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यदि आपके पास समय की कमी नहीं है और फालतू चीजें पढऩे के शौकीन है तो मुझे झेलने के लिए तैयार हो जाइए


Tuesday, 20 October 2009

मेरे गांव की दिवाली

पता नहीं क्यों, इस बार दिवाली पर घर जाने को लेकर मैं इतना उत्सुक नहीं था। आज से आठ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर आया था, दिवाली को लेकर बड़ा उल्लास रहता था और पन्द्रह दिन पहले से ही मंसूबे बनाने लगता था कि दिवाली पर क्या धमाल करना था। इस बार तो धनतेरस भी जयपुर में ही मना ली थी और लग ही नहीं रहा था कि गांव भी जाना है। गांव यात्रा और दीपावली के बाद वापस लौटने का अनुभव कुछ हद तक यादगार रहा, फिर भी एक कसक सी मन में रह गई है। घर जाने का प्लान ये बना कि मैं और अमित, दोनों एक साथ बाइक से ही घर चलें। रूप चतुर्दशी के रोज अलसुबह हम दोनों उठ गए थे और पौने छह बजे निकलने के लिए तैयार थे। जैसे ही दरवाजे से बाहर झांककर देखा तो पता चला कि इन्द्र देवता खासे महरबान हो गए हैं और आज शायद ही हमें निकले दें। खैर, सवा सात बजे वज्रधारी ने कुछ राहत दी और हम मौका देख झट से खिसक लिए। खिसकाव ज्यादा नहीं हुआ था और कानोता से कोई दो फर्लांग ही जा पाए थे कि फिर देवेन्द्र ने हमें दबोच लिया कि बच्चू आज इतनी आसानी से थोड़े न निकलने देंगे। बारिश का ये आलम अभी रुकने का नाम नहीं ले रहा था, करीब पौने घंटे हम एक पेट्रोल पम्प की छत के नीचे टिके रहे। इस डर से कि कहीं पम्प मालिक इतनी देर ठहरने का कोई चार्ज न लगा दे, मैंने बाइक में २०० रुपए का पेट्रोल डलवा लिया। सूरज की एक हल्की सी किरण शायद कहीं से निकल आई थी, जिससे हम दोनों को उम्मीद बंधी कि आगे शायद मौसम इतना बेमिजाज नहीं है और हम आगे बढ़ सकते हैं। बाइक पर सवार होकर हम निकले, बमुश्किल साढ़े तीन किलोमीटर चले होंगे कि बारिश की बूंदों का वजन दोगुना हो गया और सिर पर टपकती ये बूंदें भी ओले के समान ही पड़ रही थीं। आगे एक उजाड़ सा पेड़ देख मैंने अमित से बाइक रोकने की बात कही, लेकिन अमित भी शायद आज इन्द्रदेव से पंगा लेने के मूड़ में था, उसने रफ्तार जारी रखी लेकिन हम कोई बंशीधर की तरह १६ कलाओं से अवतार लेने वाले भगवान विष्णु के अंश थोड़े ही हैं, जो मेघदेव के मुकाबले में गोवर्धन पर्वत को उठा लेते। बारिश की बूंदों से बेबस हो हमें आगे एक झोंपड़ी में शरण लेनी पड़ी। यहां बीसेक मिनट के वक्फे के बाद संभावना लग रही थी कि अब दौसा तक शायद ही कोई रुकावट आए। लेकिन मेघ देवता कुछ और ही सोचे हुए थे, बस्सी से पांच किलोमीटर पहले ही हमें फिर रोक लिया और इस बार ये ठहराव कोई एक घंटे तक चला। ऑफिस और घर-गांव की बातें करते हुए हम यहां ठहरे रहे। दूसरी चाय के बीच में अमित बोला, गुरुजी इस यात्रा को तो हम ब्लॉग पर लिखेंगे। मैंने कहा हां, यार अब तक की घटनाओं ने एक अच्छे संस्मरण का प्लॉट स्थापित कर दिया है। आगे भी यात्रा अच्छी रही तो दिवाली की इस यात्रा को आफिस पहुंचते ही जरूर लिखूंगा। तीसरी चाय समाप्त हो गई थी, पर धूजणी बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। बारिश के बहाव का सामना करते हुए बाइक चलाने के कारण अमित की हालत अधिक खस्ता थी। पास में ही सिगरेट की दुकान भी थी, अंतिम नवरात्र की शाम से पहले ऐसी स्थिति होती तो मैं चाय की चुस्कियों के साथ सिगरेट के कश भी लगा लेता, लेकिन इस बार मेरे हाथ रुक गए थे। अंतिम नवरात्र को मैंने एक प्रण लिया था और आखिरकार मैंने सिगरेट नहीं पी। इस बार सूरज ने शायद बादलों की ओट से निकलने में कुछ हद तक कामयाबी हासिल कर ली थी, इसलिए हम दोनों फिर से अपनी राह पर चल दिए थे। अमित को बाइक पर सवार होने का मौका क्या मिला, उसने बाइक को शायद स्कॉर्पियो समझ लिया था और बाइक की रेस एक साथ चालीस से बढ़कर पिचानवें तक पहुंच गई थी। मैंने कहा, भैया, ये बाइक है, हवा के झोंके हम दोनों को उड़ा देंगे, बोला गुरुजी आप पकड़कर बैठे रहो, क्योंकि अगले रुकाव तक मैं मेहंदीपुर बालाजी पहुंच जाना चाहता हूं। मैंने कहा, बालाजी की दूरी यहां से ७५ किलोमीटर है, बोला, अभी पचास मिनट में पहुंचते हैं। जनाब मैं तो नौसिखिया ड्राइवर हूं, लेकिन अमित की ड्राइवरी इस बार चरम पर रही। मुझे लगा हालिया बने चार लेन के इस हाइवे का पहला लुत्फ अमित ही उठाने जा रहा है। बाइक की स्पीड का सही अहसास तब हुआ जब एक तेजरफ्तार दौड़ती राजस्थान रोडवेज बस को पीछे छोड़ दिया, एक हुंडई सैंट्रो को ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया और अपनी प्रेमिका के साथ पल्सर पर सवार एक कॉलेज युवक को एक साथ क्रॉस कर तेजी से पीछे छोड़ दिया। अमित की बालाजी पहुंचने की तमन्ना फिर से अधूरी रह गई और इन्द्रदेव ने इस बार हमें दौसा पार करते ही रोक लिया। मैंने तेज सांस ली और हम एक मिष्ठान भंडार में प्याज कचौरी खाने में तल्लीन हो गए। बाहर बारिश हो रही थी और बातचीत का माध्यम फिर से गांव की गलियों और शहर की स्ट्रीट्स के बीच में भटकने लगा। अभी घर पहुंच भी नहीं पाया था कि रास्ते में गांव के दो भाई मिल गए। उन्होंने मेरे पत्रकार होने और अपनी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर विस्तार से चर्चा की। सफर की थकान के बावजूद आधे घंटे तक यह ज्ञानचर्चा होती रही। दोपहर डेढ बजे मैं घर पहुंच गया। पता नहीं कैसे, लेकिन ऐसा हर बार होता था, मैं जब भी गांव जाता था, मेरे छह साल के भतीजे को अपने आप इत्तिला मिल जाती थी कि मैं घर आ रहा हूं और वो आधे रास्ते में ही मुझे पकड़ लेता कि चाचू मेरे लिए क्या लाए हो। इस बार भी उसने रास्ते में ही मुझे घेर लिया और अपनी रिश्वत मांगनी शुरू कर दी। मैंने बैग में से ड्राई फ्रूट्स का पैकेट निकाला और उसे पकड़ाकर अपनी जान छुड़ाई। घर पहुंचा तो मम्मी ने कई जगह से छूकर नब्ज चैक की कि कहीं मैं रास्ते में दुबला तो नहीं हो गया हूं और ढंग से खाना खाता हूं या नहीं। मम्मी ने फिर भी कह ही दिया कि दो महीने में ही कितना दुबला हो गया है, जबकि पिताजी की राय में जन्माष्टमी पर मेरे पिछले गांव के दौरे से दिवाली की अवधि में मेरा वजन घटने की बजाय कुछ बढ़ गया था। दिवाली वाले रोज सुबह से ही घर पर माहौल बड़ा उल्लासजनक था। मेरी साढ़े तीन साल की भतीजी के क्रेकर कलेक्शन में कई तरह की रंगीन फुलझड़ी और लाल पटाखे थे, जिन्हें वो बड़े चाव से मुझे दिखा रही थी। भतीजा इस बात की शिकायत कर रहा था कि उसके कुल १२ रॉकेट में से एक किसने चुरा लिया था। गांव का माहौल भी सदाबहार नजर आ रहा था। आज काम की चिंता कम ही लोगों को थी, लेकिन फिर भी सरसों की बुआई और गेहूं की फसल के लिए सिंचाई की मशक्कत जारी थी। मेरे पिताजी धार्मिक प्रवृत्ति के हैं और उन्होंने सुबह ही कह दिया था कि वे आज श्रीमद्भागवत कथा सुनने के लिए पड़ौस के गांव में जाएंगे। मेरे बड़े भैया उन्हें सुबह ग्यारह बजे पांच किमी दूर उस दूसरे गांव में छोडऩे चले गए थे। हालांकि मम्मी को यह नहीं सुहा रहा था कि वे त्योहार के रोज भी कथा सुनने जाते, लेकिन पिताजी कहां मानने वाले थे। भैया उन्हें दोपहर में कथा में छोड़कर आ गए। दिन में मैं अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला और स्कूल की पढ़ाई से लेकर अब तक की उन्नति की यादें ताजा हुईं। वही हुआ जिसका डर था, पिताजी को लेकर बड़े भैया कथा सुनकर शाम को छह बजे घर लौटे और मम्मी को गुस्सा आ गया कि वे त्योहार के रोज भी देर तक दूसरे गांव में कथा सुनते रहे थे। मेरी मम्मी हर चीज को व्यवस्थित ढंग से पूरा करना चाहती हैं, उन्हें समय पर हर कार्य पूरा चाहिए, इसलिए जब पिताजी देर से लौटे तो इस बात पर दस मिनट तक बहस होती रही कि दिन ढले गांव के मंदिर में अब तक भोग लगा दिया जाना चाहिए था, जो पिताजी की कथा की वजह से लेट हो गया था। बाद में बड़े भैया मंदिर गए और उन्होंने वहां प्रसाद का भोग लगाया। मैंने रोशनी के लिए घर पर मोमबत्तियां जलाईं और भाभी ने घर में घी के दीपक जलाए। अब फुलझड़ी-पटाखे फोडऩे की बारी मेरे भतीजे-भतीजी की थी, जो सुबह से ही इस बात की प्लानिंग कर रहे थे कि किसको कितने पटाखे चलाने हैं। इससे एक घंटे पहले मैंने अपने कुछ दोस्तों को दिवाली के मैसेज किए और अपने कुछ खास परिचित और मित्रों को फोन करके दीपावली की बधाई दी। मेरा मानना है कि मैसेज एक फॉर्मलिटी होती है, लेकिन जिन्हें आप अपना अच्छा मित्र या नजदीकी समझते हैं, उन्हें हमेशा फोन पर बातचीत करनी चाहिए। इसलिए शाम को ठीक पांच बजे जब मैंने अपनी एक फ्रेंड को, जो कहती हैं कि अभी हम फ्रेंड बन पाए हैं या नहीं, इस बारे में निर्णय होना बाकी है, को फोन किया, उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। मैंने सोचा शायद कहीं व्यस्त होंगीं। फोन के रिप्लाई की कुछ मिनटों की प्रतीक्षा घंटों में तब्दील हुई, आखिर मैंने अपनी ओर से पहल करते हुए शाम को सवा आठ बजे उन्हें लक्ष्मी-गणेश का शुभ दीपावली लिखा एक मल्टीमीडिया मैसेज भेज दिया। इस मैसेज के जवाब की प्रतीक्षा में मेरी रात कट गई, हालांकि इन्हीं फ्रेंड का दावा है कि आपके एक नजदीकी का इग्नोरेंस आपको उससे कहीं अधिक दुख देता है, जितना कि उसके द्वारा कहे हुए सौ कठोर शब्द। इन कठोर शब्दों को उन्होंने अपनी भाषा में रूड वड्र्स कहा है। सुबह हुई और इस बार फिर मेरे भतीजे और भतीजी में ठन गई थी। मेरे बड़े भैया खेतों की जुताई पर जाने वाले थे और भतीजे की जिद थी कि वो ट्रैक्टर की सवारी करेगा और हमारे खेत वो खुद ही जोतेगा। मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं छह साल की उम्र का था तो ट्रैक्टर को देखते ही डर जाता था कि पता नहीं कब कुचल देगा और उसी उम्र में मेरा भतीजा ट्रैक्टर की सवारी गांठने की कह रहा था, यह समय में बदलाव का सूचक है। भतीजी की जिद भी ट्रैक्टर में बैठकर खेतों में घूमने की थी। आखिर मामला इस बात पर तय हुआ कि दोनों बच्चों को दो-दो रुपए दे दिए जाएं। भतीजे को रिश्वत की आदत अधिक थी, इसलिए वो पांच रुपए लेकर राजी हुआ। आज का दिन गोवर्धन पूजा का दिन था, इसलिए दोपहर से ही मम्मी और भाभी चार भैंसों के गोबर को लेकर उसे एक पर्वतरूपी मनुष्य का आकार देने में लग गई थीं। साथ में श्रीकृष्ण भगवान और उनके साथी ग्वालों को भी आकार दिया गया, माध्यम था गोबर। शाम हो गई थी और अभी तक मुझे अपनी ऑफिस के कुलीग्स के बहुत कम दिवाली संदेश प्राप्त हुए थे। जबकि मेरे विचार से मैं सभी लोगों को मैसेज या फोन करके बधाई दे चुका था, लेकिन जवाबों की प्रतीक्षा अब तक थी। शाम छह बजे इस बारे में मेरी ऑफिस में मेरी मुंहबोली बहन से बात हुई, उसने कहा कि भैया, कई बार ऐसा हो जाता है। लेकिन मैं इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। क्यों हम कुलीग्स के पास भी एक-दूसरे को विश करने लायक टाइम नहीं था। घर पर बड़े भैया, भाभी, मम्मी, बुआ, पिताजी, बड़ी बहन और बच्चों ने हंसी-खुशी से गोवर्धन पूजा की, मैं भी पूजा में शामिल हुआ, पर उतना प्रसन्न नहीं था।मैं दिवाली मनाकर लौट आया हूं, रास्ते में बहुत सी ऐसी बातें हुईं, जिन्हें शब्दों में लिख पाना कठिन है। इस बार की दिवाली बहुत अच्छी रही, मैंने अच्छे से मनाई, पर फिर भी कुछ कसक सी बाकी रह गई। अफसोस, मेरी दूरियां भगवान श्रीराम के प्रयासों के बावजूद फना नहीं हो सकीं।

Thursday, 15 October 2009

आगमन

चौ. कोऊ कहे आए दशरथनंदन, विप्रजनों ने प्रवचन दीन्हे।
जिन के अकुलाहट है भारी, तीन घड़ी तक कुछ नहीं कीन्हे।।
चौ. नगर द्वार आए जन-जन प्रभु राह तके और कछु नहीं दीखे।
सब ही बने गुरु इक-दूजे, अब आएंगे राम और सीते।।
चौ. दूर देखि उड़ती पग धूलि, मात् संग आए शत्रुघ्न।
भ्रात भरत की गति नहीं उज्ज्वल, बिसरे सब मात्-बांधवजन।।
चौ. नयन भरे जल, दरसन इच्छुक, प्रभु कैसे हों दरस तुम्हारे।
मो सम कौंन कृतघ्न दुनिया में, मोसे अच्छे लखन प्यारे।।
चौ. मंद गति, दीपक से उज्ज्वल, लखन संग आए त्रिपुरारी।
पीछे सीता और कपीश्वर, अवधजनों की भीड़ है भारी।।
चौ. चंचल नयन, गात कोमल और सिर पर जटा-जूट है भारी।
चौदह बरस बाद अवधीश्वर, झलक देख हर्षे नर-नारी।।
चौ. ज्यों पहुंचे प्रभु नगर द्वार पे, आशीर्वचन दियो कैकेई मां।
गुरू वशिष्ठ ने वचन सुनाए, सबसे गले मिले प्रभु कर्मा।।
सो. सब प्रसन्न नर-नारि, हर्षित मन दीपक जले।
अवध भाग गए जाग, भ्रात प्रेम की ये कथा।।

