स्वागत है

यदि आपके पास समय की कमी नहीं है और फालतू चीजें पढऩे के शौकीन है तो मुझे झेलने के लिए तैयार हो जाइए


Monday, 7 September 2009

शीशे की अयोध्या

तब मेरी उम्र बमुश्किल आठ या नौ बरस रही होगी, हमारे छोटे से गांव में एक मिडिल तक स्कूल था, बचपन में पढ़ाई करने कम, हम खेलकूद के लिए स्कूल अधिक जाते। कभी नीम, पीपल के पेड़ों पर चढ़कर लुकाछिपी खेलना तो कभी गुल्ली डंडा के खेल में फैसला नहीं होने पर एक दूसरे से झगड़ पडऩा। दोपहर में आधे घंटे के लिए स्कूल से छुट्टी मिलती तो रास्ते में धूल उड़ाते, एक दूसरे को टंगड़ी लगाते घर पहुंचते। मैं शाम को घर पर बड़े भैया के साथ रामायण पाठ करता, यही कोई एक-डेढ घंटे। रामायण के अंतिम कांड में रामराज्य का वर्णन था, मुझे भी अपने गांव का माहौल उस समय रामराज्य से कम नजर नहीं आता था। और मैं गांव को अयोध्या समझता।
... यह रोज की बात थी, हमारे घर के बड़े से आंगन में हमें एक हरिजन वृद्धा झाड़ू बुहारते हुए मिलती। उम्र यही कोई साठ वर्ष रही होगी, चेहरे पर घनी झुर्रियां और आगे से दांतविहीन पोपले होठों को खोलकर वह हंसते हुए हमारा स्वागत करतीं। अम्मा से रोटी की मांग करते मैं जब आंगन में उछलकूद मचाता, तो वह मुस्कुराते हुए कहतीं कि बेटा ज्यादा शैतानी नहीं करते। मैं रोटी खाता रहता और उनको झाड़ू बुहारते देखता रहता। इस मेहनत के बदले उन्हें हमारे घर से मिलती एक गेहूं की मोटी रोटी। यह हमारे घर की रीत नहीं, बल्कि गांव के सभी घरों से उन्हें झाड़ू के बदले एक-एक रोटी दी जाती। फिर भी वह खुश थीं।
कह नहीं सकता, लेकिन मुझे शुरू से ही उनसे कुछ लगाव हो गया। नाम था बादामी। मैं उन्हेंं अम्मा कहने लगा। हल्की झीनी पैबन्द लगी साड़ी और हाथ में झाड़ू लिए वह पूरे गांव का फेरा लगातीं। एक बात और उनके साथ गबरू कुत्ता होता। गधे से थोड़ा कम ऊंचाई का यह कुत्ता देखने में ही खतरनाक लगता, इसलिए गांव के लोग कुत्ते के नजदीक नहीं आते। मैं बादामी अम्मा का थोड़ा नजदीकी था, इसलिए गबरू मुझसे कुछ नहीं कहता था। इस बात से दूसरे बच्चों के बीच मेरी कुछ धाक जम गई थी। दूसरे बच्चों को मैं गबरू के नाम से उन्हें डरा भी देता था। इतनी समझ नहीं थी, फिर भी १५० घरों के छोटे गांव में सबसे परिचित हो गया था। बादामी अम्मा के सात बेटे थे।
ज्यादा कुछ काम तो उनका परिवार करता नहीं था। न तो गांव के दूसरे किसानों की तरह खेती का काम था, न ही कभी भेंस या गाय जैसे पशुओं का पालन करते थे। हरिजन होने के कारण गाय रखने पर तो शायद पूरा गांव उनके विरोध में उतर आता। मेरी अम्मा भी कैसे अक्सर मुझे डांटती थीं, जब मैं बादामी अम्मा को छू लेता। डांटते हुए हाथ के हाथ नहलाने की जिद करतीं, मैं रोने लगता तो पानी के छींटे मारकर मुझे पवित्र करतीं और फिर बादामी से दूर रहने को कहतीं। इसमें क्या रहस्य था, तब समझ नहीं आता था। और हां, एक बात और अक्सर मेरी बड़ी दीदी कहानी सुनातीं कि पहले बादल धरती पर बहुत नीचे थे। एक बार बादामी सिर पर कूड़े का टोकरा उठाए जा रही थीं। बादल कुछ ज्यादा नीचे हो गए, तो बादामी का टोकरा बादलों से अटक गया। बादामी को गुस्सा आया तो झाड़ू से बादल को पीटने लगीं, पिटाई के डर से बादल इतना ऊंचा हो गया कि फिर कभी धरती के नजदीक नहीं आया। कहानी सुनाते ही दीदी हंसने लगती और मैं बादामी अम्मा के इस चमत्कार का लोहा मानता कि बादामी अम्मा से तो बादल भी डरते हैं।
