आज लम्बे अरसे बाद एक बार फिर से ब्लॉग की याद आई है और हालिया यात्रा भी कुछ ऐसी रही है कि वृतांत को डिजिटल कागज पर उतारने की प्रबल इच्छा हो रही है।
वाकया कुछ यूं हुआ कि अभी जब मैं बोरियतभरे अंदाज में एक बेमजा जिम्मेदारी की तरह अपनी एमजेएमसी फाइनल की परीक्षाएं दे रहा था तो उदयपुर से मेरे दोस्त नीरज अग्रवाल का फोन आया कि यार क्यों न गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए चला जाए। मैं बृजक्षेत्र का निवासी होते हुए भी अभी तक गोवर्धन की परिक्रमा केवल एक बार कर पाया हूं। इसलिए इस बार दिल किया तो परिक्रमा की प्लानिंग बना ली। इस यात्रा में मेरे एक और मित्र शरीक हुए विक्रम सिंह, जिनकी हालिया फोन पर बनी गर्लफ्रेंड, जो कोटा में रहती थी और जिसे वे केवल फोन पर चार महीने की बातचीत में इतनी गहराई तक चाहने लगे थे कि बात शादी तक पहुंचने की नौबत आ गई थी, से मिलाने के लिए मैं कोटा तक साथ गया था। कोटा में दो प्यार करने वाले लोगों को मिलाकर मुझे खुशी हुई थी, शायद इसका एक कारण यह भी रहा हो कि मुझे भी कभी किसी से प्यार हुआ था, है भी, लेकिन व्यक्त करने की हिम्मत अभी तक नहीं जुटा पा रहा हूं। मैं सोचता हूं कि प्यार तो बस समझने की चीज होती है, जो मैं शायद उसे समझा नहीं पा रहा। बॉस ने कोटा के लिए बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी दी थी और अब फिर से छुट्टी के नाम पर वे खासे नाराज हो गए।
खैर, शाम ४ बजे मैं और नीरज, जो उदयपुर से सुबह सवेरे जयपुर पहुंच गया था और प्रोग्राम बनने पर हम दोनों सुबह ९.३० के शो में उसी दिन रिलीज हुई हॉलीवुड मूवी आयरनमैन-२ भी देखने चले गए थे, गांधीनगर रेलवे स्टेशन पहुंचे, क्योंकि गुर्जरों की मर्जी के आगे बसें तो चल पाने में बेबस थीं। स्टेशन पर टिकट खिड़की पर करीब पचासेक लोगों की लम्बी कतार देखकर पसीने छूट गए। नीरज शुरू से ही जुगाड़ू प्रवृत्ति का रहा है और वह टिकट के जुगाड़ में था, लेकिन भीड़ के आगे वह बेबस रहा, तो टिकट लेने का बीड़ा मैंने उठाया। स्टेशन अधीक्षक से मिलकर अंदर की खिड़की से टिकट जुगाड़ किए। ट्रेन आई और नीरज की हड़बड़ी में जनरल का टिकट होते हुए भी हम स्लीपर क्लास में घुस गए। कोई आठ-दस मिनट में ही टीटीई महोदय ने टिकट देखा और जनरल में जाने की हिदायत दे डाली। जनरल डिब्बे की भीड़ को हम ट्रेन में चढऩे से पहले देख चुके थे, इसलिए हिम्मत न हुई कि स्लीपर को छोड़ पाते। आखिर स्लीपर के मोहपाश में बंधकर मैंने जेब से टीटीई साहब को ३०५ रुपए देकर जान छुड़ाई।
नीचे की बर्थ पर एक सुंदर लड़की भी सवार थी, मैं और नीरज विश्वामित्र के खानदान से तो हैं नहीं, लेकिन मैं थोड़ा शर्मीला हूं और नीरज चालू पुर्जा, इसलिए वह शुरू हो गया था। मेरी एक सप्ताह पहले की कोटा यात्रा में भी ऐसा ही हुआ था कि मैं और विक्रम केवल बैठ सकने वाले डिब्बे में सवार थे, डिब्बा कमोबेश ३० प्रतिशत खाली था, इसलिए सामने की सीट पर केवल एक लड़की सवार थी, विक्रम का कहना था कि उस सुंदर लड़की को उसने पहले भी यूनिवर्सिटी में देखा था, जबकि मेरी नजर में ऐसी कोई वाकफियत नहीं थी। अब दुर्गापुरा रेलवे स्टेशन से सवार हुए तो दोपहर थी, हमें पानी बोतल खरीदना याद न रहा और रास्ते में कोई पानी बोतल बेचने वाला नहीं आया तो गला सूखने लगा। ट्रेन की रवानगी को दो घंटे हो गए और न कोई ठीक सा स्टेशन आया कि पानी खरीद लेते। इधर हम दोनों प्यास से बेहाल थे और पानी न मिलने का रोना भी रो रहे थे, ऐसे में सामने वाली लड़की अपनी बोतल में से हर पांच मिनट में दो घूंट पानी पीती और ढक्कन लगाकर हमारे सामने बोतल को हाथों में घुमाने लगती। मैंने फुसफुसाकर विक्रम से कहा कि ये लड़की हमें पानी की बोतल देना चाह रही है, लेकिन मेरी नजर में, जिससे विक्रम भी सहमत था, लड़की से पानी की बोतल लेने से हमारी इज्जत कम हो जाएगी। इस चक्कर में कोई एक घंटे और प्यास से व्याकुल सूखे होठों पर जीभ की कोर फिरानी पड़ी। सवाईमाधोपुर स्टेशन पर पानी मिला और हमने प्यास बुझाई।
