स्वागत है

यदि आपके पास समय की कमी नहीं है और फालतू चीजें पढऩे के शौकीन है तो मुझे झेलने के लिए तैयार हो जाइए


Monday, 17 May 2010

हमको कुटिया बृज में ही बनानी

आज लम्बे अरसे बाद एक बार फिर से ब्लॉग की याद आई है और हालिया यात्रा भी कुछ ऐसी रही है कि वृतांत को डिजिटल कागज पर उतारने की प्रबल इच्छा हो रही है।
वाकया कुछ यूं हुआ कि अभी जब मैं बोरियतभरे अंदाज में एक बेमजा जिम्मेदारी की तरह अपनी एमजेएमसी फाइनल की परीक्षाएं दे रहा था तो उदयपुर से मेरे दोस्त नीरज अग्रवाल का फोन आया कि यार क्यों न गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए चला जाए। मैं बृजक्षेत्र का निवासी होते हुए भी अभी तक गोवर्धन की परिक्रमा केवल एक बार कर पाया हूं। इसलिए इस बार दिल किया तो परिक्रमा की प्लानिंग बना ली। इस यात्रा में मेरे एक और मित्र शरीक हुए विक्रम सिंह, जिनकी हालिया फोन पर बनी गर्लफ्रेंड, जो कोटा में रहती थी और जिसे वे केवल फोन पर चार महीने की बातचीत में इतनी गहराई तक चाहने लगे थे कि बात शादी तक पहुंचने की नौबत आ गई थी, से मिलाने के लिए मैं कोटा तक साथ गया था। कोटा में दो प्यार करने वाले लोगों को मिलाकर मुझे खुशी हुई थी, शायद इसका एक कारण यह भी रहा हो कि मुझे भी कभी किसी से प्यार हुआ था, है भी, लेकिन व्यक्त करने की हिम्मत अभी तक नहीं जुटा पा रहा हूं। मैं सोचता हूं कि प्यार तो बस समझने की चीज होती है, जो मैं शायद उसे समझा नहीं पा रहा। बॉस ने कोटा के लिए बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी दी थी और अब फिर से छुट्टी के नाम पर वे खासे नाराज हो गए।
खैर, शाम ४ बजे मैं और नीरज, जो उदयपुर से सुबह सवेरे जयपुर पहुंच गया था और प्रोग्राम बनने पर हम दोनों सुबह ९.३० के शो में उसी दिन रिलीज हुई हॉलीवुड मूवी आयरनमैन-२ भी देखने चले गए थे, गांधीनगर रेलवे स्टेशन पहुंचे, क्योंकि गुर्जरों की मर्जी के आगे बसें तो चल पाने में बेबस थीं। स्टेशन पर टिकट खिड़की पर करीब पचासेक लोगों की लम्बी कतार देखकर पसीने छूट गए। नीरज शुरू से ही जुगाड़ू प्रवृत्ति का रहा है और वह टिकट के जुगाड़ में था, लेकिन भीड़ के आगे वह बेबस रहा, तो टिकट लेने का बीड़ा मैंने उठाया। स्टेशन अधीक्षक से मिलकर अंदर की खिड़की से टिकट जुगाड़ किए। ट्रेन आई और नीरज की हड़बड़ी में जनरल का टिकट होते हुए भी हम स्लीपर क्लास में घुस गए। कोई आठ-दस मिनट में ही टीटीई महोदय ने टिकट देखा और जनरल में जाने की हिदायत दे डाली। जनरल डिब्बे की भीड़ को हम ट्रेन में चढऩे से पहले देख चुके थे, इसलिए हिम्मत न हुई कि स्लीपर को छोड़ पाते। आखिर स्लीपर के मोहपाश में बंधकर मैंने जेब से टीटीई साहब को ३०५ रुपए देकर जान छुड़ाई।
नीचे की बर्थ पर एक सुंदर लड़की भी सवार थी, मैं और नीरज विश्वामित्र के खानदान से तो हैं नहीं, लेकिन मैं थोड़ा शर्मीला हूं और नीरज चालू पुर्जा, इसलिए वह शुरू हो गया था। मेरी एक सप्ताह पहले की कोटा यात्रा में भी ऐसा ही हुआ था कि मैं और विक्रम केवल बैठ सकने वाले डिब्बे में सवार थे, डिब्बा कमोबेश ३० प्रतिशत खाली था, इसलिए सामने की सीट पर केवल एक लड़की सवार थी, विक्रम का कहना था कि उस सुंदर लड़की को उसने पहले भी यूनिवर्सिटी में देखा था, जबकि मेरी नजर में ऐसी कोई वाकफियत नहीं थी। अब दुर्गापुरा रेलवे स्टेशन से सवार हुए तो दोपहर थी, हमें पानी बोतल खरीदना याद न रहा और रास्ते में कोई पानी बोतल बेचने वाला नहीं आया तो गला सूखने लगा। ट्रेन की रवानगी को दो घंटे हो गए और न कोई ठीक सा स्टेशन आया कि पानी खरीद लेते। इधर हम दोनों प्यास से बेहाल थे और पानी न मिलने का रोना भी रो रहे थे, ऐसे में सामने वाली लड़की अपनी बोतल में से हर पांच मिनट में दो घूंट पानी पीती और ढक्कन लगाकर हमारे सामने बोतल को हाथों में घुमाने लगती। मैंने फुसफुसाकर विक्रम से कहा कि ये लड़की हमें पानी की बोतल देना चाह रही है, लेकिन मेरी नजर में, जिससे विक्रम भी सहमत था, लड़की से पानी की बोतल लेने से हमारी इज्जत कम हो जाएगी। इस चक्कर में कोई एक घंटे और प्यास से व्याकुल सूखे होठों पर जीभ की कोर फिरानी पड़ी। सवाईमाधोपुर स्टेशन पर पानी मिला और हमने प्यास बुझाई।
पूरा वाकया सुनते ही नीरज जोर-जोर से हंसने लगा, मैंने पूछा, यार मैंने कोई जोक थोड़े ही सुनाया है। नीरज बोला यार, तुम दोनों वास्तव में ही ठेठ जाट हो। कैसे, बोला यार, मैं होता तो लड़की से पानी मांग लेता और इसी बहाने उससे दोस्ती भी हो जाती। वो लड़की तो आगे से ही तुम दोनों को पानी पिलाना चाह रही थी, लेकिन तुमने मौके का फायदा नहीं उठाया। नीरज ने नीचे की बर्थ पर बैठी लड़की पर डोरे डालने शुरू किए, मैं भी साथ था, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई।