बादामी अम्मा का छठा बेटा सुनील मेरी ही क्लास में था। वह हरिजनों का पहला बच्चा था, जो स्कूल तक पहुंचने में कामयाब हुआ था, वरना उससे बड़े दूसरे बेटे तो सुअर, भेड़-बकरी ही चराते थे। बादामी अम्मा के पांच बेटों की शादी हो गई थी। इस बार जब उनके पांचवें बेटे की शादी हुई तो वो नई-नवेली बहू को लेकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने आई। अब बादामी अम्मा को काम से राहत हुई, अब उन्हें झाड़ू लगाने और कूड़े का टोकरा उठाने से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा शायद बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन मेरी अम्मा बतातीं थीं कि बादामी अम्मा की बड़ी बहुएं मेहनत नहीं करना चाहतीं, इसलिए वे बादामी अम्मा से अलग रहती हैं। ऐसा शायद दस दिन हुआ होगा जब बादामी अम्मा को झाड़ू नहीं लगाना पड़ा। ग्यारहवें दिन जब मैं स्कूल से इंटरवैल के टाइम पर घर पहुंचा तो बादामी अम्मा को फिर झाड़ू पकड़े पाया। आज अम्मा के साथ उनकी पांचवीं बहू भी नहीं थी, साथ था तो गबरू और झाड़ू। अब बादामी अम्मा को फिर से काम करना पड़ रहा था, पांचवा बेटा भी अब उनसे अलग हो गया था। लेकिन हमारे लिए बादामी अम्मा का वही प्यार बरकरार था। शायद बादामी अम्मा को काम करना अच्छा लगता था, इसलिए वह पूरे गांव का झाड़ू निकालने के बाद भी हंसती रहती थीं।
दिन गुजरते गए, मैं गांव के मिडिल स्कूल से पास होकर सैकण्डरी स्कूल में आ गया, चार साल बाद भी हालत जस के तस थे। बादामी अम्मा की दिनचर्या यथावत थी, वह रोज झाड़ू निकालतीं और गावं के हर घर से एक रोटी पातीं। मैं अब भी दिल से उनके नजदीक था। टाइम मिलने पर उनके गबरू के साथ खेलता, बादामी अम्मा अब भी मुझे दुलार करतीं। मेरी अम्मा के साथ अपने बेटे-बहुओं की बातें बतातीं, पर उन्हें शायद कोई गिला नहीं था। इन दिनों एक आश्चर्यजनक परिवर्तन मैं अपनी अम्मा में देख रहा था, अब जब मैं बादामी अम्मा के साथ खेलता तो वह मुझे डांटती नहीं थी। न ही कभी नहलाने की जिद करतीं। अब बादामी अम्मा के हाथ-पैर जवाब देने लग गए थे। कुछ दिन पहले उनके छठे बेटे सुनील, जो आठवीं क्लास तक मेरा क्लासमेट रहा था, की शादी हो गई थी। अब वह भी अपनी बीवी के साथ अलग रहने लग गया था।
पन्द्रह दिन की छुट्टियों के बाद वापस भाई साहब ने जयपुर बुला लिया अब डॉक्टरी में प्रवेश के लिए पीएमटी का एग्जाम देना था। मैं डॉक्टर तो नहीं बन पाया, लेकिन एक समाचार पत्र में संवाददाता हो गया था। गांव का जीवन भी जैसे एक बिसरी पृष्ठभूमि की तरह पीछे छूटने लगा था। पिताजी ने फोन कर गांव आने को कहा। चार दिन की छुट्टी थी। मैं गांव पहुंचा ही था, कि अम्मा ने सूचना दी, बेटा आज सुबह बादामी चल बसी। मैं एकाएक कुछ समझ न सका। लेकिन अभी तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। मेरे पूछने पर अम्मा ने बताया कि सभी बहुएं अलग रह रही थीं, हाथ-पांव भी साथ छोड़ गए थे। पिछले कुछ दिनों से झाड़ू लगाने भी नहीं आई। शायद बीमारी से मौत हो गई। एक बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी। बादामी अम्मा अब सब कष्टों से दूर थीं। मेरे बचपन के गांव का रामराज्य और अयोध्या जैसा अनुभव अब पीछे छूट गया था। वह शायद शीशे की अयोध्या थी, जो अब चकनाचूर हो गई थी।

