Sunday, 8 February 2009
भीष्म को कैसे क्षमा कर दें.
मुझे महाभारत का एक प्रसंग याद आ रहा है। जब भीष्म विदुर के साथ बात करते हुए कहते हैं, मैं कभी भी पांडवों का बुरा नही सोच सकता। न ही कभी उनके हितों के साथ समझोता करूँगा, लेकिन विदुर जीवन में मुझसे कुछ ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं जिनका प्रायश्चित करना नामुमकिन है। एक अपाहिज अंधे की जिद पर मैंने पिताविहीन पांडवों को कुंती समेत वारणावत भेज दिया था। तब इस दुर्योधन ने उन्हें .जला मारने की कुचेष्टा की, इसने जुए के जरिये द्रोपदी का अपमान किया, लेकिन मैं कई अवसरों पर शांत रहा। आज जब पांडव १३ वर्ष के वनवास के बाद वापस हस्तिनापुर आना चाहते हैं। तब भी इस दुर्बुद्धि ध्रतराष्ट्र को उनके आने पर शोक है। जब भी मैं इसके हित की बात करना चाहता हूँ, यह पुत्रमोह में पड़कर रोने लगता है। आख़िर यह भी तो मेरे बेटे के समान है, मैं इसे भी रुलाना नहीं चाहता। उस समय विदुर का प्रश्न जैसे ज़माने भर की कड़वाहट लिए हुए था, तातश्री फिर आपको ये राज्य ध्रतराष्ट्र को सौंप देना चाहिए, क्योंकि आप पांडवों के आंसू देखने के आदी हो चुके हैं। आपको ये भी ध्यान नहीं है कि न केवल इन्द्रप्रस्थ बल्कि हस्तिनापुर के सिंघासन पर भी युधिष्ठिर का ही हक़ बनता है। इसलिए ये आपका कर्तव्य है कि आप युधिष्ठिर को ससम्मान उसका राज्य दिलवाएं। आप जानते हैं कि अब उनके साथ मुरली मनोहर भी हैं और वैसे भी यदि युद्ध हुआ तो अर्जुन और भीम ही किसी भी देश की कितनी भी बड़ी सेना और रथियों को हरा सकते हैं। फिर आपको किस प्रमाण की आवश्यकता है वैसे भी सारे कुरु योद्धाओं ने विराट युद्ध में अर्जुन के बाणों का स्वाद चख ही लिया है। बड़बोले कर्ण, घमंडी अश्वत्थामा, असभ्य दुर्योधन नीच दुशासन और आप जैसे महान योद्धा, गुरु द्रोण, आचार्यवर कृप आदि सब वीरों को अकेले पार्थ ने पीछे कर दिया था। आपके श्वेत अम्बर के अलावा उसने सबके वस्त्र भी उतार लिए थे। क्या फिर भी अंध भ्राता धृतराष्टï्र और मदांध दुर्योधन उनसे युद्ध करना चाहते हैं। क्या आप भूल गए हैं कि उन्होंने वचन निभाने की खातिर 13 वर्ष का वनवास पूरा किया है। एक वर्ष तक तो चाकर जैसी स्थिति में विराटनरेश की सेवा में बिताए हैं। क्या आपको नहीं पता कि अज्ञातवास की अवधि में पांडवों ने द्रोपदी समेत कितने कष्टï झेले हैं। यकायक पितामह भीष्म विचलित हो उठे। हाथ स्वयमेव सिर पकडऩे वाली मुद्रा में हो गए। विदुर तुम्हारी एक-एक बात जब सुनता हूं तो ह्रïदय में तीर की नोक जैसे चुभती है, लेकिन मैं क्या करूं। मैंने प्रतिज्ञा करते समय यह भी कसम खाई थी कि मैं हस्तिनापुर नरेश की आज्ञा की सदैव पालना करूंगा। मान लिया कि धृतराष्टï्र मेरे पुत्र जैसा है, लेकिन फिर भी वह राजा है और उसकी आज्ञा की खिलाफत करना मेरे वश में नहीं है। मेरी अटल प्रतिज्ञा है कि जो भी हस्तिनापुर को टेढ़ी नजर से देखेगा, मैं उसे बख्शूंगा नहीं, चाहे वह मेरे प्रिय पांडव पुत्र ही क्यों न हों। हालांकि यह जख्म मुझे आज भी टीसता है कि विधाता मैंने ऐसी कठोर प्रतिज्ञा क्यों की। मैं यह भी जानता हूं कि युद्ध हुआ तो अर्जुन के तीर किसी भी योद्धा को जीवित न छोड़ेंगे। मैं भी अजेय नहीं हूं। द्रोण शिष्य को धर्नुविद्या में कुछ नुस्खे तो ऐसे आते हैं कि भगवान शंकर के अतिरिक्त उसे धनुर्युद्ध में जीतना किसी के लिए भी संभव नहीं है। तुम ही बताओ क्या मुझे अच्छा लगेगा जब मेरा प्रिय अर्जुन मेरी छाती बींधेगा या अपने गुरु द्रोण के ह्रïदयस्थल में घाव बनाएगा या अपने बांधवों को मृत्यु के घाट उतारेगा, नहीं कदापि नहीं विदुर। मैं ऐसा नहीं चाहता, लेकिन नियति यदि यह चाहती है तो भला मैं ऐसा होने से कैसे रोक सकता हूं। सारांश: प्रस्तुत आख्यान के जरिए भीष्म पितामह के कर्तव्यबोध और उनकी विवशताओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।
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