तब मेरी उम्र बमुश्किल आठ या नौ बरस रही होगी, हमारे छोटे से गांव में एक मिडिल तक स्कूल था, बचपन में पढ़ाई करने कम, हम खेलकूद के लिए स्कूल अधिक जाते। कभी नीम, पीपल के पेड़ों पर चढ़कर लुकाछिपी खेलना तो कभी गुल्ली डंडा के खेल में फैसला नहीं होने पर एक दूसरे से झगड़ पडऩा। दोपहर में आधे घंटे के लिए स्कूल से छुट्टी मिलती तो रास्ते में धूल उड़ाते, एक दूसरे को टंगड़ी लगाते घर पहुंचते। मैं शाम को घर पर बड़े भैया के साथ रामायण पाठ करता, यही कोई एक-डेढ घंटे। रामायण के अंतिम कांड में रामराज्य का वर्णन था, मुझे भी अपने गांव का माहौल उस समय रामराज्य से कम नजर नहीं आता था। और मैं गांव को अयोध्या समझता।
... यह रोज की बात थी, हमारे घर के बड़े से आंगन में हमें एक हरिजन वृद्धा झाड़ू बुहारते हुए मिलती। उम्र यही कोई साठ वर्ष रही होगी, चेहरे पर घनी झुर्रियां और आगे से दांतविहीन पोपले होठों को खोलकर वह हंसते हुए हमारा स्वागत करतीं। अम्मा से रोटी की मांग करते मैं जब आंगन में उछलकूद मचाता, तो वह मुस्कुराते हुए कहतीं कि बेटा ज्यादा शैतानी नहीं करते। मैं रोटी खाता रहता और उनको झाड़ू बुहारते देखता रहता। इस मेहनत के बदले उन्हें हमारे घर से मिलती एक गेहूं की मोटी रोटी। यह हमारे घर की रीत नहीं, बल्कि गांव के सभी घरों से उन्हें झाड़ू के बदले एक-एक रोटी दी जाती। फिर भी वह खुश थीं।
कह नहीं सकता, लेकिन मुझे शुरू से ही उनसे कुछ लगाव हो गया। नाम था बादामी। मैं उन्हेंं अम्मा कहने लगा। हल्की झीनी पैबन्द लगी साड़ी और हाथ में झाड़ू लिए वह पूरे गांव का फेरा लगातीं। एक बात और उनके साथ गबरू कुत्ता होता। गधे से थोड़ा कम ऊंचाई का यह कुत्ता देखने में ही खतरनाक लगता, इसलिए गांव के लोग कुत्ते के नजदीक नहीं आते। मैं बादामी अम्मा का थोड़ा नजदीकी था, इसलिए गबरू मुझसे कुछ नहीं कहता था। इस बात से दूसरे बच्चों के बीच मेरी कुछ धाक जम गई थी। दूसरे बच्चों को मैं गबरू के नाम से उन्हें डरा भी देता था। इतनी समझ नहीं थी, फिर भी १५० घरों के छोटे गांव में सबसे परिचित हो गया था। बादामी अम्मा के सात बेटे थे।
ज्यादा कुछ काम तो उनका परिवार करता नहीं था। न तो गांव के दूसरे किसानों की तरह खेती का काम था, न ही कभी भेंस या गाय जैसे पशुओं का पालन करते थे। हरिजन होने के कारण गाय रखने पर तो शायद पूरा गांव उनके विरोध में उतर आता। मेरी अम्मा भी कैसे अक्सर मुझे डांटती थीं, जब मैं बादामी अम्मा को छू लेता। डांटते हुए हाथ के हाथ नहलाने की जिद करतीं, मैं रोने लगता तो पानी के छींटे मारकर मुझे पवित्र करतीं और फिर बादामी से दूर रहने को कहतीं। इसमें क्या रहस्य था, तब समझ नहीं आता था। और हां, एक बात और अक्सर मेरी बड़ी दीदी कहानी सुनातीं कि पहले बादल धरती पर बहुत नीचे थे। एक बार बादामी सिर पर कूड़े का टोकरा उठाए जा रही थीं। बादल कुछ ज्यादा नीचे हो गए, तो बादामी का टोकरा बादलों से अटक गया। बादामी को गुस्सा आया तो झाड़ू से बादल को पीटने लगीं, पिटाई के डर से बादल इतना ऊंचा हो गया कि फिर कभी धरती के नजदीक नहीं आया। कहानी सुनाते ही दीदी हंसने लगती और मैं बादामी अम्मा के इस चमत्कार का लोहा मानता कि बादामी अम्मा से तो बादल भी डरते हैं।