Wednesday, 5 August 2009

आजकल का 'लव'

अभी ताजा-ताजा फिल्म देखी है, लव आजकल। फिल्म देखने जब सिनेमाहॉल पहुंचे, गलती हुई, जो सिनेमाघर कह दिया। ऐसा कैसा सिनेमाहॉल जहां दोपहर के शो का टिकट 140 रुपए में मिलता है। तीन बजे का 160 में, छह बजे का 170 में और नाइट शो का टिकट मांगा तो 180 रुपए देने पड़ेंगे। यहां टिकट की कीमत भी 'लवÓ की सांसों की तरह हर घंटे के हिसाब से बढ़ती है। फिल्म में भी कुछ ऐसा ही दिखाया है। पहली बाईलॉन के चुनिंदा घंटों में सिनेतारिका सितारे की बांहों में आ जाती है और फिर इसे किस में बदलते देर नहीं लगती। अब आप हमारी बात को पुरानी मानसिकता कहकर खारिज कर देंगे। रूढि़वादी विचारधारा का मानुष कह कर हमें अपशब्द कहने की बात भी दिमाग में ला रहे होंगे। आज के जमाने में किस कर लेना कौंनसा गलत है। चलिए नहीं कहते गलत, अभी थोड़ी देर और झेलिए, आपको भी रुढि़वादी विचारक साबित न कर दिया तो हमारा नाम बदल दीजिएगा। यूं लव के भी आजकल कई मायने हो गए हैं। जवां छोकरे की जुबां और धड़कन में हर दूसरी लड़की के लिए यह कशिश जोर मारती है। बाईलॉन के बाद चंद मिनटों की बातचीत जब कुछ टाइम चल जाए और मोहतरमा आपको एक मुस्कराहट दे दे तो जनाब को आई लव यू कहते देर नहीं लगती। फिर लव की पटरी दौड़ती है रेस्टोरेंट और कॉफी हाउस की ओर, डिस्कोथेक में अधनंगे नांच की ओर, कुछ कसर बाकी रह जाए तो 'पीनेÓ की स्थिति का फायदा उठाने की हो सकती है। फिर 21वीं सदी के खुलेपन का एक और फायदा देखिए, बाद में आपस में बता भी देते हैं कि लव के किन क्षणों में उन्होंने 'लवÓ किस-किस तरह से किया था। फिल्म देखते-देखते हमने कितने ही लोगों को इन डायलॉग्स पर खीसें निपोरते देखा था। फिर बारी आती है ब्रेक अप की और एक-दूसरे से दूर चले जाने की। नायक-नायिका में अभी भी लव के कीटाणु जोर मार रहे हैं, इसलिए मन की असली बात एक दूसरे को बताने की कोशिश कर रहे हैं। 65 के टाइम के वीर सिंह को एक ही बार में पता चल गया था कि उसे लव हो गया। नायक भी कोशिश कर रहा है, 15-16 बार में से एकाध बार का लव तो ध्यान आ जाए। पर नहीं आता ध्यान, आता है तो बर्बाद करके। गोल्डन गेट के सपने को चकनाचूर करके। ठहरिए, हम बीच में एक बात तो भूल ही गए। जब दोनों को लव का पता ही नहीं चलता तो नायिका एक दूसरे 'कबाब में हड्डीÓ से शादी कर लेती है। 'कबाब में हड्डीÓ की उपमा हमने नहीं दी, ये फख्र हमारी पीछे वाली सीट पर बैठे एक भाई साहब को हासिल हुआ। शादी करते वक्त भी अमर प्रेमियों को पता नहीं चलता कि कीटाणु अब विशाल बीमारी का रूप लेने वाले हैं, लेकिन ऐन हनीमून से पहले नायिका को 'असली लवÓ का पता चल जाता है। वह 'कबाब की हड्डीÓ को छोडऩे को तैयार हो जाती है और कहती है कि वह उसके साथ नहीं रह सकती। अब पीछे की सीट पर बैठे भाई साहब की सारी सहानुभूति 'कबाब की हड्डीÓ के साथ थी। वो अब नायिका को गालियां देने के मूड में थे। अब वे रुढि़वादी हो गए थे। अब उन्हें नायक-नायिका से मतलब नहीं था, वे चाहते थे कि नायिका 'कबाब की हड्डीÓ को ही अपना पति मान ले। क्यों साहब हैं न आप भी हमारी तरह रूढि़वादी, ये सीन तो आपको भी नहीं सुहा रहा होगा। चलिए छोडि़ए आप भी सोच रहे होंगे कहां से लिखकर कहां तक घसीट दिया। सच बताएं जब हम ये आर्टिकल लिख रहे थे, शायद हमारे चढ़ी हुई थी।अजी नहीं साहब दारू नहीं, लव की खुमारी!