पूरा वाकया सुनते ही नीरज जोर-जोर से हंसने लगा, मैंने पूछा, यार मैंने कोई जोक थोड़े ही सुनाया है। नीरज बोला यार, तुम दोनों वास्तव में ही ठेठ जाट हो। कैसे, बोला यार, मैं होता तो लड़की से पानी मांग लेता और इसी बहाने उससे दोस्ती भी हो जाती। वो लड़की तो आगे से ही तुम दोनों को पानी पिलाना चाह रही थी, लेकिन तुमने मौके का फायदा नहीं उठाया। नीरज ने नीचे की बर्थ पर बैठी लड़की पर डोरे डालने शुरू किए, मैं भी साथ था, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई।
विक्रम को आगे के स्टेशन नदबई से सवार होना था। फिक्स शेड्यूल के बावजूद विक्रम गांव से नदबई तक वाहन न मिलने की वजह से लेट हो गया। ट्रेन के नदबई पर रुकने और दो मिनट बाद रवाना होने तक विक्रम की खैर खबर न थी इसलिए हम दोनों का मूड खराब होने लगा था। फोन लगाया तो पता चला कि हमारे फोनेटिक लवर ट्रेन के अंतिम डिब्बे में घुस पाने में कामयाब हो गए थे। भरतपुर पहुंचे तो शाम के ७.३० बज चुके थे और हमें गोवर्धन जाने वाली किसी बस की तलाश थी, किसी ने पूछने पर दूरी बताई ३२ किमी। एक बस आई तो वह ठसाठस भरी हुई थी और उसमें हम तीनों का सवार हो पाना मुश्किल था। अगली बस की प्रतीक्षा शुरू हुई, लेकिन वह भी नीचे से भरी हुई थी फिर निर्णय लिया गया कि ऊपर छत पर चढ़कर यात्रा की जाए, नुकसान केवल एक ही था, बस की छत पर किसी पेड़ की डालियों के सिर से टकराने या बबूल के कांंटे लग जाने का, क्योंकि बृज क्षेत्र में बबूलों की मात्रा भरपूर है। लेकिन हमारी खामख्याली तब हवा हो गई, जब बस की छत पर भी यात्रियों का एक रैला सवार हो गया। कुलमिलाकर ४४ सीट की उस बस में कोई ६५ व्यक्ति नीचे और चालीसेक छत के ऊपर थे। बस के ऊपर शाम ८ बजे की हल्की ठंडक वाली बयार हमें सुकून पहुंचा रही थी।
गोवर्धन पहुंचते ही परिक्रमा की धुन सवार हुई, लेकिन इससे पहले किसी ठहरने के स्थल की तलाश थी। किसी अच्छे होटल या गेस्ट हाउस की कल्पना करना यहां बेमानी है, इसलिए हमने एक धर्मशाला में कमरा लिया और खाना खाकर गिरिराज यानी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए चल पड़े। पांच बार प्रभु को पिट्टा प्रणाम (जमीन पर लेटकर) करके परिक्रमा की शुरुआत की। दानघाटी मंदिर से शुरू की हुई परिक्रमा में भीड़ इतनी थी कि यदि व्यक्ति दो कदम भी पीछे रह जाए तो उसका अपने साथ आए दोस्तों या परिजनों से बिछुडऩा अवश्यंभावी है। करीब दस मिनट के रास्ते के बाद एक जगह पर प्रभु की एक नाटिका का मंचन हो रहा था, ठेठ बृज भाषा में। करीब तीस मिनट तक इस मंचन को देखने में हम इतने तल्लीन हुए, जितना शायद मैं तो अब तक न किसी अंग्रेजीदा हॉलीवुड मूवी में हो पाया था और न ही किसी बॉलीवुड मूवी के मोहपाश में बंध पाया था, फिर सास-बहू के झगड़ों वाले डेलीसोप्स की तो बिसात ही क्या थी। प्रभु श्रीराम और उनके भक्त गोपाल के इस अभिनय को देखने के बाद आगे चले तो मुझे प्यास लगी। मुझे यह पहले ही बता देना चाहिए