विक्रम को आगे के स्टेशन नदबई से सवार होना था। फिक्स शेड्यूल के बावजूद विक्रम गांव से नदबई तक वाहन न मिलने की वजह से लेट हो गया। ट्रेन के नदबई पर रुकने और दो मिनट बाद रवाना होने तक विक्रम की खैर खबर न थी इसलिए हम दोनों का मूड खराब होने लगा था। फोन लगाया तो पता चला कि हमारे फोनेटिक लवर ट्रेन के अंतिम डिब्बे में घुस पाने में कामयाब हो गए थे। भरतपुर पहुंचे तो शाम के ७.३० बज चुके थे और हमें गोवर्धन जाने वाली किसी बस की तलाश थी, किसी ने पूछने पर दूरी बताई ३२ किमी। एक बस आई तो वह ठसाठस भरी हुई थी और उसमें हम तीनों का सवार हो पाना मुश्किल था। अगली बस की प्रतीक्षा शुरू हुई, लेकिन वह भी नीचे से भरी हुई थी फिर निर्णय लिया गया कि ऊपर छत पर चढ़कर यात्रा की जाए, नुकसान केवल एक ही था, बस की छत पर किसी पेड़ की डालियों के सिर से टकराने या बबूल के कांंटे लग जाने का, क्योंकि बृज क्षेत्र में बबूलों की मात्रा भरपूर है। लेकिन हमारी खामख्याली तब हवा हो गई, जब बस की छत पर भी यात्रियों का एक रैला सवार हो गया। कुलमिलाकर ४४ सीट की उस बस में कोई ६५ व्यक्ति नीचे और चालीसेक छत के ऊपर थे। बस के ऊपर शाम ८ बजे की हल्की ठंडक वाली बयार हमें सुकून पहुंचा रही थी।
गोवर्धन पहुंचते ही परिक्रमा की धुन सवार हुई, लेकिन इससे पहले किसी ठहरने के स्थल की तलाश थी। किसी अच्छे होटल या गेस्ट हाउस की कल्पना करना यहां बेमानी है, इसलिए हमने एक धर्मशाला में कमरा लिया और खाना खाकर गिरिराज यानी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए चल पड़े। पांच बार प्रभु को पिट्टा प्रणाम (जमीन पर लेटकर) करके परिक्रमा की शुरुआत की। दानघाटी मंदिर से शुरू की हुई परिक्रमा में भीड़ इतनी थी कि यदि व्यक्ति दो कदम भी पीछे रह जाए तो उसका अपने साथ आए दोस्तों या परिजनों से बिछुडऩा अवश्यंभावी है। करीब दस मिनट के रास्ते के बाद एक जगह पर प्रभु की एक नाटिका का मंचन हो रहा था, ठेठ बृज भाषा में। करीब तीस मिनट तक इस मंचन को देखने में हम इतने तल्लीन हुए, जितना शायद मैं तो अब तक न किसी अंग्रेजीदा हॉलीवुड मूवी में हो पाया था और न ही किसी बॉलीवुड मूवी के मोहपाश में बंध पाया था, फिर सास-बहू के झगड़ों वाले डेलीसोप्स की तो बिसात ही क्या थी। प्रभु श्रीराम और उनके भक्त गोपाल के इस अभिनय को देखने के बाद आगे चले तो मुझे प्यास लगी। मुझे यह पहले ही बता देना चाहिए था कि परिक्रमा के बीच-बीच में रासलीला, श्रीमद्भागवत कथा वाचन और धर्मार्थ प्याऊ लगभग हर आधे किमी की दूरी पर दिखाई दे जाते हैं। मैं एक प्याऊ पर पहुंचा, नीरज को आवाज दी, मात्र २० सैकंड के वक्फे में ही विक्रम आगे निकल गया। अपने दोस्त के बिछुडऩे पर मन कुछ खट्टा हुआ और परिक्रमा का उत्साह भी ठंडा हुआ, लेकिन आगे बढ़ते रहे। विक्रम का मोबाइल काम नहीं कर रहा था, बाद में नेटवर्क मिलने पर करीब दो घंटे बाद हम फिर मिल गए। रास्ते में साक्षी गोपाल मंदिर, पूंछरी का लौठा, जतीपुरा आकर्षण का केन्द्र रहे, जहां पर भक्तों का इतना अच्छा उत्साह शायद ही मैंने पहले कभी देखा हो, इनमें सर्वाधिक संख्या करीब २०० वर्गकिमी में रहने वाले ग्रामीणों की थी।
ऐसा नहीं है कि शहरी लोगों की वहां उपस्थिति न हो, बल्कि करीब ३० प्रतिशत संख्या शहरी लोगों की थी, जिनमें करीब ५ प्रतिशत रिक्शा करके परिक्रमा कर रहे थे, लेकिन विक्रम के शब्दों में वे ग्लानि महसूस करते हुए परिक्रमा दे रहे थे, क्योंकि नंगे पैर करीब २१ किमी पैदल चल पाना उनके वश से बाहर की बात थी। करीब ८ किमी तक तो मैं आराम से चलता रहा, फिर सड़क की गिट्टियां पैरों में चुभने लगी थीं, नीरज भी यही शिकायत कर रहा था। परिक्रमा को दो हिस्सों में बांटा हुआ है, जिनमें चार कोस की परिक्रमा मैंने जैसे-तैसे पूरी कर ली थी। इसके बाद तीन कोस की अन्य परिक्रमा, जिसमें राधाकुंड, हरगोकुल जैसे स्थान आते हैं, मेरे लिए कुछ भारी पड़ गए थे। खैर, हम नंगे पैर चलते रहे और परिक्रमा भी लगभग पूरी होने को थी। रात्रि दस बजे शुरू हुई हमारी परिक्रमा सुबह ५.३० बजे पूरी हुई। हालांकि इस दौरान भक्तों का उत्साह गजब का था। राधे-राधे, श्याम मिलादे, गिरिराज महाराज की जय, बंशीवाले की जय जैसे नारे भी इस पूरी परिक्रमा में गूंजते रहे। मैं शायद कोई अंदाजा लगा पाऊं तो करीब ५० से ६० हजार या फिर एक लाख तक भी लोग रोजाना गोवर्धन परिक्रमा दे रहे थे। मानसी गंगा तक पहुंचते-पहुंचते हमारी हालत खस्ता हो गई थी और पैरों में एक कदम चलने लायक भी शक्ति नहीं बची थी। इसके तुरंत बाद हम धर्मशाला के अपने कमरे में सो गए तो करीब १२ बजे नींद खुली। हमारी प्लानिंग तो यह थी कि इसके बाद वृंदावन, गोकुल, बरसाना आदि क्षेत्रों में भी भ्रमण किया जाए, लेकिन पैर जवाब दे चुके थे और थकान भी इतनी थी कि आगे चलने की हिम्मत नहीं हुई।
वापसी में भरतपुर के लिए एक वैन किराए पर ली। नीरज को अपने मौसाजी के यहां नगर पहुंचना था, मैं और विक्रम भी अपने-अपने गांवों के लिए रवाना हुए। हम दोनों एक ही बस में बैठकर वापस पहुंच गए। पूरी यात्रा काफी अच्छी रही, हमारा उत्साह भी अच्छा था, प्रभु भक्ति की भावना और अटूट श्रद्धा हमारे साथ रही, लेकिन फिर भी बृजक्षेत्र की इस यात्रा को हम पूरा नहीं कर पाए हैं। मौका मिला तो शायद, फिर से अगले कुछ माह, या एक दो वर्ष में बृजक्षेत्र जाना चाहूंगा। अंत में, यही कहना चाहूंगा कि मैं श्रीकृष्ण और राधिका रानी का भक्त हो गया हूं और अपनी भावना को गौरवकृष्ण गोस्वामी के इन शब्दों में बयां करना चाहूंगा, क्योंकि मेरे शब्दकोश में इससे अच्छे शब्द मिलना मुश्किल है।
नाम महाधन है अपनों, नहीं दूसरी सम्पत्ति और कमानी
छोड़ अटारी अटा जग के, हमको कुटिया बृज में ही बनानी
टुक मिलें रसिकों के सदा और पीवन को यमुना जल पानी
हमें औरन की परवाह नहीं, अपनी ठकुरानी श्री राधिका रानी