बादामी अम्मा का छठा बेटा सुनील मेरी ही क्लास में था। वह हरिजनों का पहला बच्चा था, जो स्कूल तक पहुंचने में कामयाब हुआ था, वरना उससे बड़े दूसरे बेटे तो सुअर, भेड़-बकरी ही चराते थे। बादामी अम्मा के पांच बेटों की शादी हो गई थी। इस बार जब उनके पांचवें बेटे की शादी हुई तो वो नई-नवेली बहू को लेकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने आई। अब बादामी अम्मा को काम से राहत हुई, अब उन्हें झाड़ू लगाने और कूड़े का टोकरा उठाने से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा शायद बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन मेरी अम्मा बतातीं थीं कि बादामी अम्मा की बड़ी बहुएं मेहनत नहीं करना चाहतीं, इसलिए वे बादामी अम्मा से अलग रहती हैं। ऐसा शायद दस दिन हुआ होगा जब बादामी अम्मा को झाड़ू नहीं लगाना पड़ा। ग्यारहवें दिन जब मैं स्कूल से इंटरवैल के टाइम पर घर पहुंचा तो बादामी अम्मा को फिर झाड़ू पकड़े पाया। आज अम्मा के साथ उनकी पांचवीं बहू भी नहीं थी, साथ था तो गबरू और झाड़ू। अब बादामी अम्मा को फिर से काम करना पड़ रहा था, पांचवा बेटा भी अब उनसे अलग हो गया था। लेकिन हमारे लिए बादामी अम्मा का वही प्यार बरकरार था। शायद बादामी अम्मा को काम करना अच्छा लगता था, इसलिए वह पूरे गांव का झाड़ू निकालने के बाद भी हंसती रहती थीं।
दिन गुजरते गए, मैं गांव के मिडिल स्कूल से पास होकर सैकण्डरी स्कूल में आ गया, चार साल बाद भी हालत जस के तस थे। बादामी अम्मा की दिनचर्या यथावत थी, वह रोज झाड़ू निकालतीं और गावं के हर घर से एक रोटी पातीं। मैं अब भी दिल से उनके नजदीक था। टाइम मिलने पर उनके गबरू के साथ खेलता, बादामी अम्मा अब भी मुझे दुलार करतीं। मेरी अम्मा के साथ अपने बेटे-बहुओं की बातें बतातीं, पर उन्हें शायद कोई गिला नहीं था। इन दिनों एक आश्चर्यजनक परिवर्तन मैं अपनी अम्मा में देख रहा था, अब जब मैं बादामी अम्मा के साथ खेलता तो वह मुझे डांटती नहीं थी। न ही कभी नहलाने की जिद करतीं। अब बादामी अम्मा के हाथ-पैर जवाब देने लग गए थे। कुछ दिन पहले उनके छठे बेटे सुनील, जो आठवीं क्लास तक मेरा क्लासमेट रहा था, की शादी हो गई थी। अब वह भी अपनी बीवी के साथ अलग रहने लग गया था।
पन्द्रह दिन की छुट्टियों के बाद वापस भाई साहब ने जयपुर बुला लिया अब डॉक्टरी में प्रवेश के लिए पीएमटी का एग्जाम देना था। मैं डॉक्टर तो नहीं बन पाया, लेकिन एक समाचार पत्र में संवाददाता हो गया था। गांव का जीवन भी जैसे एक बिसरी पृष्ठभूमि की तरह पीछे छूटने लगा था। पिताजी ने फोन कर गांव आने को कहा। चार दिन की छुट्टी थी। मैं गांव पहुंचा ही था, कि अम्मा ने सूचना दी, बेटा आज सुबह बादामी चल बसी। मैं एकाएक कुछ समझ न सका। लेकिन अभी तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। मेरे पूछने पर अम्मा ने बताया कि सभी बहुएं अलग रह रही थीं, हाथ-पांव भी साथ छोड़ गए थे। पिछले कुछ दिनों से झाड़ू लगाने भी नहीं आई। शायद बीमारी से मौत हो गई। एक बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी। बादामी अम्मा अब सब कष्टों से दूर थीं। मेरे बचपन के गांव का रामराज्य और अयोध्या जैसा अनुभव अब पीछे छूट गया था। वह शायद शीशे की अयोध्या थी, जो अब चकनाचूर हो गई थी।
Monday, 7 September 2009
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