Saturday, 18 July 2009

लालू की रेल में घुसपैठ

बात एकदम सही है और वाजिब भी, दो मंजिला ट्रेन चलाने का आइडिया भूतपूर्व मंत्री साहब दें और वाहवाही लूटें ममतादी। इसलिए लालूजी का गुस्सा दिखाना एकदम उचित है। और हो भी क्यों नहीं साहब वर्षोंं से घाटे में चल रही रेल को मुनाफे में इस तरह दिखाया कि आईआईएम और हार्वर्ड मैनजमेंट के तुर्रमखां विशेषज्ञ भी अन्दाजा नहीं लगा पाए कि रेल को इतना फायदा हो कैसे रहा है। अब ममता दीदी भी उनकी तर्ज पर रेल का प्रबंधन करना चाहती हैं, तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन बात एक ही बुरी है कि सारे आइडिए निकले लालूजी की खोपड़ी से और लागू करने की जय-जय ममता उठा रही हैं। लालू यादव ने उन्हें जो खुले चैलेंज दिए हैं उनसे हम तो सौ फीसदी सहमत हैं और प्रतीक्षा करिए आर्टिकल पूरा पढऩे तक आपकी मुंडी भी सहमति में ऊपर-नीचे हिलने लगेगी।
सबसे बड़ी बात मैनेजमेंट की है। जिस रेल को बड़े-बड़े मैनेजमेंट विशेषज्ञ मुनाफे में लाने की तरकीब नहीं ला पाए उसे हमारे लालूजी ने साबित कर दिखाया। शुरू से ही इसके लिए विलायती प्लानिंग्स की बजाय देशी नुस्खों से काम चलाया। अरे साहब बड़े-बड़े वीवीआईपीज को मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पिलवा दी। मालभाड़े में भले ही आपकी जेब निचोड़ी हो, लेकिन आवाजाही में एक पैसा भी किराया नहीं बढ़ाया। और ऐसा पूरे पांच साल चला। रेल के अन्दर भी छप्पनभोग उपलब्ध कराए। कुली भाईयों की तो जैसे लॉटरी लग गई, लालूजी अवतार की कुछ ऐसी कृपा हुई कि सबको पक्की नौकरी दे दी। रेल दुर्घटनाएं भले ही खूब हुई हों, और होनी को भला टाल भी कौंन सकता है, लेकिन मृतकों के परिजनों को क्या कम सहायता दी। लालूजी के इन मंत्रों की गूंज तो आईआईएम के गुरुओं तक पहुंची इसलिए लालूजी से गेस्ट लेक्चर कराया। और विदेशी हार्वर्ड के मैनेजर्स ने भी अपने लालूजी का लोहा माना और उन्हें अपना गुरू बना लिया।
अब आप बार-बार यह मत कहो कि लालूजी ने रेलवे को अपनी गायों की तरह दुहा। सब फायदे के पद अपने लम्बे-चौड़े कुटुम्ब वालों को दे दिए। सारी रेल योजनाएं बिहार के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गईं। बिहार के गांव-गांव को लोहपथगामिनी से जोड़ दिया और बेचारे हमारे करौली वाले अभी रेल को काले धुंए वाले लम्बे वाहन के अलावा पहचान ही नहीं पाते। रेल के डिब्बे बनाने वाले कारखाने और दूसरे उद्योग संयंत्र भी बिहारियों को दे दिए। दरअसल ये सब बातें आपकी दकियानूसी और छोटी सोच की हैं। अरे भई जब सारा देश रेलवे के फायदे से मंत्रमुग्ध हो तो अपने भाई-भतीजों को नौकरियों में फिट कर देना कौंनसी बुरी बात है। अब रेल के डिब्बों की फैक्ट्री कहीं तो खुलनी ही थीं, बिहार में खोल दीं तो कौंनसा गुनाह कर दिया। और अन्त-पन्त तो रेल ने करौली में भी दर्शन देने ही हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालूजी ने एक से एक योजनाएं बनाईं। पैसा तो हर योजना में खर्च होता है। लागू करने में टाइम तो लगता ही है, अब टाइम कुछ ज्यादा लग गया तो यह तो कोई बात नहीं हुई कि ममताजी फायदा उठा लें। लालूजी की बात से हम एकदम सहमत हैं कि दो मंजिला ट्रेन को चलाओगे कैसे, कहां-कहां ऊपर के बिजली के तार हटाओगे और कहां-कहां सुरंगों को ऊंची करोगे। ऐसे काम अंजाम देने का नुस्खा तो केवल अपने लालूजी को आता है। आपने भले ही न सुना हो, पर हमारे कान इतने कच्चे नहीं हैं, चारे की पूरी आमदनी कैसे राख हो गई, इसकी भनक हमें भी है। इसलिए लालूजी से बड़ा मैनेज कर सकने वाला विशेषज्ञ कोई हो ही नहीं सकता। अब ममतादी बिना बात के ही उन्हें श्वेत पत्र जारी करने की धमकी दें यह अच्छी बात तो नहीं है। हमारी नजर में लालूजी जैसा ईमानदार आदमी अब तक रामराज्य में भी नहीं हुआ होगा, इसलिए ममतादी समझ लीजिए कि वे आपकी गीदड़ भभकियों में आने वाले नहीं ।