Saturday, 30 January 2010

ये संस्कृति के पतन का साक्षी है

हर कोई खुद को अपने से अगली जमात में बिठाए जाने पर खुशी महसूस करता है, उसे ये खुशफहमी रहती है कि वो आगे की जमात में मौजूद लोगों के समकक्ष हो गया है और उसका वजूद भी कुछ हाई-फाई हो गया है। एक किताब लिखकर कोई कितना बड़ा लेखक या विद्वान हो सकता है, जवाब चाहिए तो सबसे पहले किसी भी शहर में होने वाले लिट्रेचर फेस्टिवल को आजमाएं। हालिया जयपुर में हुए पांच दिन लिट्रेचर फेस्टिवल में चार दिन जाने का मौका मिला, तो एक नई संस्कृति से रूबरू हुआ। साहित्य के इस उत्सव में ताजा जवां हुए कई लेखक इस बात से प्रफुल्लित थे कि वो अंग्रेजी उपन्यासकारों की गिनती में आ गए हैं और पूरा मीडिया उन्हें कवरेज दे रहा है। ये अंग्रेजी में लिखने वाले साहित्यकार भी अंग्रेजों के साथ बैठकर खुद को अगली जमात में गिनकर गर्व से सिर उठाए बोल रहे थे। मुझे हैरत तब हुई, जब एक लेखक महोदय, जिनका पहला उपन्यास अभी प्रकाशित ही हुआ है और बमुश्किल सौ प्रतियां बिकी होंगी, बड़े जोश के साथ 'कैसे बनें अच्छे आलोचकÓ पर व्याख्यान दे रहे थे। सुनने के लिए थे करीब दो दर्जन मीडियाकर्मी और पचासेक श्रोता। यूं हमारी मातृभाषा में कोई दर्जनभर से अधिक कृतियां लिख ले तो भी शायद ही उसे बोलने के लिए कोई मंच मिले। लेकिन अंग्रेजीदां के साहित्य महोत्सवों की बात ही कुछ और है।यूं तो यहां संस्कृति की बात करना ही बेमानी है, फिर भी आपको यहां लेखकों की मर्यादाएं देखनी हों तो दिखेंगे मंच पर शराब के पैग भरे लेखक, सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं के छल्ले उड़ाती नवलेखिकाएं और कवियित्रीयां और अगर किसी कवियित्री के हाथ में आपको बियर का गिलास दिखे तो भी ताज्जुब की बात नहीं। इन्हीं लेखकों और लेखिकाओं के पहनावे पर आपकी नजर जाए तो आपको समझ आएगा कि बॉलीवुड और हॉलीवुड के सारे नए फैशन स्टाइल यहीं से प्रेरित होकर तैयार होते हैं। पचास वर्ष की कोई लेखिका अद्धनग्न अवस्था में स्कर्ट पहने आपके साथ भोजन की प्लेट पकड़ी दिखे तो आप कहेंगे भला यह भी फैशन की कोई उम्र है, लेकिन सही मायनों में फैशन इसी उम्र में इनपर फबता है (जैसी कि इनकी खुद की सोच है।) साहित्य महोत्सव की शाम कुछ और भी सुहानी हो जाती है, जब एक अंग्रेजी महिला बियर काउंटर से बोतल पाने के लिए बैरे को शुद्ध हिन्दी में 'भैयाजी एक बियर दे दोÓ कहते नहीं थकती, एक साहित्यकार खुले दिल से अपने फिल्मी दोस्त के गाल को चूमते हैं और स्टेज के नीचे अद्धबेहोशी में एक अंग्रेजी महिला अपने वस्त्रों की सुध-बुध खो बैठती है।