यदि आप उपरोक्त चौपाई और सोरठा का सारांश समझ गए हैं तो नीचे लिखी पंक्तियों पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, ये चौपाईयां रामायण या किसी अन्य धर्मग्रन्थ से नहीं ली गई हैं। इन चौपाईयों का लेखन मैंने अपनी अल्पबुद्धि से किया है। यदि किसी बंधुजन को कुछ गलत लगे और सुझाव देना चाहें तो स्वागत है।

अनुवाद: अयोध्या में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि के बाद वापस लौटने की खबर है। इससे लोग प्रसन्न हैं और अकुलाए हुए हैं। कई लोग तो अपना घरेलू कार्य छोड़े तीन प्रहर से प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ब्राह्मण जन लोगों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। सारे नगरवासी द्वार पर इकट्ठे हो गए हैं लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। प्रभु श्रीराम के आगमन के बारे में अटकलें लगाते हुए सब एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं और समझा रहे हैं कि प्रभु श्रीराम सीता और लक्ष्मण समेत जल्द ही यहां आएंगे। पैरों से उडऩे वाली रेत को देखकर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न तीनों माताओं को लेकर नगर द्वार पर पहुंचे। लेकिन भ्राता भरत की स्थिति अच्छी नहीं है। वे अभी भी श्रीराम के वनवास जाने के लिए खुद को उत्तरदायी मान रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें ध्यान ही नहीं है कि उनके आस-पास कौंन खड़ा है, वे केवल बड़े भाई राम के आगमन की राह तक रहे हैं। उनके नयनों में जल भरा हुआ है और उदास से खड़े भरत की प्रबल इच्छा है कि उन्हें जल्द से जल्द भगवान श्रीराम के दर्शन हो जाएं। वे मन में विचार कर रहे हैं कि मेरे समान कृतघ्न इस दुनिया में कौंन है। मुझसे अच्छा तो छोटा भाई लक्ष्मण है, जिसे चौदह वर्ष तक भैया की सेवा का मौका मिला है।इसी समय धीमे-धीमे चलते हुए प्रभु श्रीराम, जिनके चेहरे की आभा चारों ओर दीपक की रोशनी के समान फैली हुई है। लक्ष्मण और सीता समेत नगर द्वार पर पहुंचे। उनके पीछे ही वानर राजा सुग्रीव, हनुमान और बहुत सारे नगरवासी हो लिए हैं।चंचल नयनों वाले प्रभु श्रीराम जिनकी त्वचा अत्यन्त कोमल है, लेकिन सिर पर उनके अभी भी जटाएं लिपटी हुई हैं। लेकिन अयोध्यापति श्रीराम की चौदह वर्ष बाद झलक देखकर अयोध्या का हर नर-नारी प्रसन्न है और प्रभु श्रीराम की जय-जयकार कर रहा है।प्रभु श्रीराम जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे, सबसे पहले उन्होंने माता कैकेई के चरण छुए और उन्होंने श्रीराम को आर्शीवाद दिया। गुरू वशिष्ठ का आर्शीवाद लेकर प्रभु श्रीराम ने बहुत सारे नगरवासियों को भी गले लगाया।प्रसन्न मनों से अपने घर लौट रहे नगरवासियों ने घर-घर में दीपक जलाए, जिससे पूरी अयोध्या रोशन हो गई। दूसरी ओर भगवान श्रीराम और भरत के देर तक हुए मिलाप ने दो भाईयों के प्रेम की कथा कही, जिसे देखकर लगा कि अब सही मायनों में अयोध्या का भाग्योदय हुआ है।

Tuesday, 6 October 2009

धवन साहब आप बोर नहीं होते ?

