ऑस्ट्रेलिया में दिनों-दिन हो रही हमारे छात्रों की पिटाई ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के दिल में चिंता का गहरा जख्म बना दिया है। मंत्री साहब की चिंता वाजिब है और अब उन्होंने इसके लिए एक रामबाण इलाज भी खोज लिया है। ऐसा नहीं है की अब हमारे बच्चे कहीं पढ़ नहीं पाएंगे या विदेशी शिक्षा नहीं ले पाएंगे। जनाब की मानें तो अब यहीं पर सारे छात्रों को बुला लिया जाए और छात्र ही क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों को यहीं खुलवा लेंगे। हमारे पास क्या जर- जमीन की कमी है जो विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुदान में नहीं दे सकते! भई आखिर ये हमारे सपूतों के भविष्य का मामला है। और इसकी चिंता मंत्री साहब को नहीं होगी तो क्या हमें होगी। विदेशी संस्थानों को यहाँ बुलाने को पढ़ी- लिखी भाषा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। और जब विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आयेंगे तो हमारी शिक्षा अपने आप विलायत के स्तर की हो जायेगी। वैसे भूलने की बात नहीं है, पर मंत्री साहब के पास बहुत काम होते हैं, इसलिए भूलना बड़ी बात भी नहीं है। साहब आपको याद दिला दें, जब- जब यहाँ विदेशी निवेश हुआ है, हमेशा घाटा ही हुआ। अपनी मूंछ ऊँची रखने वाले राजाओं की आपसी मारकाट में तेमूरलंग, मुग़ल राजाओं का निवेश हुआ तो ऐसी लूटमार मची कि सोने कि चिडिया कहलाने वालोँ के खाने के लाले पड़ गए। फिर गोरों की 'फूट डालो और राज करोÓ की कूटनीति के निवेश को हमने दो सदी तक भुगता। एक कम्पनी के नाम से घुसपैठ बनाकर गोरे साहब ऐसे जमे कि निकलने का नाम ही नहीं लिया, ये तो भला हो अपने गांधी बाबा का, जिन्होंने एक अधझुकी लाठी के सहारे ही फिरंगियों को धूल चटा दी। मियां मुर्शरफ ने भी यहां गजब का निवेश किया। एक तरफ तो साहब आगरा में बातचीत करने आए और दूसरी तरफ करगिल में घुसपैठियों की पूरी फौज घुसा दी। हमारी सरकार भी इतने दिन बाद जागी कि सैकड़ों जवानों की बलि चढ़ गई। चीनी भाईयों के निवेश की चोट तो सीमारेखा की क्षति के रूप में अब भी दुखती है। सेबी ने निवेश की खुली छूट दी तो हमारे दौड़ते सांड की हवा निकल गई और सेंसेक्स 25 से 8 हजार पर गिर गया। और अपनी बातें याद नहीं हैं तो पड़ौसी मुल्क की तरफ निगाह घुमा लें। मियां मुर्शरफ और उनके पूर्वज राष्टï्रपतियों ने अमरीकी अंकल को पाकिस्तान में घुसने की इजाजत क्या दी, अंकलजी लाठी के बल पर जमकर ही बैठ गए, और साहब ऐसा निवेश किया कि अब वायु, जल, थल सब तरह के अड्डे पाक सीमा में बना लिए हैं। अब तो पाकिस्तान इन अड्डों की जमीन पर अपना हक भी नहीं जता सकता। अफगानिस्तान में तालिबान की उत्पत्ति और पतन, नेपाल में माओवादियों की दादागिरी, सब विदेशी निवेश के परिणाम हैं। इसलिए विदेशी निवेश को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझना हर चमकती चीज को सोना समझना है। यूं मंत्री साहब की मर्जी है, वे जब चाहें, जिसे चाहें झण्डाबरदार बनाकर यहां निवेश करा सकते हैं, हम कौंन होते हैं, रोकने वाले। अपन तो साहब खाली-पीली सलाह दे सकते हैं, मानो या न मानो।
yeh alekh न्यूज़ टुडे jaipur के 7 july ke ank me prakashit hua है।
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