Friday, 13 November 2009

ये प्रेम कहानी का सुखद अंत है

आज मैं जब सिनेमाहॉल पहुंचा तो हिसाब से मुझे इमरान खान और सोहा अली की तुम मिले मूवी देखनी चाहिए थी। लेकिन इस बार हालात कुछ जुदा थे। नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के भय और प्रलय के लम्बे-चौड़े पोस्टर देखकर मेरी पिछले तीन रोज से ही इच्छा हो रही थी कि इस बार बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड में किस्मत आजमाई जाए कि कितना मजा आता है। यूं मेरे लिए हॉलीवुड फिल्म देखना कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले तीन माह के अरसे में मैंने कोई हॉलीवुड फिल्म नहीं देखी थी या शायद कोई फिल्म ऐसी नहीं आई थी, जिसके सदके मैं सिनेमाहॉल में बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड फिल्म की अंग्रेजीदा टिकट खिड़की की ओर मुड़ता। फिर एक बात और, कि हालिया जब इमरान खान और शरमाती हुई सोहा अली होटल रामाडा में जयपुर के मीडिया से रूबरू हो रही थीं तो एक मौका हमें भी मिला और हमने भी उनकी एक झलक देख ली, इसलिए आधी उत्सुकता वहीं ढेर हो गई और इस बार हमने हिम्मत दिखाकर पलय-२०१२ का टिकट खरीद लिया। सहीं कहें जनाब, हिंसा के ढेर सारे सीन और धरती में उथल-पुथल की ये घटनाएं हमें सहज कम बनावटी अधिक दिखीं, दूसरे शब्दों में प्रलय का ये नजारा इमेजिनेशन की हदों को पार करने वाला था। वैसे हमारी हिन्दी फिल्मों में इस तरह के दृश्यों की कभी कल्पना भी नहीं की जाती और सैट पर इतना खर्चा करने की बात सुनकर शायद डायरेक्टर-प्रोड्यूसर फिल्म बनाने का इरादा ही मुल्तवी कर दें। इसलिए फिल्म को युवाओं के एक बड़े वर्ग ने सराहा और कहानी की रफ्तार की प्रशंसा की। मैं भी फिल्म में एक के बाद एक बदलते सीन्स और कॉमेडी को देखकर सुखद आश्चर्य महसूस कर रहा था। लेकिन फिर भी ये फिल्म मुझे इतनी अच्छी नहीं लगी, जितनी कि पिछले हफ्ते राजकुमार संतोषी की अजब प्रेम की गजब कहानी लगी थी। इस फिल्म को देखकर पहली नजर में ही कहा जा सकता है कि राजकुमार संतोषी की दर्शकों पर गहरी पकड़ है और वे यह भी जानते हैं कि फिल्म देखने के लिए मल्टीप्लेक्स में केवल ११वीं क्लास से लेकर यूजी फाइनल ईयर के स्टूडेंट ही जाते हैं, जिनके साथ यदि उनकी गर्लफ्रेंड होती है तो वे जरूर पिछली कतार में कोने की सीट कबाड़ते हैं और ऐसे मनचले किशोर युवाओं की संख्या अब कमतर विकसित शहरों में भी बढ़ रही है। निर्जीव पात्र के जरिए पत्रकार को सुनाते हुए कहानी की शुरुआत ही ऐसे हसोड़ सीन से होती है, जहां पांच युवाओं के हैप्पी क्लब का प्रेसिडेंट बिना ब्रेक वाली साइकिल पर सवार है। जो कि एक डाकू को पकड़वाने में सहायक बनता है। प्रेसिडेंट के इस किरदार को रणबीर कपूर ने बड़ी शिद्दत से निभाया है और यह सीधे युवाओं के दिल में उतरता है। कैटरीना कैफ की एंट्री बिल्कुल नेगेटिव तरीके से होती है, जो हैप्पी क्लब के नेक कार्य करने के इरादों से इस कदर प्रभावित होती है कि रणबीर से दोस्ती करना मंजूर कर लेती है। एकतरफा प्यार में डूबे रणबीर के लिए यह बात जन्नत की एक झलक पा लेने से कम नहीं होती। ख्वाबों में डूबा वह हर वो काम करने की कोशिश करता है जो कैटरीना पसंद करे। लिहाजा एक महीने तक शेफ की नौकरी करने पर भी उसे गुरेज नहीं होता। कहानी में ट्विस्ट तब पैदा होता है जब कैटरीना बगैर कुछ बताए गोवा निकल जाती है। यहां सड़क पर पैदा हुई अनाथ कैटरीना को उसके पालने वाले माता-पिता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए एक अमीर गोवानी के हवाले कर देना चाहते हैं जो उसे अपने साथ शादी नहीं करने पर उसके साथ जबरजिना करने के अपने धृष्ट और घृणित इरादे भी जता देता है। प्यार में नो डिमांड नो कम्प्लेंट का उसूल रखने वाले रणबीर और उसकी मित्र मंडली के सखा ऐन वक्त पर कैटरीना को वहां से सुरक्षित निकाल लाते हैं। एक प्यार करने वाले असली प्रेमी और दोस्त की असली परख यहीं होती है कि वह सबकुछ जानते-बूझते कि कैटरीना उससे प्यार नहीं करती, बल्कि पहले से ही किसी और को चाहती है, फिर भी रिस्क लेकर अपने घर में रखता है। कई रोचक मोड़ पार करने के बाद आखिर में कैटरीना को रणबीर के प्रति अपने प्यार का अहसास होता है।एक अहम बात मैं कहना चाहूंगा कि कैटरीना से एकतरफा प्यार करने वाले रणबीर ने एकबार भी अपनी ओर से प्यार का इजहार ही नहीं किया या फिर हिम्मत ही नहीं हुई। कुछ भी कहेंं, लेकिन एकतरफा प्यार ने आखिर रंग दिखाया और ऐन शादी के मौके पर कैटरीना ने अपने प्रेमी का दामन छोड़ रणबीर को अपना जीवनसाथी कबूल किया। शायद ये असली प्यार का ही असर है। मैं फिल्म की गजब कहानी, हल्के एक्शन, अच्छी कॉमेडी, बेहतर म्यूजिक के बदले इसे पांच में से साढ़े तीन स्टार देना पसंद करूंगा।

Monday, 2 November 2009

कामयाबी का लंदन प्रेम

मैं इस फिल्म को लेकर लम्बे अरसे से उत्सुकता से घिरा हुआ था। हम दिल दे चुके सनम, जिसमें अजय देवगन और सलमान एक साथ आए थे, मुझे बहुत पसंद आई थी। इसलिए इन दोनों अभिनेताओं को एक साथ देखने की लालसा थी और फिर उड़ते-उड़ते यह बात भी कानों में पड़ी थी कि कहानी का प्लॉट बहुत अच्छा है। शुक्रवार को मेरे अवकाश के रोज मुझे ऐनवक्त पर तब ऑफिस बुला लिया गया, जब मैं इस फिल्म का फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने जा रहा था, खिन्नता हुई, लेकिन ऑफिस आना भी आवश्यक था। शुक्रवार का अवकाश मैंने शनिवार को लिया और फिर इस फिल्म को देखने पहुंचा। हर किसी के कहानी कहने का तरीका अलग होता है। विपुल शाह अपनी शैली में पहले हास्य का रंग डालते हैं और फिर कहानी की कसावट के सहारे इसे भावुक बना देते हैं। नमस्ते लंदन के बाद अब लंदन ड्रीम्स इनकी हालिया फिल्म है। शुरुआत में ही बता दें, फिल्म को बहुत अच्छे तरीके से गढ़ा गया है, कहानी यूनिक न हो, लेकिन एक आम भारतीय को पसंद आने वाली है। फिर अजय देवगन का नैसर्गिक गंभीर रोल और सलमान का मस्तमौला अभिनय देखने के आदी दर्शकों को यहां अभिनय की नई ऊंचाईयां देखने को मिलेंगी। फिल्म का संगीत इसे दर्शकों के लिए एक बेहतर फिल्म बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।कहानी अजय देवगन के सपने को लेकर शुरू होती है जो उसने पंजाब के एक छोटे से गांव में देखा था। इस फिल्म को देखकर मुझे एक बात फिर से याद आ गई अधजल गगरी छलकत जाए। भरे हुए मटके में से पानी कभी उछलता नहीं है। इसलिए जो वास्तव में प्रतिभाशाली होते हैं, वे अपने बारे में डींग नहीं हांकते। अजय देवगन, पिता की मृत्यु के बाद अपने गांव के एक चाचा के साथ लंदन आ जाते हैं, मजेदार बात ये भी है कि बचपन से म्यूजिक सीखते हुए वो लंदन की गलियों में जवान हो जाते हैं और जो लंदन पुलिस उन्हें केवल कुछ मिनट फुटपाथ पर गाने की एवज में जेल में डाल देती है, इतने साल तक इल्लिगल रूप से बगैर वीजा के रहने पर एक नोटिस तक जारी नहीं करती। गांव से ही अजय का एक दोस्त है सलमान खान, जो उन्हीं गलियों में रहते हुए अलमस्त नौजवान के रूप में अपने कस्बेवालों को परेशान किए हुए है। फिल्म का ये हिस्सा दर्शकों को पर्याप्त रूप से हंसाने में कामयाब रहा है।एक दोस्त के लिए तो कम से कम ऐसा नहीं होता, लेकिन ईष्र्या की धधकती आग में अजय देवगन अपने उस दोस्त को, जिसने कभी गांव की गलियों में उसके सपने के जज्बे को देखकर अपने बचाए कुछ पैसों से एक बांसुरी खरीदकर उसे भेंट की थी, कई तरह के ड्रग्स, जिनके नाम गिनना भी मुहाल है, सलमान क बॉडी में पहुंचा देता है। सलमान अपने दोस्त की इस दगाबाजी से अनजान है और वह अभी भी अजय को अपने दोस्त से बढ़कर भगवान मानता है। कहानी यहां तक पहुंचती है कि अपने अंतिम शो, जो वेंबली स्टेडियम में हो रहा था, अजय देवगन सलमान के प्रति दर्शकों के प्यार को बर्दाश्त नहीं कर पाता और सच्चाई अपने आप सामने आ जाती है। सलमान का सुखद अभिनय जितना काबिलेतारीफ है, उससे कहीं अधिक प्रशंसा अजय देवगन के अभिनय की की जानी चाहिए। असिन अपने चुलबुले रंग में दर्शकों के सामने हैं और अपनी दूसरी हिन्दी फिल्म में ही बेहतर ढंग से अपनी भूमिका निभाने में सफल रही हैं। यह फिल्म उनके कॅरियर को नई ऊंचाईयां देने में सहायक होगी। वक्त, नमस्ते लंदन के बाद लंदन ड्रीम्स भी कामयाब रहेगी, ऐसी आशा की जा सकती है। फिल्मांकन और संगीत की दृष्टि से भी फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार दिए जा सकते हैं।

Tuesday, 20 October 2009

मेरे गांव की दिवाली

पता नहीं क्यों, इस बार दिवाली पर घर जाने को लेकर मैं इतना उत्सुक नहीं था। आज से आठ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर आया था, दिवाली को लेकर बड़ा उल्लास रहता था और पन्द्रह दिन पहले से ही मंसूबे बनाने लगता था कि दिवाली पर क्या धमाल करना था। इस बार तो धनतेरस भी जयपुर में ही मना ली थी और लग ही नहीं रहा था कि गांव भी जाना है। गांव यात्रा और दीपावली के बाद वापस लौटने का अनुभव कुछ हद तक यादगार रहा, फिर भी एक कसक सी मन में रह गई है। घर जाने का प्लान ये बना कि मैं और अमित, दोनों एक साथ बाइक से ही घर चलें। रूप चतुर्दशी के रोज अलसुबह हम दोनों उठ गए थे और पौने छह बजे निकलने के लिए तैयार थे। जैसे ही दरवाजे से बाहर झांककर देखा तो पता चला कि इन्द्र देवता खासे महरबान हो गए हैं और आज शायद ही हमें निकले दें। खैर, सवा सात बजे वज्रधारी ने कुछ राहत दी और हम मौका देख झट से खिसक लिए। खिसकाव ज्यादा नहीं हुआ था और कानोता से कोई दो फर्लांग ही जा पाए थे कि फिर देवेन्द्र ने हमें दबोच लिया कि बच्चू आज इतनी आसानी से थोड़े न निकलने देंगे। बारिश का ये आलम अभी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, करीब पौने घंटे हम एक पेट्रोल पम्प की छत के नीचे टिके रहे। इस डर से कि कहीं पम्प मालिक इतनी देर ठहरने का कोई चार्ज न लगा दे, मैंने बाइक में २०० रुपए का पेट्रोल डलवा लिया। सूरज की एक हल्की सी किरण शायद कहीं से निकल आई थी, जिससे हम दोनों को उम्मीद बंधी कि आगे शायद मौसम इतना बेमिजाज नहीं है और हम आगे बढ़ सकते हैं। बाइक पर सवार होकर हम निकले, बमुश्किल साढ़े तीन किलोमीटर चले होंगे कि बारिश की बूंदों का वजन दोगुना हो गया और सिर पर टपकती ये बूंदें भी ओले के समान ही पड़ रही थीं। आगे एक उजाड़ सा पेड़ देख मैंने अमित से बाइक रोकने की बात कही, लेकिन अमित भी शायद आज इन्द्रदेव से पंगा लेने के मूड़ में था, उसने रफ्तार जारी रखी लेकिन हम कोई बंशीधर की तरह १६ कलाओं से अवतार लेने वाले भगवान विष्णु के अंश थोड़े ही हैं, जो मेघदेव के मुकाबले में गोवर्धन पर्वत को उठा लेते। बारिश की बूंदों से बेबस हो हमें आगे एक झोंपड़ी में शरण लेनी पड़ी। यहां बीसेक मिनट के वक्फे के बाद संभावना लग रही थी कि अब दौसा तक शायद ही कोई रुकावट आए। लेकिन मेघ देवता कुछ और ही सोचे हुए थे, बस्सी से पांच किलोमीटर पहले ही हमें फिर रोक लिया और इस बार ये ठहराव कोई एक घंटे तक चला। ऑफिस और घर-गांव की बातें करते हुए हम यहां ठहरे रहे। दूसरी चाय के बीच में अमित बोला, गुरुजी इस यात्रा को तो हम ब्लॉग पर लिखेंगे। मैंने कहा हां, यार अब तक की घटनाओं ने एक अच्छे संस्मरण का प्लॉट स्थापित कर दिया है। आगे भी यात्रा अच्छी रही तो दिवाली की इस यात्रा को आफिस पहुंचते ही जरूर लिखूंगा। तीसरी चाय समाप्त हो गई थी, पर धूजणी बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। बारिश के बहाव का सामना करते हुए बाइक चलाने के कारण अमित की हालत अधिक खस्ता थी। पास में ही सिगरेट की दुकान भी थी, अंतिम नवरात्र की शाम से पहले ऐसी स्थिति होती तो मैं चाय की चुस्कियों के साथ सिगरेट के कश भी लगा लेता, लेकिन इस बार मेरे हाथ रुक गए थे। अंतिम नवरात्र को मैंने एक प्रण लिया था और आखिरकार मैंने सिगरेट नहीं पी। इस बार सूरज ने शायद बादलों की ओट से निकलने में कुछ हद तक कामयाबी हासिल कर ली थी, इसलिए हम दोनों फिर से अपनी राह पर चल दिए थे। अमित को बाइक पर सवार होने का मौका क्या मिला, उसने बाइक को शायद स्कॉर्पियो समझ लिया था और बाइक की रेस एक साथ चालीस से बढ़कर पिचानवें तक पहुंच गई थी। मैंने कहा, भैया, ये बाइक है, हवा के झोंके हम दोनों को उड़ा देंगे, बोला गुरुजी आप पकड़कर बैठे रहो, क्योंकि अगले रुकाव तक मैं मेहंदीपुर बालाजी पहुंच जाना चाहता हूं। मैंने कहा, बालाजी की दूरी यहां से ७५ किलोमीटर है, बोला, अभी पचास मिनट में पहुंचते हैं। जनाब मैं तो नौसिखिया ड्राइवर हूं, लेकिन अमित की ड्राइवरी इस बार चरम पर रही। मुझे लगा हालिया बने चार लेन के इस हाइवे का पहला लुत्फ अमित ही उठाने जा रहा है। बाइक की स्पीड का सही अहसास तब हुआ जब एक तेजरफ्तार दौड़ती राजस्थान रोडवेज बस को पीछे छोड़ दिया, एक हुंडई सैंट्रो को ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया और अपनी प्रेमिका के साथ पल्सर पर सवार एक कॉलेज युवक को एक साथ क्रॉस कर तेजी से पीछे छोड़ दिया। अमित की बालाजी पहुंचने की तमन्ना फिर से अधूरी रह गई और इन्द्रदेव ने इस बार हमें दौसा पार करते ही रोक लिया। मैंने तेज सांस ली और हम एक मिष्ठान भंडार में प्याज कचौरी खाने में तल्लीन हो गए। बाहर बारिश हो रही थी और बातचीत का माध्यम फिर से गांव की गलियों और शहर की स्ट्रीट्स के बीच में भटकने लगा। अभी घर पहुंच भी नहीं पाया था कि रास्ते में गांव के दो भाई मिल गए। उन्होंने मेरे पत्रकार होने और अपनी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर विस्तार से चर्चा की। सफर की थकान के बावजूद आधे घंटे तक यह ज्ञानचर्चा होती रही। दोपहर डेढ बजे मैं घर पहुंच गया। पता नहीं कैसे, लेकिन ऐसा हर बार होता था, मैं जब भी गांव जाता था, मेरे छह साल के भतीजे को अपने आप इत्तिला मिल जाती थी कि मैं घर आ रहा हूं और वो आधे रास्ते में ही मुझे पकड़ लेता कि चाचू मेरे लिए क्या लाए हो। इस बार भी उसने रास्ते में ही मुझे घेर लिया और अपनी रिश्वत मांगनी शुरू कर दी। मैंने बैग में से ड्राई फ्रूट्स का पैकेट निकाला और उसे पकड़ाकर अपनी जान छुड़ाई। घर पहुंचा तो मम्मी ने कई जगह से छूकर नब्ज चैक की कि कहीं मैं रास्ते में दुबला तो नहीं हो गया हूं और ढंग से खाना खाता हूं या नहीं। मम्मी ने फिर भी कह ही दिया कि दो महीने में ही कितना दुबला हो गया है, जबकि पिताजी की राय में जन्माष्टमी पर मेरे पिछले गांव के दौरे से दिवाली की अवधि में मेरा वजन घटने की बजाय कुछ बढ़ गया था। दिवाली वाले रोज सुबह से ही घर पर माहौल बड़ा उल्लासजनक था। मेरी साढ़े तीन साल की भतीजी के क्रेकर कलेक्शन में कई तरह की रंगीन फुलझड़ी और लाल पटाखे थे, जिन्हें वो बड़े चाव से मुझे दिखा रही थी। भतीजा इस बात की शिकायत कर रहा था कि उसके कुल १२ रॉकेट में से एक किसने चुरा लिया था। गांव का माहौल भी सदाबहार नजर आ रहा था। आज काम की चिंता कम ही लोगों को थी, लेकिन फिर भी सरसों की बुआई और गेहूं की फसल के लिए सिंचाई की मशक्कत जारी थी। मेरे पिताजी धार्मिक प्रवृत्ति के हैं और उन्होंने सुबह ही कह दिया था कि वे आज श्रीमद्भागवत कथा सुनने के लिए पड़ौस के गांव में जाएंगे। मेरे बड़े भैया उन्हें सुबह ग्यारह बजे पांच किमी दूर उस दूसरे गांव में छोडऩे चले गए थे। हालांकि मम्मी को यह नहीं सुहा रहा था कि वे त्योहार के रोज भी कथा सुनने जाते, लेकिन पिताजी कहां मानने वाले थे। भैया उन्हें दोपहर में कथा में छोड़कर आ गए। दिन में मैं अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला और स्कूल की पढ़ाई से लेकर अब तक की उन्नति की यादें ताजा हुईं। वही हुआ जिसका डर था, पिताजी को लेकर बड़े भैया कथा सुनकर शाम को छह बजे घर लौटे और मम्मी को गुस्सा आ गया कि वे त्योहार के रोज भी देर तक दूसरे गांव में कथा सुनते रहे थे। मेरी मम्मी हर चीज को व्यवस्थित ढंग से पूरा करना चाहती हैं, उन्हें समय पर हर कार्य पूरा चाहिए, इसलिए जब पिताजी देर से लौटे तो इस बात पर दस मिनट तक बहस होती रही कि दिन ढले गांव के मंदिर में अब तक भोग लगा दिया जाना चाहिए था, जो पिताजी की कथा की वजह से लेट हो गया था। बाद में बड़े भैया मंदिर गए और उन्होंने वहां प्रसाद का भोग लगाया। मैंने रोशनी के लिए घर पर मोमबत्तियां जलाईं और भाभी ने घर में घी के दीपक जलाए। अब फुलझड़ी-पटाखे फोडऩे की बारी मेरे भतीजे-भतीजी की थी, जो सुबह से ही इस बात की प्लानिंग कर रहे थे कि किसको कितने पटाखे चलाने हैं। इससे एक घंटे पहले मैंने अपने कुछ दोस्तों को दिवाली के मैसेज किए और अपने कुछ खास परिचित और मित्रों को फोन करके दीपावली की बधाई दी। मेरा मानना है कि मैसेज एक फॉर्मलिटी होती है, लेकिन जिन्हें आप अपना अच्छा मित्र या नजदीकी समझते हैं, उन्हें हमेशा फोन पर बातचीत करनी चाहिए। इसलिए शाम को ठीक पांच बजे जब मैंने अपनी एक फ्रेंड को, जो कहती हैं कि अभी हम फ्रेंड बन पाए हैं या नहीं, इस बारे में निर्णय होना बाकी है, को फोन किया, उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। मैंने सोचा शायद कहीं व्यस्त होंगीं। फोन के रिप्लाई की कुछ मिनटों की प्रतीक्षा घंटों में तब्दील हुई, आखिर मैंने अपनी ओर से पहल करते हुए शाम को सवा आठ बजे उन्हें लक्ष्मी-गणेश का शुभ दीपावली लिखा एक मल्टीमीडिया मैसेज भेज दिया। इस मैसेज के जवाब की प्रतीक्षा में मेरी रात कट गई, हालांकि इन्हीं फ्रेंड का दावा है कि आपके एक नजदीकी का इग्नोरेंस आपको उससे कहीं अधिक दुख देता है, जितना कि उसके द्वारा कहे हुए सौ कठोर शब्द। इन कठोर शब्दों को उन्होंने अपनी भाषा में रूड वड्र्स कहा है। सुबह हुई और इस बार फिर मेरे भतीजे और भतीजी में ठन गई थी। मेरे बड़े भैया खेतों की जुताई पर जाने वाले थे और भतीजे की जिद थी कि वो ट्रैक्टर की सवारी करेगा और हमारे खेत वो खुद ही जोतेगा। मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं छह साल की उम्र का था तो ट्रैक्टर को देखते ही डर जाता था कि पता नहीं कब कुचल देगा और उसी उम्र में मेरा भतीजा ट्रैक्टर की सवारी गांठने की कह रहा था, यह समय में बदलाव का सूचक है। भतीजी की जिद भी ट्रैक्टर में बैठकर खेतों में घूमने की थी। आखिर मामला इस बात पर तय हुआ कि दोनों बच्चों को दो-दो रुपए दे दिए जाएं। भतीजे को रिश्वत की आदत अधिक थी, इसलिए वो पांच रुपए लेकर राजी हुआ। आज का दिन गोवर्धन पूजा का दिन था, इसलिए दोपहर से ही मम्मी और भाभी चार भैंसों के गोबर को लेकर उसे एक पर्वतरूपी मनुष्य का आकार देने में लग गई थीं। साथ में श्रीकृष्ण भगवान और उनके साथी ग्वालों को भी आकार दिया गया, माध्यम था गोबर। शाम हो गई थी और अभी तक मुझे अपनी ऑफिस के कुलीग्स के बहुत कम दिवाली संदेश प्राप्त हुए थे। जबकि मेरे विचार से मैं सभी लोगों को मैसेज या फोन करके बधाई दे चुका था, लेकिन जवाबों की प्रतीक्षा अब तक थी। शाम छह बजे इस बारे में मेरी ऑफिस में मेरी मुंहबोली बहन से बात हुई, उसने कहा कि भैया, कई बार ऐसा हो जाता है। लेकिन मैं इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। क्यों हम कुलीग्स के पास भी एक-दूसरे को विश करने लायक टाइम नहीं था। घर पर बड़े भैया, भाभी, मम्मी, बुआ, पिताजी, बड़ी बहन और बच्चों ने हंसी-खुशी से गोवर्धन पूजा की, मैं भी पूजा में शामिल हुआ, पर उतना प्रसन्न नहीं था।मैं दिवाली मनाकर लौट आया हूं, रास्ते में बहुत सी ऐसी बातें हुईं, जिन्हें शब्दों में लिख पाना कठिन है। इस बार की दिवाली बहुत अच्छी रही, मैंने अच्छे से मनाई, पर फिर भी कुछ कसक सी बाकी रह गई। अफसोस, मेरी दूरियां भगवान श्रीराम के प्रयासों के बावजूद फना नहीं हो सकीं।

Thursday, 15 October 2009

आगमन

चौ. कोऊ कहे आए दशरथनंदन, विप्रजनों ने प्रवचन दीन्हे।
जिन के अकुलाहट है भारी, तीन घड़ी तक कुछ नहीं कीन्हे।।
चौ. नगर द्वार आए जन-जन प्रभु राह तके और कछु नहीं दीखे।
सब ही बने गुरु इक-दूजे, अब आएंगे राम और सीते।।
चौ. दूर देखि उड़ती पग धूलि, मात् संग आए शत्रुघ्न।
भ्रात भरत की गति नहीं उज्ज्वल, बिसरे सब मात्-बांधवजन।।
चौ. नयन भरे जल, दरसन इच्छुक, प्रभु कैसे हों दरस तुम्हारे।
मो सम कौंन कृतघ्न दुनिया में, मोसे अच्छे लखन प्यारे।।
चौ. मंद गति, दीपक से उज्ज्वल, लखन संग आए त्रिपुरारी।
पीछे सीता और कपीश्वर, अवधजनों की भीड़ है भारी।।
चौ. चंचल नयन, गात कोमल और सिर पर जटा-जूट है भारी।
चौदह बरस बाद अवधीश्वर, झलक देख हर्षे नर-नारी।।
चौ. ज्यों पहुंचे प्रभु नगर द्वार पे, आशीर्वचन दियो कैकेई मां।
गुरू वशिष्ठ ने वचन सुनाए, सबसे गले मिले प्रभु कर्मा।।
सो. सब प्रसन्न नर-नारि, हर्षित मन दीपक जले।
अवध भाग गए जाग, भ्रात प्रेम की ये कथा।।

यदि आप उपरोक्त चौपाई और सोरठा का सारांश समझ गए हैं तो नीचे लिखी पंक्तियों पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, ये चौपाईयां रामायण या किसी अन्य धर्मग्रन्थ से नहीं ली गई हैं। इन चौपाईयों का लेखन मैंने अपनी अल्पबुद्धि से किया है। यदि किसी बंधुजन को कुछ गलत लगे और सुझाव देना चाहें तो स्वागत है।

