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Saturday, 18 July 2009

कमाई की गणित

लो जी साब ये तो कमाल हो गया! हमारे मीडिया वाले जिस तरह सचिन और माही की कमाई पर निगाह गड़ाए बैठे रहते हैं। और हर दस-पन्द्रह दिन में एक नॉन स्टॉप खबर बना देते हैं, कि बोर्ड फलां खिलाड़ी को इतना पैकेज दे रहा है और फलां खिलाड़ी ने गेम-कम-एड की कमाई से नया रेस्टोरेंट खरीद लिया है। लेकिन कमाई क्या होती है ये तो पहली बार अब पता चला है। आपको भले ही यह सुनकर कोई फर्क नहीं पड़ा हो, लेकिन सच मानिए हमारे होश तो अब तक ठिकाने नहीं हैं। टेनिस में बादशाहत की कुर्सी तक पहुंच चुके फेडरर से हमें तो बहुत जलन हो रही है। जनाब ने एक साल में ही 48 करोड़ की कमाई की है और हमारे धोनी-सचिन आठ नौ करोड़ ही कमा पाते हैं। बापूजी ने खूब समझाया कि बेटा पढ़ाई-लिखाई करके या तो डॉक्टर बन जाना नहीं तो कहीं किसी खेल-वेल में ही लग जाना। हमने भी कोशिश खूब की पर पढ़ाई की मोटी-मोटी किताबों को देखते ही नींद आने लगती। पिताजी खूब कहते पर हमारा मन चन्द्रकांता संतति और प्रेमचंद के ज्ञान खजाने के अलावा कहीं न लगा। साथ में रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाले सस्ते उपन्यासों का भी ऐसा चस्का लगा कि जनाब स्नातक आते-आते हमारी गाड़ी पचास प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाई। खैर गलती हुई और अब हो भी क्या सकता है। पर एक बात आपको बता दें हमारा किस्मत पर अटल विश्वास है, इसलिए जब तकदीक में कलमघसीट बनना लिखा था तो भला होनी को कौंन टाल सकता है।ऐसा नहीं है कि हमने बापू का नाम बिल्कुल ही मिट्टी में मिल जाने दिया। जब डॉक्टरी में दाखिला नहीं मिल पाया तो हमने बापूजी के दूसरे नुस्खे पर अमल करना शुरू कर दिया। रोज सुबह सवाई मान सिंह स्टेडियम में जाते और क्रिकेट की प्रैक्टिस करते। अब आप यह कहेंगे कि हमने क्रिकेट में जाने की ही क्यों सोची, तो आपको बता दें कि टीवी पर मैच आते वक्त आदमी खाने का कौर निगलना भूल सकता है पर नजर टीवी से इतर नहीं फिरा सकता। तो हम रोज एसएमएस स्टेडियम जाते। पर ससुर किस्मत ने यहां भी दगा दिया, जब कोच साहब के सामने हमने पहली बार खेला तो गेंद नजदीक आते-आते हमारी आंखें मिच गईं और गेंद ने हमारी विकेट उड़ा दी। गेंद के डर से हमारी आंख बंद होने को कोच साहब ने ताक लिया और अगले रोज से न आने की हिदायत दी।हिम्मत हमने यहां भी नहीं हारी और पांच फुट तीन इंच की अपनी कम लम्बाई बढ़ाने के लिए दोस्त की सलाह पर जिम जाना शुरू कर दिया। क्रिकेट खेलने के पीछे एक वजह यह भी थी कि साहब इतनी कम लम्बाई पर हमें और कहीं तो दाखिला मिल नहीं सकता था। खैर खुद को दूसरा सचिन समझने की भूल हमारी खत्म हुई और हमने जिम में कदम रखा। जिम वाले भाई साहब ने पहले दिन ही धमका दिया कि लम्बाई तो बढ़ेगी नहीं, सीना बढ़ाने-बाजू फुलाने के चक्कर में लम्बाई कम होने के चांस अधिक हैं। तो साहब यहां से भी तौबा बुली और हम इस दुनिया में आ गए। आज आपके सामने व्यथा कह दी तो दिल हल्का हो गया। हालांकि बापूजी ने यहां भी हमारी नालायकी समझी और कहा कि हमने जानबूझकर क्रिकेट में नाम रोशन नहीं किया। जब कलमघसीट नौकरी में कदम रख रहे थे तो फिर बापूजी ने नई सीख दी, बेटा प्रेमचन्द और दूसरे लेखक, पत्रकार अपनी कमाई से बच्चे नहीं पाल पाते। पर लेखकी का शौक ऐसा सिर चढ़ा कि अब तक नहीं उतरा। इसलिए रोज कहीं न कहीं कुछ लिखकर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। आज आपके सामने यह नया तुर्रा छोड़ दिया इसलिए आप अब तक हमें भुगत रहे हैं। खुदा खैर करे!

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