कमाई की गणित

लो जी साब ये तो कमाल हो गया! हमारे मीडिया वाले जिस तरह सचिन और माही की कमाई पर निगाह गड़ाए बैठे रहते हैं। और हर दस-पन्द्रह दिन में एक नॉन स्टॉप खबर बना देते हैं, कि बोर्ड फलां खिलाड़ी को इतना पैकेज दे रहा है और फलां खिलाड़ी ने गेम-कम-एड की कमाई से नया रेस्टोरेंट खरीद लिया है। लेकिन कमाई क्या होती है ये तो पहली बार अब पता चला है। आपको भले ही यह सुनकर कोई फर्क नहीं पड़ा हो, लेकिन सच मानिए हमारे होश तो अब तक ठिकाने नहीं हैं। टेनिस में बादशाहत की कुर्सी तक पहुंच चुके फेडरर से हमें तो बहुत जलन हो रही है। जनाब ने एक साल में ही 48 करोड़ की कमाई की है और हमारे धोनी-सचिन आठ नौ करोड़ ही कमा पाते हैं। बापूजी ने खूब समझाया कि बेटा पढ़ाई-लिखाई करके या तो डॉक्टर बन जाना नहीं तो कहीं किसी खेल-वेल में ही लग जाना। हमने भी कोशिश खूब की पर पढ़ाई की मोटी-मोटी किताबों को देखते ही नींद आने लगती। पिताजी खूब कहते पर हमारा मन चन्द्रकांता संतति और प्रेमचंद के ज्ञान खजाने के अलावा कहीं न लगा। साथ में रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाले सस्ते उपन्यासों का भी ऐसा चस्का लगा कि जनाब स्नातक आते-आते हमारी गाड़ी पचास प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाई। खैर गलती हुई और अब हो भी क्या सकता है। पर एक बात आपको बता दें हमारा किस्मत पर अटल विश्वास है, इसलिए जब तकदीक में कलमघसीट बनना लिखा था तो भला होनी को कौंन टाल सकता है।ऐसा नहीं है कि हमने बापू का नाम बिल्कुल ही मिट्टी में मिल जाने दिया। जब डॉक्टरी में दाखिला नहीं मिल पाया तो हमने बापूजी के दूसरे नुस्खे पर अमल करना शुरू कर दिया। रोज सुबह सवाई मान सिंह स्टेडियम में जाते और क्रिकेट की प्रैक्टिस करते। अब आप यह कहेंगे कि हमने क्रिकेट में जाने की ही क्यों सोची, तो आपको बता दें कि टीवी पर मैच आते वक्त आदमी खाने का कौर निगलना भूल सकता है पर नजर टीवी से इतर नहीं फिरा सकता। तो हम रोज एसएमएस स्टेडियम जाते। पर ससुर किस्मत ने यहां भी दगा दिया, जब कोच साहब के सामने हमने पहली बार खेला तो गेंद नजदीक आते-आते हमारी आंखें मिच गईं और गेंद ने हमारी विकेट उड़ा दी। गेंद के डर से हमारी आंख बंद होने को कोच साहब ने ताक लिया और अगले रोज से न आने की हिदायत दी।हिम्मत हमने यहां भी नहीं हारी और पांच फुट तीन इंच की अपनी कम लम्बाई बढ़ाने के लिए दोस्त की सलाह पर जिम जाना शुरू कर दिया। क्रिकेट खेलने के पीछे एक वजह यह भी थी कि साहब इतनी कम लम्बाई पर हमें और कहीं तो दाखिला मिल नहीं सकता था। खैर खुद को दूसरा सचिन समझने की भूल हमारी खत्म हुई और हमने जिम में कदम रखा। जिम वाले भाई साहब ने पहले दिन ही धमका दिया कि लम्बाई तो बढ़ेगी नहीं, सीना बढ़ाने-बाजू फुलाने के चक्कर में लम्बाई कम होने के चांस अधिक हैं। तो साहब यहां से भी तौबा बुली और हम इस दुनिया में आ गए। आज आपके सामने व्यथा कह दी तो दिल हल्का हो गया। हालांकि बापूजी ने यहां भी हमारी नालायकी समझी और कहा कि हमने जानबूझकर क्रिकेट में नाम रोशन नहीं किया। जब कलमघसीट नौकरी में कदम रख रहे थे तो फिर बापूजी ने नई सीख दी, बेटा प्रेमचन्द और दूसरे लेखक, पत्रकार अपनी कमाई से बच्चे नहीं पाल पाते। पर लेखकी का शौक ऐसा सिर चढ़ा कि अब तक नहीं उतरा। इसलिए रोज कहीं न कहीं कुछ लिखकर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। आज आपके सामने यह नया तुर्रा छोड़ दिया इसलिए आप अब तक हमें भुगत रहे हैं। खुदा खैर करे!

Tuesday, 7 July 2009

निवेश का खेल

ऑस्ट्रेलिया में दिनों-दिन हो रही हमारे छात्रों की पिटाई ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के दिल में चिंता का गहरा जख्म बना दिया है। मंत्री साहब की चिंता वाजिब है और अब उन्होंने इसके लिए एक रामबाण इलाज भी खोज लिया है। ऐसा नहीं है की अब हमारे बच्चे कहीं पढ़ नहीं पाएंगे या विदेशी शिक्षा नहीं ले पाएंगे। जनाब की मानें तो अब यहीं पर सारे छात्रों को बुला लिया जाए और छात्र ही क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों को यहीं खुलवा लेंगे। हमारे पास क्या जर- जमीन की कमी है जो विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुदान में नहीं दे सकते! भई आखिर ये हमारे सपूतों के भविष्य का मामला है। और इसकी चिंता मंत्री साहब को नहीं होगी तो क्या हमें होगी। विदेशी संस्थानों को यहाँ बुलाने को पढ़ी- लिखी भाषा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। और जब विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आयेंगे तो हमारी शिक्षा अपने आप विलायत के स्तर की हो जायेगी। वैसे भूलने की बात नहीं है, पर मंत्री साहब के पास बहुत काम होते हैं, इसलिए भूलना बड़ी बात भी नहीं है। साहब आपको याद दिला दें, जब- जब यहाँ विदेशी निवेश हुआ है, हमेशा घाटा ही हुआ। अपनी मूंछ ऊँची रखने वाले राजाओं की आपसी मारकाट में तेमूरलंग, मुग़ल राजाओं का निवेश हुआ तो ऐसी लूटमार मची कि सोने कि चिडिया कहलाने वालोँ के खाने के लाले पड़ गए। फिर गोरों की 'फूट डालो और राज करोÓ की कूटनीति के निवेश को हमने दो सदी तक भुगता। एक कम्पनी के नाम से घुसपैठ बनाकर गोरे साहब ऐसे जमे कि निकलने का नाम ही नहीं लिया, ये तो भला हो अपने गांधी बाबा का, जिन्होंने एक अधझुकी लाठी के सहारे ही फिरंगियों को धूल चटा दी। मियां मुर्शरफ ने भी यहां गजब का निवेश किया। एक तरफ तो साहब आगरा में बातचीत करने आए और दूसरी तरफ करगिल में घुसपैठियों की पूरी फौज घुसा दी। हमारी सरकार भी इतने दिन बाद जागी कि सैकड़ों जवानों की बलि चढ़ गई। चीनी भाईयों के निवेश की चोट तो सीमारेखा की क्षति के रूप में अब भी दुखती है। सेबी ने निवेश की खुली छूट दी तो हमारे दौड़ते सांड की हवा निकल गई और सेंसेक्स 25 से 8 हजार पर गिर गया। और अपनी बातें याद नहीं हैं तो पड़ौसी मुल्क की तरफ निगाह घुमा लें। मियां मुर्शरफ और उनके पूर्वज राष्टï्रपतियों ने अमरीकी अंकल को पाकिस्तान में घुसने की इजाजत क्या दी, अंकलजी लाठी के बल पर जमकर ही बैठ गए, और साहब ऐसा निवेश किया कि अब वायु, जल, थल सब तरह के अड्डे पाक सीमा में बना लिए हैं। अब तो पाकिस्तान इन अड्डों की जमीन पर अपना हक भी नहीं जता सकता। अफगानिस्तान में तालिबान की उत्पत्ति और पतन, नेपाल में माओवादियों की दादागिरी, सब विदेशी निवेश के परिणाम हैं। इसलिए विदेशी निवेश को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझना हर चमकती चीज को सोना समझना है। यूं मंत्री साहब की मर्जी है, वे जब चाहें, जिसे चाहें झण्डाबरदार बनाकर यहां निवेश करा सकते हैं, हम कौंन होते हैं, रोकने वाले। अपन तो साहब खाली-पीली सलाह दे सकते हैं, मानो या न मानो।

yeh alekh न्यूज़ टुडे jaipur के 7 july ke ank me prakashit hua है।

Sunday, 8 February 2009

भीष्म को कैसे क्षमा कर दें.

मुझे महाभारत का एक प्रसंग याद आ रहा है। जब भीष्म विदुर के साथ बात करते हुए कहते हैं, मैं कभी भी पांडवों का बुरा नही सोच सकता। न ही कभी उनके हितों के साथ समझोता करूँगा, लेकिन विदुर जीवन में मुझसे कुछ ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं जिनका प्रायश्चित करना नामुमकिन है। एक अपाहिज अंधे की जिद पर मैंने पिताविहीन पांडवों को कुंती समेत वारणावत भेज दिया था। तब इस दुर्योधन ने उन्हें .जला मारने की कुचेष्टा की, इसने जुए के जरिये द्रोपदी का अपमान किया, लेकिन मैं कई अवसरों पर शांत रहा। आज जब पांडव १३ वर्ष के वनवास के बाद वापस हस्तिनापुर आना चाहते हैं। तब भी इस दुर्बुद्धि ध्रतराष्ट्र को उनके आने पर शोक है। जब भी मैं इसके हित की बात करना चाहता हूँ, यह पुत्रमोह में पड़कर रोने लगता है। आख़िर यह भी तो मेरे बेटे के समान है, मैं इसे भी रुलाना नहीं चाहता। उस समय विदुर का प्रश्न जैसे ज़माने भर की कड़वाहट लिए हुए था, तातश्री फिर आपको ये राज्य ध्रतराष्ट्र को सौंप देना चाहिए, क्योंकि आप पांडवों के आंसू देखने के आदी हो चुके हैं। आपको ये भी ध्यान नहीं है कि न केवल इन्द्रप्रस्थ बल्कि हस्तिनापुर के सिंघासन पर भी युधिष्ठिर का ही हक़ बनता है। इसलिए ये आपका कर्तव्य है कि आप युधिष्ठिर को ससम्मान उसका राज्य दिलवाएं। आप जानते हैं कि अब उनके साथ मुरली मनोहर भी हैं और वैसे भी यदि युद्ध हुआ तो अर्जुन और भीम ही किसी भी देश की कितनी भी बड़ी सेना और रथियों को हरा सकते हैं। फिर आपको किस प्रमाण की आवश्यकता है वैसे भी सारे कुरु योद्धाओं ने विराट युद्ध में अर्जुन के बाणों का स्वाद चख ही लिया है। बड़बोले कर्ण, घमंडी अश्वत्थामा, असभ्य दुर्योधन नीच दुशासन और आप जैसे महान योद्धा, गुरु द्रोण, आचार्यवर कृप आदि सब वीरों को अकेले पार्थ ने पीछे कर दिया था। आपके श्वेत अम्बर के अलावा उसने सबके वस्त्र भी उतार लिए थे। क्या फिर भी अंध भ्राता धृतराष्टï्र और मदांध दुर्योधन उनसे युद्ध करना चाहते हैं। क्या आप भूल गए हैं कि उन्होंने वचन निभाने की खातिर 13 वर्ष का वनवास पूरा किया है। एक वर्ष तक तो चाकर जैसी स्थिति में विराटनरेश की सेवा में बिताए हैं। क्या आपको नहीं पता कि अज्ञातवास की अवधि में पांडवों ने द्रोपदी समेत कितने कष्टï झेले हैं। यकायक पितामह भीष्म विचलित हो उठे। हाथ स्वयमेव सिर पकडऩे