था कि परिक्रमा के बीच-बीच में रासलीला, श्रीमद्भागवत कथा वाचन और धर्मार्थ प्याऊ लगभग हर आधे किमी की दूरी पर दिखाई दे जाते हैं। मैं एक प्याऊ पर पहुंचा, नीरज को आवाज दी, मात्र २० सैकंड के वक्फे में ही विक्रम आगे निकल गया। अपने दोस्त के बिछुडऩे पर मन कुछ खट्टा हुआ और परिक्रमा का उत्साह भी ठंडा हुआ, लेकिन आगे बढ़ते रहे। विक्रम का मोबाइल काम नहीं कर रहा था, बाद में नेटवर्क मिलने पर करीब दो घंटे बाद हम फिर मिल गए। रास्ते में साक्षी गोपाल मंदिर, पूंछरी का लौठा, जतीपुरा आकर्षण का केन्द्र रहे, जहां पर भक्तों का इतना अच्छा उत्साह शायद ही मैंने पहले कभी देखा हो, इनमें सर्वाधिक संख्या करीब २०० वर्गकिमी में रहने वाले ग्रामीणों की थी।
ऐसा नहीं है कि शहरी लोगों की वहां उपस्थिति न हो, बल्कि करीब ३० प्रतिशत संख्या शहरी लोगों की थी, जिनमें करीब ५ प्रतिशत रिक्शा करके परिक्रमा कर रहे थे, लेकिन विक्रम के शब्दों में वे ग्लानि महसूस करते हुए परिक्रमा दे रहे थे, क्योंकि नंगे पैर करीब २१ किमी पैदल चल पाना उनके वश से बाहर की बात थी। करीब ८ किमी तक तो मैं आराम से चलता रहा, फिर सड़क की गिट्टियां पैरों में चुभने लगी थीं, नीरज भी यही शिकायत कर रहा था। परिक्रमा को दो हिस्सों में बांटा हुआ है, जिनमें चार कोस की परिक्रमा मैंने जैसे-तैसे पूरी कर ली थी। इसके बाद तीन कोस की अन्य परिक्रमा, जिसमें राधाकुंड, हरगोकुल जैसे स्थान आते हैं, मेरे लिए कुछ भारी पड़ गए थे। खैर, हम नंगे पैर चलते रहे और परिक्रमा भी लगभग पूरी होने को थी। रात्रि दस बजे शुरू हुई हमारी परिक्रमा सुबह ५.३० बजे पूरी हुई। हालांकि इस दौरान भक्तों का उत्साह गजब का था। राधे-राधे, श्याम मिलादे, गिरिराज महाराज की जय, बंशीवाले की जय जैसे नारे भी इस पूरी परिक्रमा में गूंजते रहे। मैं शायद कोई अंदाजा लगा पाऊं तो करीब ५० से ६० हजार या फिर एक लाख तक भी लोग रोजाना गोवर्धन परिक्रमा दे रहे थे। मानसी गंगा तक पहुंचते-पहुंचते हमारी हालत खस्ता हो गई थी और पैरों में एक कदम चलने लायक भी शक्ति नहीं बची थी। इसके तुरंत बाद हम धर्मशाला के अपने कमरे में सो गए तो करीब १२ बजे नींद खुली। हमारी प्लानिंग तो यह थी कि इसके बाद वृंदावन, गोकुल, बरसाना आदि क्षेत्रों में भी भ्रमण किया जाए, लेकिन पैर जवाब दे चुके थे और थकान भी इतनी थी कि आगे चलने की हिम्मत नहीं हुई।
वापसी में भरतपुर के लिए एक वैन किराए पर ली। नीरज को अपने मौसाजी के यहां नगर पहुंचना था, मैं और विक्रम भी अपने-अपने गांवों के लिए रवाना हुए। हम दोनों एक ही बस में बैठकर वापस पहुंच गए। पूरी यात्रा काफी अच्छी रही, हमारा उत्साह भी अच्छा था, प्रभु भक्ति की भावना और अटूट श्रद्धा हमारे साथ रही, लेकिन फिर भी बृजक्षेत्र की इस यात्रा को हम पूरा नहीं कर पाए हैं। मौका मिला तो शायद, फिर से अगले कुछ माह, या एक दो वर्ष में बृजक्षेत्र जाना चाहूंगा। अंत में, यही कहना चाहूंगा कि मैं श्रीकृष्ण और राधिका रानी का भक्त हो गया हूं और अपनी भावना को गौरवकृष्ण गोस्वामी के इन शब्दों में बयां करना चाहूंगा, क्योंकि मेरे शब्दकोश में इससे अच्छे शब्द मिलना मुश्किल है।
नाम महाधन है अपनों, नहीं दूसरी सम्पत्ति और कमानी
छोड़ अटारी अटा जग के, हमको कुटिया बृज में ही बनानी
टुक मिलें रसिकों के सदा और पीवन को यमुना जल पानी
हमें औरन की परवाह नहीं, अपनी ठकुरानी श्री राधिका रानी
Monday, 17 May 2010
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