अनुवाद: अयोध्या में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि के बाद वापस लौटने की खबर है। इससे लोग प्रसन्न हैं और अकुलाए हुए हैं। कई लोग तो अपना घरेलू कार्य छोड़े तीन प्रहर से प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ब्राह्मण जन लोगों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। सारे नगरवासी द्वार पर इकट्ठे हो गए हैं लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। प्रभु श्रीराम के आगमन के बारे में अटकलें लगाते हुए सब एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं और समझा रहे हैं कि प्रभु श्रीराम सीता और लक्ष्मण समेत जल्द ही यहां आएंगे। पैरों से उडऩे वाली रेत को देखकर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न तीनों माताओं को लेकर नगर द्वार पर पहुंचे। लेकिन भ्राता भरत की स्थिति अच्छी नहीं है। वे अभी भी श्रीराम के वनवास जाने के लिए खुद को उत्तरदायी मान रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें ध्यान ही नहीं है कि उनके आस-पास कौंन खड़ा है, वे केवल बड़े भाई राम के आगमन की राह तक रहे हैं। उनके नयनों में जल भरा हुआ है और उदास से खड़े भरत की प्रबल इच्छा है कि उन्हें जल्द से जल्द भगवान श्रीराम के दर्शन हो जाएं। वे मन में विचार कर रहे हैं कि मेरे समान कृतघ्न इस दुनिया में कौंन है। मुझसे अच्छा तो छोटा भाई लक्ष्मण है, जिसे चौदह वर्ष तक भैया की सेवा का मौका मिला है।इसी समय धीमे-धीमे चलते हुए प्रभु श्रीराम, जिनके चेहरे की आभा चारों ओर दीपक की रोशनी के समान फैली हुई है। लक्ष्मण और सीता समेत नगर द्वार पर पहुंचे। उनके पीछे ही वानर राजा सुग्रीव, हनुमान और बहुत सारे नगरवासी हो लिए हैं।चंचल नयनों वाले प्रभु श्रीराम जिनकी त्वचा अत्यन्त कोमल है, लेकिन सिर पर उनके अभी भी जटाएं लिपटी हुई हैं। लेकिन अयोध्यापति श्रीराम की चौदह वर्ष बाद झलक देखकर अयोध्या का हर नर-नारी प्रसन्न है और प्रभु श्रीराम की जय-जयकार कर रहा है।प्रभु श्रीराम जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे, सबसे पहले उन्होंने माता कैकेई के चरण छुए और उन्होंने श्रीराम को आर्शीवाद दिया। गुरू वशिष्ठ का आर्शीवाद लेकर प्रभु श्रीराम ने बहुत सारे नगरवासियों को भी गले लगाया।प्रसन्न मनों से अपने घर लौट रहे नगरवासियों ने घर-घर में दीपक जलाए, जिससे पूरी अयोध्या रोशन हो गई। दूसरी ओर भगवान श्रीराम और भरत के देर तक हुए मिलाप ने दो भाईयों के प्रेम की कथा कही, जिसे देखकर लगा कि अब सही मायनों में अयोध्या का भाग्योदय हुआ है।

Tuesday, 6 October 2009

धवन साहब आप बोर नहीं होते ?

वे फिल्म बनाए चले जा रहे हैं और हमारी मजबूरी यह है कि हम फिल्म नहीं देखें तो टाइम कैसे पास हो। दिवाली की छुट्टियां होने ही वाली हैं ऐसे में सिनेमाघरों में लम्बे समय बाद डेविड धवन की फिल्म लगी है डू नॉट डिस्टर्ब। फिल्म लग ही गई है, तो देखना भी बनता है, नहीं तो मीमांसा कैसे करेंगे। इस दशक के बीच में जब तक गोविन्दा और धवन साहब के बीच सुलह नहीं हुई थी और झगड़ा कांटे की टक्कर का था, तो दर्शक बड़े फायदे में रहे। प्रियदर्शन साहब ने डू नॉट डिस्टर्ब देख रहे मेरी बगल वाली सीट पर बैठे भाई साहब की तरह किसी को बड़ी वल्गर फिल्म है,कहने का मौका नहीं दिया। और दूसरे उनकी फिल्में सार्थक और सहज हास्य की कॉमेडी फिल्मों के लिए हमेशा याद की जाएंगी। बात चाहे हेराफेरी, चुप चुपके, हंगामा जैसी शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों की हो या ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी मालामाल वीकली और हलचल जैसी फिल्मों की। हर जगह प्रियन साहब ने अपनी छाप छोड़ी और एक अपने धवन साहब हैं, जो द्विअर्थी और बेतुके संवाद एवं भद्दे दृश्यों के जरिए फिल्म को हिट कराना चाहते हैं। राजपाल यादव और रणवीर शौरी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों को केवल चुनिंदा दृश्यों तक सीमित कर दिया गया है। एक अमीर बिगड़ैल के किरदार में आए गोविन्दा अपनी पत्नी से खुश नहीं हैं और एक हाई-फाई मॉडल का हाथ थामना चाहते हैं। पत्नी के किरदार में सुष्मिता भी डेढ सयानी हैं और वे पहले ही अपने पति की जलील हरकतों को जानने के लिए अपने दोस्त डिटेक्टिव को लगा चुकी हैं। फिल्म के दृश्यों को देखकर लगता है, जैसे जबरदस्ती रबड़ की मांनिद खींचा जा रहा हो। त्रिकोण में फंसते हैं रितेश देखमुख, जो अमीर गोविन्दा की गलतियों को छुपाने के एवज में अपनी सातवीं पीढ़ी तक के खानपान का इंतजाम कर लेना चाहते हैं। आधारहीन विषय को लेकर लिखी गई कहानी, अपने सही बहाव में नहीं है। ढाई घंटे अवधि की फिल्म में दर्शक की नजरें सही मायनों में पर्दे की तरफ उन्हीं दृश्यों में जाकर टिकती हैं, जब स्क्रीन पर सोहेल खान दिखाई देता है। सोहेल का कुछ मिनटों का आक्रामक रूप अच्छा बन पड़ा है। अभिनय के लिहाज से भी उन्होंने बेहतर प्रयास किया है। सुष्मिता सेन को पत्नी का किरदार थमाकर उनके साथ न्याय किया गया है, अब वे एक्ट्रेस के रोल में जमती भी नहीं हैं। हाई-फाई मॉडल की आयुसीमा से अब लारा दत्ता का पत्ता कट चुका है, इस तरह के रोल में अब बिपासा ही अच्छी लगती हैं, पूरी फिल्म में उनके चेहरे के भावों को देखकर लगता भी नहीं, कि किसी पाठशाला से उन्होंने एक्टिंग के किसी अक्षर की पढ़ाई भी की है। रितेश देशमुख और राजपाल यादव के काम को अच्छा कहा जा सकता है। रणवीर शौरी थिएटर के मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन उन्हें सही रोल नहीं मिल पाया है। फिल्म के गीत-संगीत का पक्ष भी कमजोर ही रहा है। पूरी फिल्म में केवल एक गीत कुछ मिनटों के लिए आपको सही लग सकता है। बेबो नाम का यह गीत भी युवाओं में चचंल किस्म की कुछ विदेशी सोच वाली संतानों को पसंद आ सकता है। फिल्म की शूटिंग की बैकग्राउंड देखकर लगता नहीं कि धवन साहब ने अधिक खर्चा किया होगा। फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ भी नहीं है। मुझे इजाजत मिले और पांच स्टार में से धवन साहब की इस नई फिल्म को अंक देने को कहा जाए तो डेढ से अधिक स्टार देने की हिमाकत नहीं कर सकता। क्योंकि ढाई घंटे की फिल्म में मैंने भी अपना टाइम परदा निहारने में कम अपने मोबाइल पर मैसेजिंग में अधिक बिताया था। इसलिए जिन बंधु-बांधवों ने फिल्म नहीं देखी है, वे अपना टाइम और पैसा बिल्कुल भी खर्च न करें।