भतीजे और भतीजी में ठन गई थी। मेरे बड़े भैया खेतों की जुताई पर जाने वाले थे और भतीजे की जिद थी कि वो ट्रैक्टर की सवारी करेगा और हमारे खेत वो खुद ही जोतेगा। मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं छह साल की उम्र का था तो ट्रैक्टर को देखते ही डर जाता था कि पता नहीं कब कुचल देगा और उसी उम्र में मेरा भतीजा ट्रैक्टर की सवारी गांठने की कह रहा था, यह समय में बदलाव का सूचक है। भतीजी की जिद भी ट्रैक्टर में बैठकर खेतों में घूमने की थी। आखिर मामला इस बात पर तय हुआ कि दोनों बच्चों को दो-दो रुपए दे दिए जाएं। भतीजे को रिश्वत की आदत अधिक थी, इसलिए वो पांच रुपए लेकर राजी हुआ। आज का दिन गोवर्धन पूजा का दिन था, इसलिए दोपहर से ही मम्मी और भाभी चार भैंसों के गोबर को लेकर उसे एक पर्वतरूपी मनुष्य का आकार देने में लग गई थीं। साथ में श्रीकृष्ण भगवान और उनके साथी ग्वालों को भी आकार दिया गया, माध्यम था गोबर। शाम हो गई थी और अभी तक मुझे अपनी ऑफिस के कुलीग्स के बहुत कम दिवाली संदेश प्राप्त हुए थे। जबकि मेरे विचार से मैं सभी लोगों को मैसेज या फोन करके बधाई दे चुका था, लेकिन जवाबों की प्रतीक्षा अब तक थी। शाम छह बजे इस बारे में मेरी ऑफिस में मेरी मुंहबोली बहन से बात हुई, उसने कहा कि भैया, कई बार ऐसा हो जाता है। लेकिन मैं इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। क्यों हम कुलीग्स के पास भी एक-दूसरे को विश करने लायक टाइम नहीं था। घर पर बड़े भैया, भाभी, मम्मी, बुआ, पिताजी, बड़ी बहन और बच्चों ने हंसी-खुशी से गोवर्धन पूजा की, मैं भी पूजा में शामिल हुआ, पर उतना प्रसन्न नहीं था।मैं दिवाली मनाकर लौट आया हूं, रास्ते में बहुत सी ऐसी बातें हुईं, जिन्हें शब्दों में लिख पाना कठिन है। इस बार की दिवाली बहुत अच्छी रही, मैंने अच्छे से मनाई, पर फिर भी कुछ कसक सी बाकी रह गई। अफसोस, मेरी दूरियां भगवान श्रीराम के प्रयासों के बावजूद फना नहीं हो सकीं।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment