चौ. कोऊ कहे आए दशरथनंदन, विप्रजनों ने प्रवचन दीन्हे।
जिन के अकुलाहट है भारी, तीन घड़ी तक कुछ नहीं कीन्हे।।
चौ. नगर द्वार आए जन-जन प्रभु राह तके और कछु नहीं दीखे।
सब ही बने गुरु इक-दूजे, अब आएंगे राम और सीते।।
चौ. दूर देखि उड़ती पग धूलि, मात् संग आए शत्रुघ्न।
भ्रात भरत की गति नहीं उज्ज्वल, बिसरे सब मात्-बांधवजन।।
चौ. नयन भरे जल, दरसन इच्छुक, प्रभु कैसे हों दरस तुम्हारे।
मो सम कौंन कृतघ्न दुनिया में, मोसे अच्छे लखन प्यारे।।
चौ. मंद गति, दीपक से उज्ज्वल, लखन संग आए त्रिपुरारी।
पीछे सीता और कपीश्वर, अवधजनों की भीड़ है भारी।।
चौ. चंचल नयन, गात कोमल और सिर पर जटा-जूट है भारी।
चौदह बरस बाद अवधीश्वर, झलक देख हर्षे नर-नारी।।
चौ. ज्यों पहुंचे प्रभु नगर द्वार पे, आशीर्वचन दियो कैकेई मां।
गुरू वशिष्ठ ने वचन सुनाए, सबसे गले मिले प्रभु कर्मा।।
सो. सब प्रसन्न नर-नारि, हर्षित मन दीपक जले।
अवध भाग गए जाग, भ्रात प्रेम की ये कथा।।
यदि आप उपरोक्त चौपाई और सोरठा का सारांश समझ गए हैं तो नीचे लिखी पंक्तियों पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, ये चौपाईयां रामायण या किसी अन्य धर्मग्रन्थ से नहीं ली गई हैं। इन चौपाईयों का लेखन मैंने अपनी अल्पबुद्धि से किया है। यदि किसी बंधुजन को कुछ गलत लगे और सुझाव देना चाहें तो स्वागत है।
अनुवाद: अयोध्या में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि के बाद वापस लौटने की खबर है। इससे लोग प्रसन्न हैं और अकुलाए हुए हैं। कई लोग तो अपना घरेलू कार्य छोड़े तीन प्रहर से प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ब्राह्मण जन लोगों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। सारे नगरवासी द्वार पर इकट्ठे हो गए हैं लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। प्रभु श्रीराम के आगमन के बारे में अटकलें लगाते हुए सब एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं और समझा रहे हैं कि प्रभु श्रीराम सीता और लक्ष्मण समेत जल्द ही यहां आएंगे। पैरों से उडऩे वाली रेत को देखकर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न तीनों माताओं को लेकर नगर द्वार पर पहुंचे। लेकिन भ्राता भरत की स्थिति अच्छी नहीं है। वे अभी भी श्रीराम के वनवास जाने के लिए खुद को उत्तरदायी मान रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें ध्यान ही नहीं है कि उनके आस-पास कौंन खड़ा है, वे केवल बड़े भाई राम के आगमन की राह तक रहे हैं। उनके नयनों में जल भरा हुआ है और उदास से खड़े भरत की प्रबल इच्छा है कि उन्हें जल्द से जल्द भगवान श्रीराम के दर्शन हो जाएं। वे मन में विचार कर रहे हैं कि मेरे समान कृतघ्न इस दुनिया में कौंन है। मुझसे अच्छा तो छोटा भाई लक्ष्मण है, जिसे चौदह वर्ष तक भैया की सेवा का मौका मिला है।इसी समय धीमे-धीमे चलते हुए प्रभु श्रीराम, जिनके चेहरे की आभा चारों ओर दीपक की रोशनी के समान फैली हुई है। लक्ष्मण और सीता समेत नगर द्वार पर पहुंचे। उनके पीछे ही वानर राजा सुग्रीव, हनुमान और बहुत सारे नगरवासी हो लिए हैं।चंचल नयनों वाले प्रभु श्रीराम जिनकी त्वचा अत्यन्त कोमल है, लेकिन सिर पर उनके अभी भी जटाएं लिपटी हुई हैं। लेकिन अयोध्यापति श्रीराम की चौदह वर्ष बाद झलक देखकर अयोध्या का हर नर-नारी प्रसन्न है और प्रभु श्रीराम की जय-जयकार कर रहा है।प्रभु श्रीराम जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे, सबसे पहले उन्होंने माता कैकेई के चरण छुए और उन्होंने श्रीराम को आर्शीवाद दिया। गुरू वशिष्ठ का आर्शीवाद लेकर प्रभु श्रीराम ने बहुत सारे नगरवासियों को भी गले लगाया।प्रसन्न मनों से अपने घर लौट रहे नगरवासियों ने घर-घर में दीपक जलाए, जिससे पूरी अयोध्या रोशन हो गई। दूसरी ओर भगवान श्रीराम और भरत के देर तक हुए मिलाप ने दो भाईयों के प्रेम की कथा कही, जिसे देखकर लगा कि अब सही मायनों में अयोध्या का भाग्योदय हुआ है।
Thursday, 15 October 2009
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