Monday, 7 September 2009
शीशे की अयोध्या
... यह रोज की बात थी, हमारे घर के बड़े से आंगन में हमें एक हरिजन वृद्धा झाड़ू बुहारते हुए मिलती। उम्र यही कोई साठ वर्ष रही होगी, चेहरे पर घनी झुर्रियां और आगे से दांतविहीन पोपले होठों को खोलकर वह हंसते हुए हमारा स्वागत करतीं। अम्मा से रोटी की मांग करते मैं जब आंगन में उछलकूद मचाता, तो वह मुस्कुराते हुए कहतीं कि बेटा ज्यादा शैतानी नहीं करते। मैं रोटी खाता रहता और उनको झाड़ू बुहारते देखता रहता। इस मेहनत के बदले उन्हें हमारे घर से मिलती एक गेहूं की मोटी रोटी। यह हमारे घर की रीत नहीं, बल्कि गांव के सभी घरों से उन्हें झाड़ू के बदले एक-एक रोटी दी जाती। फिर भी वह खुश थीं।
कह नहीं सकता, लेकिन मुझे शुरू से ही उनसे कुछ लगाव हो गया। नाम था बादामी। मैं उन्हेंं अम्मा कहने लगा। हल्की झीनी पैबन्द लगी साड़ी और हाथ में झाड़ू लिए वह पूरे गांव का फेरा लगातीं। एक बात और उनके साथ गबरू कुत्ता होता। गधे से थोड़ा कम ऊंचाई का यह कुत्ता देखने में ही खतरनाक लगता, इसलिए गांव के लोग कुत्ते के नजदीक नहीं आते। मैं बादामी अम्मा का थोड़ा नजदीकी था, इसलिए गबरू मुझसे कुछ नहीं कहता था। इस बात से दूसरे बच्चों के बीच मेरी कुछ धाक जम गई थी। दूसरे बच्चों को मैं गबरू के नाम से उन्हें डरा भी देता था। इतनी समझ नहीं थी, फिर भी १५० घरों के छोटे गांव में सबसे परिचित हो गया था। बादामी अम्मा के सात बेटे थे।
ज्यादा कुछ काम तो उनका परिवार करता नहीं था। न तो गांव के दूसरे किसानों की तरह खेती का काम था, न ही कभी भेंस या गाय जैसे पशुओं का पालन करते थे। हरिजन होने के कारण गाय रखने पर तो शायद पूरा गांव उनके विरोध में उतर आता। मेरी अम्मा भी कैसे अक्सर मुझे डांटती थीं, जब मैं बादामी अम्मा को छू लेता। डांटते हुए हाथ के हाथ नहलाने की जिद करतीं, मैं रोने लगता तो पानी के छींटे मारकर मुझे पवित्र करतीं और फिर बादामी से दूर रहने को कहतीं। इसमें क्या रहस्य था, तब समझ नहीं आता था। और हां, एक बात और अक्सर मेरी बड़ी दीदी कहानी सुनातीं कि पहले बादल धरती पर बहुत नीचे थे। एक बार बादामी सिर पर कूड़े का टोकरा उठाए जा रही थीं। बादल कुछ ज्यादा नीचे हो गए, तो बादामी का टोकरा बादलों से अटक गया। बादामी को गुस्सा आया तो झाड़ू से बादल को पीटने लगीं, पिटाई के डर से बादल इतना ऊंचा हो गया कि फिर कभी धरती के नजदीक नहीं आया। कहानी सुनाते ही दीदी हंसने लगती और मैं बादामी अम्मा के इस चमत्कार का लोहा मानता कि बादामी अम्मा से तो बादल भी डरते हैं।
बादामी अम्मा का छठा बेटा सुनील मेरी ही क्लास में था। वह हरिजनों का पहला बच्चा था, जो स्कूल तक पहुंचने में कामयाब हुआ था, वरना उससे बड़े दूसरे बेटे तो सुअर, भेड़-बकरी ही चराते थे। बादामी अम्मा के पांच बेटों की शादी हो गई थी। इस बार जब उनके पांचवें बेटे की शादी हुई तो वो नई-नवेली बहू को लेकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने आई। अब बादामी अम्मा को काम से राहत हुई, अब उन्हें झाड़ू लगाने