Tuesday, 6 October 2009
धवन साहब आप बोर नहीं होते ?
वे फिल्म बनाए चले जा रहे हैं और हमारी मजबूरी यह है कि हम फिल्म नहीं देखें तो टाइम कैसे पास हो। दिवाली की छुट्टियां होने ही वाली हैं ऐसे में सिनेमाघरों में लम्बे समय बाद डेविड धवन की फिल्म लगी है डू नॉट डिस्टर्ब। फिल्म लग ही गई है, तो देखना भी बनता है, नहीं तो मीमांसा कैसे करेंगे। इस दशक के बीच में जब तक गोविन्दा और धवन साहब के बीच सुलह नहीं हुई थी और झगड़ा कांटे की टक्कर का था, तो दर्शक बड़े फायदे में रहे। प्रियदर्शन साहब ने डू नॉट डिस्टर्ब देख रहे मेरी बगल वाली सीट पर बैठे भाई साहब की तरह किसी को बड़ी वल्गर फिल्म है,कहने का मौका नहीं दिया। और दूसरे उनकी फिल्में सार्थक और सहज हास्य की कॉमेडी फिल्मों के लिए हमेशा याद की जाएंगी। बात चाहे हेराफेरी, चुप चुपके, हंगामा जैसी शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों की हो या ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी मालामाल वीकली और हलचल जैसी फिल्मों की। हर जगह प्रियन साहब ने अपनी छाप छोड़ी और एक अपने धवन साहब हैं, जो द्विअर्थी और बेतुके संवाद एवं भद्दे दृश्यों के जरिए फिल्म को हिट कराना चाहते हैं। राजपाल यादव और रणवीर शौरी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों को केवल चुनिंदा दृश्यों तक सीमित कर दिया गया है। एक अमीर बिगड़ैल के किरदार में आए गोविन्दा अपनी पत्नी से खुश नहीं हैं और एक हाई-फाई मॉडल का हाथ थामना चाहते हैं। पत्नी के किरदार में सुष्मिता भी डेढ सयानी हैं और वे पहले ही अपने पति की जलील हरकतों को जानने के लिए अपने दोस्त डिटेक्टिव को लगा चुकी हैं। फिल्म के दृश्यों को देखकर लगता है, जैसे जबरदस्ती रबड़ की मांनिद खींचा जा रहा हो। त्रिकोण में फंसते हैं रितेश देखमुख, जो अमीर गोविन्दा की गलतियों को छुपाने के एवज में अपनी सातवीं पीढ़ी तक के खानपान का इंतजाम कर लेना चाहते हैं। आधारहीन विषय को लेकर लिखी गई कहानी, अपने सही बहाव में नहीं है। ढाई घंटे अवधि की फिल्म में दर्शक की नजरें सही मायनों में पर्दे की तरफ उन्हीं दृश्यों में जाकर टिकती हैं, जब स्क्रीन पर सोहेल खान दिखाई देता है। सोहेल का कुछ मिनटों का आक्रामक रूप अच्छा बन पड़ा है। अभिनय के लिहाज से भी उन्होंने बेहतर प्रयास किया है। सुष्मिता सेन को पत्नी का किरदार थमाकर उनके साथ न्याय किया गया है, अब वे एक्ट्रेस के रोल में जमती भी नहीं हैं। हाई-फाई मॉडल की आयुसीमा से अब लारा दत्ता का पत्ता कट चुका है, इस तरह के रोल में अब बिपासा ही अच्छी लगती हैं, पूरी फिल्म में उनके चेहरे के भावों को देखकर लगता भी नहीं, कि किसी पाठशाला से उन्होंने एक्टिंग के किसी अक्षर की पढ़ाई भी की है। रितेश देशमुख और राजपाल यादव के काम को अच्छा कहा जा सकता है। रणवीर शौरी थिएटर के मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन उन्हें सही रोल नहीं मिल पाया है। फिल्म के गीत-संगीत का पक्ष भी कमजोर ही रहा है। पूरी फिल्म में केवल एक गीत कुछ मिनटों के लिए आपको सही लग सकता है। बेबो नाम का यह गीत भी युवाओं में चचंल किस्म की कुछ विदेशी सोच वाली संतानों को पसंद आ सकता है। फिल्म की शूटिंग की बैकग्राउंड देखकर लगता नहीं कि धवन साहब ने अधिक खर्चा किया होगा। फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ भी नहीं है। मुझे इजाजत मिले और पांच स्टार में से धवन साहब की इस नई फिल्म को अंक देने को कहा जाए तो डेढ से अधिक स्टार देने की हिमाकत नहीं कर सकता। क्योंकि ढाई घंटे की फिल्म में मैंने भी अपना टाइम परदा निहारने में कम अपने मोबाइल पर मैसेजिंग में अधिक बिताया था। इसलिए जिन बंधु-बांधवों ने फिल्म नहीं देखी है, वे अपना टाइम और पैसा बिल्कुल भी खर्च न करें।
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