वे फिल्म बनाए चले जा रहे हैं और हमारी मजबूरी यह है कि हम फिल्म नहीं देखें तो टाइम कैसे पास हो। दिवाली की छुट्टियां होने ही वाली हैं ऐसे में सिनेमाघरों में लम्बे समय बाद डेविड धवन की फिल्म लगी है डू नॉट डिस्टर्ब। फिल्म लग ही गई है, तो देखना भी बनता है, नहीं तो मीमांसा कैसे करेंगे। इस दशक के बीच में जब तक गोविन्दा और धवन साहब के बीच सुलह नहीं हुई थी और झगड़ा कांटे की टक्कर का था, तो दर्शक बड़े फायदे में रहे। प्रियदर्शन साहब ने डू नॉट डिस्टर्ब देख रहे मेरी बगल वाली सीट पर बैठे भाई साहब की तरह किसी को बड़ी वल्गर फिल्म है,कहने का मौका नहीं दिया। और दूसरे उनकी फिल्में सार्थक और सहज हास्य की कॉमेडी फिल्मों के लिए हमेशा याद की जाएंगी। बात चाहे हेराफेरी, चुप चुपके, हंगामा जैसी शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों की हो या ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी मालामाल वीकली और हलचल जैसी फिल्मों की। हर जगह प्रियन साहब ने अपनी छाप छोड़ी और एक अपने धवन साहब हैं, जो द्विअर्थी और बेतुके संवाद एवं भद्दे दृश्यों के जरिए फिल्म को हिट कराना चाहते हैं। राजपाल यादव और रणवीर शौरी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों को केवल चुनिंदा दृश्यों तक सीमित कर दिया गया है। एक अमीर बिगड़ैल के किरदार में आए गोविन्दा अपनी पत्नी से खुश नहीं हैं और एक हाई-फाई मॉडल का हाथ थामना चाहते हैं। पत्नी के किरदार में सुष्मिता भी डेढ सयानी हैं और वे पहले ही अपने पति की जलील हरकतों को जानने के लिए अपने दोस्त डिटेक्टिव को लगा चुकी हैं। फिल्म के दृश्यों को देखकर लगता है, जैसे जबरदस्ती रबड़ की मांनिद खींचा जा रहा हो। त्रिकोण में फंसते हैं रितेश देखमुख, जो अमीर गोविन्दा की गलतियों को छुपाने के एवज में अपनी सातवीं पीढ़ी तक के खानपान का इंतजाम कर लेना चाहते हैं। आधारहीन विषय को लेकर लिखी गई कहानी, अपने सही बहाव में नहीं है। ढाई घंटे अवधि की फिल्म में दर्शक की नजरें सही मायनों में पर्दे की तरफ उन्हीं दृश्यों में जाकर टिकती हैं, जब स्क्रीन पर सोहेल खान दिखाई देता है। सोहेल का कुछ मिनटों का आक्रामक रूप अच्छा बन पड़ा है। अभिनय के लिहाज से भी उन्होंने बेहतर प्रयास किया है। सुष्मिता सेन को पत्नी का किरदार थमाकर उनके साथ न्याय किया गया है, अब वे एक्ट्रेस के रोल में जमती भी नहीं हैं। हाई-फाई मॉडल की आयुसीमा से अब लारा दत्ता का पत्ता कट चुका है, इस तरह के रोल में अब बिपासा ही अच्छी लगती हैं, पूरी फिल्म में उनके चेहरे के भावों को देखकर लगता भी नहीं, कि किसी पाठशाला से उन्होंने एक्टिंग के किसी अक्षर की पढ़ाई भी की है। रितेश देशमुख और राजपाल यादव के काम को अच्छा कहा जा सकता है। रणवीर शौरी थिएटर के मंझे हुए कलाकार हैं, लेकिन उन्हें सही रोल नहीं मिल पाया है। फिल्म के गीत-संगीत का पक्ष भी कमजोर ही रहा है। पूरी फिल्म में केवल एक गीत कुछ मिनटों के लिए आपको सही लग सकता है। बेबो नाम का यह गीत भी युवाओं में चचंल किस्म की कुछ विदेशी सोच वाली संतानों को पसंद आ सकता है। फिल्म की शूटिंग की बैकग्राउंड देखकर लगता नहीं कि धवन साहब ने अधिक खर्चा किया होगा। फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ भी नहीं है। मुझे इजाजत मिले और पांच स्टार में से धवन साहब की इस नई फिल्म को अंक देने को कहा जाए तो डेढ से अधिक स्टार देने की हिमाकत नहीं कर सकता। क्योंकि ढाई घंटे की फिल्म में मैंने भी अपना टाइम परदा निहारने में कम अपने मोबाइल पर मैसेजिंग में अधिक बिताया था। इसलिए जिन बंधु-बांधवों ने फिल्म नहीं देखी है, वे अपना टाइम और पैसा बिल्कुल भी खर्च न करें।