वाली मुद्रा में हो गए। विदुर तुम्हारी एक-एक बात जब सुनता हूं तो ह्रïदय में तीर की नोक जैसे चुभती है, लेकिन मैं क्या करूं। मैंने प्रतिज्ञा करते समय यह भी कसम खाई थी कि मैं हस्तिनापुर नरेश की आज्ञा की सदैव पालना करूंगा। मान लिया कि धृतराष्टï्र मेरे पुत्र जैसा है, लेकिन फिर भी वह राजा है और उसकी आज्ञा की खिलाफत करना मेरे वश में नहीं है। मेरी अटल प्रतिज्ञा है कि जो भी हस्तिनापुर को टेढ़ी नजर से देखेगा, मैं उसे बख्शूंगा नहीं, चाहे वह मेरे प्रिय पांडव पुत्र ही क्यों न हों। हालांकि यह जख्म मुझे आज भी टीसता है कि विधाता मैंने ऐसी कठोर प्रतिज्ञा क्यों की। मैं यह भी जानता हूं कि युद्ध हुआ तो अर्जुन के तीर किसी भी योद्धा को जीवित न छोड़ेंगे। मैं भी अजेय नहीं हूं। द्रोण शिष्य को धर्नुविद्या में कुछ नुस्खे तो ऐसे आते हैं कि भगवान शंकर के अतिरिक्त उसे धनुर्युद्ध में जीतना किसी के लिए भी संभव नहीं है। तुम ही बताओ क्या मुझे अच्छा लगेगा जब मेरा प्रिय अर्जुन मेरी छाती बींधेगा या अपने गुरु द्रोण के ह्रïदयस्थल में घाव बनाएगा या अपने बांधवों को मृत्यु के घाट उतारेगा, नहीं कदापि नहीं विदुर। मैं ऐसा नहीं चाहता, लेकिन नियति यदि यह चाहती है तो भला मैं ऐसा होने से कैसे रोक सकता हूं। सारांश: प्रस्तुत आख्यान के जरिए भीष्म पितामह के कर्तव्यबोध और उनकी विवशताओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

Tuesday, 27 January 2009

अभी जवान है इंडिया

सुबह से एक भाई साहब रेडियो पर चिल्ला रहे थे कि आज मुझे मोबाइल पर किसी ने गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओ का संदेश नही भेजा है। और बात यदि वैलेंटाइन डे की होती तो अब तक पचासों संदेश आ जाते। अरे भइया इस देश की बात ही ऐसी है। अभी एक भाई साहब ने भारत को अंग्रेजों की नजर में सपेरों का देश की तरह साबित करते हुए स्लुमदोग करोड़पति नाम से फ़िल्म बना डाली। इनकी माने तो हमारा देश अभी भी झोपड़पट्टी का कुत्ता है। जिसके पास दूसरो के सामने हाथ फेलाने के सिवा कोई काम नहीं। लेकिन ये भी गौरतलब है कि हमारे देश के वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजिनियर, आईटी एक्सपर्ट ही अमरीका को चला रहे हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में इकोनोमी के लिहाज से हमारे देश की कन्डीशन विश्व में सबसे बेहतर मानी जा रही है। और सबसे बड़ी बात, हमारे देश में युवाशक्ति विश्व में सबसे ज्यादा है। इसलिए कहें, अभी जवान है इंडिया।