और कूड़े का टोकरा उठाने से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा शायद बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन मेरी अम्मा बतातीं थीं कि बादामी अम्मा की बड़ी बहुएं मेहनत नहीं करना चाहतीं, इसलिए वे बादामी अम्मा से अलग रहती हैं। ऐसा शायद दस दिन हुआ होगा जब बादामी अम्मा को झाड़ू नहीं लगाना पड़ा। ग्यारहवें दिन जब मैं स्कूल से इंटरवैल के टाइम पर घर पहुंचा तो बादामी अम्मा को फिर झाड़ू पकड़े पाया। आज अम्मा के साथ उनकी पांचवीं बहू भी नहीं थी, साथ था तो गबरू और झाड़ू। अब बादामी अम्मा को फिर से काम करना पड़ रहा था, पांचवा बेटा भी अब उनसे अलग हो गया था। लेकिन हमारे लिए बादामी अम्मा का वही प्यार बरकरार था। शायद बादामी अम्मा को काम करना अच्छा लगता था, इसलिए वह पूरे गांव का झाड़ू निकालने के बाद भी हंसती रहती थीं।
दिन गुजरते गए, मैं गांव के मिडिल स्कूल से पास होकर सैकण्डरी स्कूल में आ गया, चार साल बाद भी हालत जस के तस थे। बादामी अम्मा की दिनचर्या यथावत थी, वह रोज झाड़ू निकालतीं और गावं के हर घर से एक रोटी पातीं। मैं अब भी दिल से उनके नजदीक था। टाइम मिलने पर उनके गबरू के साथ खेलता, बादामी अम्मा अब भी मुझे दुलार करतीं। मेरी अम्मा के साथ अपने बेटे-बहुओं की बातें बतातीं, पर उन्हें शायद कोई गिला नहीं था। इन दिनों एक आश्चर्यजनक परिवर्तन मैं अपनी अम्मा में देख रहा था, अब जब मैं बादामी अम्मा के साथ खेलता तो वह मुझे डांटती नहीं थी। न ही कभी नहलाने की जिद करतीं। अब बादामी अम्मा के हाथ-पैर जवाब देने लग गए थे। कुछ दिन पहले उनके छठे बेटे सुनील, जो आठवीं क्लास तक मेरा क्लासमेट रहा था, की शादी हो गई थी। अब वह भी अपनी बीवी के साथ अलग रहने लग गया था।
पन्द्रह दिन की छुट्टियों के बाद वापस भाई साहब ने जयपुर बुला लिया अब डॉक्टरी में प्रवेश के लिए पीएमटी का एग्जाम देना था। मैं डॉक्टर तो नहीं बन पाया, लेकिन एक समाचार पत्र में संवाददाता हो गया था। गांव का जीवन भी जैसे एक बिसरी पृष्ठभूमि की तरह पीछे छूटने लगा था। पिताजी ने फोन कर गांव आने को कहा। चार दिन की छुट्टी थी। मैं गांव पहुंचा ही था, कि अम्मा ने सूचना दी, बेटा आज सुबह बादामी चल बसी। मैं एकाएक कुछ समझ न सका। लेकिन अभी तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। मेरे पूछने पर अम्मा ने बताया कि सभी बहुएं अलग रह रही थीं, हाथ-पांव भी साथ छोड़ गए थे। पिछले कुछ दिनों से झाड़ू लगाने भी नहीं आई। शायद बीमारी से मौत हो गई। एक बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी। बादामी अम्मा अब सब कष्टों से दूर थीं। मेरे बचपन के गांव का रामराज्य और अयोध्या जैसा अनुभव अब पीछे छूट गया था। वह शायद शीशे की अयोध्या थी, जो अब चकनाचूर हो गई थी।
Wednesday, 5 August 2009
आजकल का 'लव'
Saturday, 18 July 2009
लालू की रेल में घुसपैठ
सबसे बड़ी बात मैनेजमेंट की है। जिस रेल को बड़े-बड़े मैनेजमेंट विशेषज्ञ मुनाफे में लाने की तरकीब नहीं ला पाए उसे हमारे लालूजी ने साबित कर दिखाया। शुरू से ही इसके लिए विलायती प्लानिंग्स की बजाय देशी नुस्खों से काम चलाया। अरे साहब बड़े-बड़े वीवीआईपीज को मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पिलवा दी। मालभाड़े में भले ही आपकी जेब निचोड़ी हो, लेकिन आवाजाही में एक पैसा भी किराया नहीं बढ़ाया। और ऐसा पूरे पांच साल चला। रेल के अन्दर भी छप्पनभोग उपलब्ध कराए। कुली भाईयों की तो जैसे लॉटरी लग गई, लालूजी अवतार की कुछ ऐसी कृपा हुई कि सबको पक्की नौकरी दे दी। रेल दुर्घटनाएं भले ही खूब हुई हों, और होनी को भला टाल भी कौंन सकता है, लेकिन मृतकों के परिजनों को क्या कम सहायता दी। लालूजी के इन मंत्रों की गूंज तो आईआईएम के गुरुओं तक पहुंची इसलिए लालूजी से गेस्ट लेक्चर कराया। और विदेशी हार्वर्ड के मैनेजर्स ने भी अपने लालूजी का लोहा माना और उन्हें अपना गुरू बना लिया।
अब आप बार-बार यह मत कहो कि लालूजी ने रेलवे को अपनी गायों की तरह दुहा। सब फायदे के पद अपने लम्बे-चौड़े कुटुम्ब वालों को दे दिए। सारी रेल योजनाएं बिहार के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गईं। बिहार के गांव-गांव को लोहपथगामिनी से जोड़ दिया और बेचारे हमारे करौली वाले अभी रेल को काले धुंए वाले लम्बे वाहन के अलावा पहचान ही नहीं पाते। रेल के डिब्बे बनाने वाले कारखाने और दूसरे उद्योग संयंत्र भी बिहारियों को दे दिए। दरअसल ये सब बातें आपकी दकियानूसी और छोटी सोच की हैं। अरे भई जब सारा देश रेलवे के फायदे से मंत्रमुग्ध हो तो अपने भाई-भतीजों को नौकरियों में फिट कर देना कौंनसी बुरी बात है। अब रेल के डिब्बों की फैक्ट्री कहीं तो खुलनी ही थीं, बिहार में खोल दीं तो कौंनसा गुनाह कर दिया। और अन्त-पन्त तो रेल ने करौली में भी दर्शन देने ही हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालूजी ने एक से एक योजनाएं बनाईं। पैसा तो हर योजना में खर्च होता है। लागू करने में टाइम तो लगता ही है, अब टाइम कुछ ज्यादा लग गया तो यह तो कोई बात नहीं हुई कि ममताजी फायदा उठा लें। लालूजी की बात से हम एकदम सहमत हैं कि दो मंजिला ट्रेन को चलाओगे कैसे, कहां-कहां ऊपर के बिजली के तार हटाओगे और कहां-कहां सुरंगों को ऊंची करोगे। ऐसे काम अंजाम देने का नुस्खा तो केवल अपने लालूजी को आता है। आपने भले ही न सुना हो, पर हमारे कान इतने कच्चे नहीं हैं, चारे की पूरी आमदनी कैसे राख हो गई, इसकी भनक हमें भी है। इसलिए लालूजी से बड़ा मैनेज कर सकने वाला विशेषज्ञ कोई हो ही नहीं सकता। अब ममतादी बिना बात के ही उन्हें श्वेत पत्र जारी करने की धमकी दें यह अच्छी बात तो नहीं है। हमारी नजर में लालूजी जैसा ईमानदार आदमी अब तक रामराज्य में भी नहीं हुआ होगा, इसलिए ममतादी समझ लीजिए कि वे आपकी गीदड़ भभकियों में आने वाले नहीं ।
कमाई की गणित
Tuesday, 7 July 2009
निवेश का खेल
ऑस्ट्रेलिया में दिनों-दिन हो रही हमारे छात्रों की पिटाई ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के दिल में चिंता का गहरा जख्म बना दिया है। मंत्री साहब की चिंता वाजिब है और अब उन्होंने इसके लिए एक रामबाण इलाज भी खोज लिया है। ऐसा नहीं है की अब हमारे बच्चे कहीं पढ़ नहीं पाएंगे या विदेशी शिक्षा नहीं ले पाएंगे। जनाब की मानें तो अब यहीं पर सारे छात्रों को बुला लिया जाए और छात्र ही क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों को यहीं खुलवा लेंगे। हमारे पास क्या जर- जमीन की कमी है जो विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुदान में नहीं दे सकते! भई आखिर ये हमारे सपूतों के भविष्य का मामला है। और इसकी चिंता मंत्री साहब को नहीं होगी तो क्या हमें होगी। विदेशी संस्थानों को यहाँ बुलाने को पढ़ी- लिखी भाषा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। और जब विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आयेंगे तो हमारी शिक्षा अपने आप विलायत के स्तर की हो जायेगी। वैसे भूलने की बात नहीं है, पर मंत्री साहब के पास बहुत काम होते हैं, इसलिए भूलना बड़ी बात भी नहीं है। साहब आपको याद दिला दें, जब- जब यहाँ विदेशी निवेश हुआ है, हमेशा घाटा ही हुआ। अपनी मूंछ ऊँची रखने वाले राजाओं की आपसी मारकाट में तेमूरलंग, मुग़ल राजाओं का निवेश हुआ तो ऐसी लूटमार मची कि सोने कि चिडिया कहलाने वालोँ के खाने के लाले पड़ गए। फिर गोरों की 'फूट डालो और राज करोÓ की कूटनीति के निवेश को हमने दो सदी तक भुगता। एक कम्पनी के नाम से घुसपैठ बनाकर गोरे साहब ऐसे जमे कि निकलने का नाम ही नहीं लिया, ये तो भला हो अपने गांधी बाबा का, जिन्होंने एक अधझुकी लाठी के सहारे ही फिरंगियों को धूल चटा दी। मियां मुर्शरफ ने भी यहां गजब का निवेश किया। एक तरफ तो साहब आगरा में बातचीत करने आए और दूसरी तरफ करगिल में घुसपैठियों की पूरी फौज घुसा दी। हमारी सरकार भी इतने दिन बाद जागी कि सैकड़ों जवानों की बलि चढ़ गई। चीनी भाईयों के निवेश की चोट तो सीमारेखा की क्षति के रूप में अब भी दुखती है। सेबी ने निवेश की खुली छूट दी तो हमारे दौड़ते सांड की हवा निकल गई और सेंसेक्स 25 से 8 हजार पर गिर गया। और अपनी बातें याद नहीं हैं तो पड़ौसी मुल्क की तरफ निगाह घुमा लें। मियां मुर्शरफ और उनके पूर्वज राष्टï्रपतियों ने अमरीकी अंकल को पाकिस्तान में घुसने की इजाजत क्या दी, अंकलजी लाठी के बल पर जमकर ही बैठ गए, और साहब ऐसा निवेश किया कि अब वायु, जल, थल सब तरह के अड्डे पाक सीमा में बना लिए हैं। अब तो पाकिस्तान इन अड्डों की जमीन पर अपना हक भी नहीं जता सकता। अफगानिस्तान में तालिबान की उत्पत्ति और पतन, नेपाल में माओवादियों की दादागिरी, सब विदेशी निवेश के परिणाम हैं। इसलिए विदेशी निवेश को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझना हर चमकती चीज को सोना समझना है। यूं मंत्री साहब की मर्जी है, वे जब चाहें, जिसे चाहें झण्डाबरदार बनाकर यहां निवेश करा सकते हैं, हम कौंन होते हैं, रोकने वाले। अपन तो साहब खाली-पीली सलाह दे सकते हैं, मानो या न मानो।
yeh alekh न्यूज़ टुडे jaipur के 7 july ke ank me prakashit hua है।