Sunday, 4 October 2009

विदेश यात्रा

आज उनकी बांछें खिली हुई थीं। शायद इतनी प्रसन्नता उन्हें तब भी नहीं हुई होगी जब वे शादी के मंडप में सात फेरों को निभाने की प्रक्रिया में उलझे हुए थे। शायद यही शब्द ठीक है, वे बचपन से ही बड़े तेज बुद्धि रहे थे। समय की बर्बादी उन्हें कभी नहीं सुहाती और फेरों की प्रक्रिया में पंडितजी ने कोई दो-ढाई घंटे से ज्यादा ही टाइम ले लिया था। कॉलेज टाइम से पैसे कमाने की ऐसी चाहत लगी कि जब छात्रनेता थे तो चंदे से इकट्ठे हुए पैसों में से साठ फीसदी तो उन्हीं की जेब में आते थे। फिर वे कार्यकर्ता बन गए थे। किसके तबादले को मंत्रीजी से सहमति दिलानी है और किसको ठंडे बस्ते में लगाना है, यह उनके लिए बड़ा आसान था। और अब तो वे विदेश मंत्रालय के मुखिया हो गए थे। विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का रुतबा कम तो नहीं होता।
अभी कल ही सूचना मिली थी कि इसरो वाले वैज्ञानिकों ने चांद पर झंडा गाड़ दिया था। आज एक खुशखबरी उन्हें मिल गई थी कि यहां के वैज्ञानिकों ने जो सूचनाएं जुटाई थीं, उनके कुछ मामलों का अध्ययन नासा के वैज्ञानिकों से कराया जाए और वे इस दल का नेतृत्व करें। मंत्रीजी के शरीर का रोंया रोंया खुशी के मारे कांप रहा था, हाथों-हाथ बीवी को सूचना दी और मायके तक के लोगों के अमरीका जाने की पैकिंग शुरू हो गई। साला तो जाएगा ही, साले की बीवी और उनके बेटे-बेटियों का जाना जरूरी है। आखिर इसरो के वैज्ञानिकों ने नासा के वैज्ञानिकों से कुछ साठगांठ कर ली और यहां की गुप्त बातें वहां के वैज्ञानिकों को बेच दीं तो उन्हें वॉच कौंन करेंगा, मंत्रीजी की बीवी ने सीख दी। आखिर फाइनल हो गया कि तीन वैज्ञानिकों की गैरजिम्मेदराना हरकतों पर नजर रखने के लिए परिवार के कम से कम १३ लोग तो होने ही चाहिएं।
मंत्रीजी विमान में चढऩे को तैयार हो गए थे। उनके साथ कुल १३ लोगों का लवाजमा था। बेटे-बेटियों समेत ६ लोग तो वे ही थे, बाकी बीवी के मायके और खुद के घर के लोग थे। तीन वैज्ञानिक भी थे, एक के सिर और दाढ़ी के बाल ऐसे बढ़े हुए थे, जैसे वर्षोंं से शेविंग के लिए समय ही नहीं मिला हो। मंत्रीजी की बड़ी बेटी ने नाक सिकोड़ी, नॉनसेंस, कैसे भालू की तरह लग रहा है। साथ में छोटी बेटी भी मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी थी। वैज्ञानिकों की टोली में एक के साथ उनकी वाइफ भी थीं। अब मंत्रीजी की भोंहें टेढ़ी हो गई थी। डॉ. अय्यर, क्या हम किसी हनीमून पर जा रहे हैं। आपको पता है एक आदमी के अमरीका जाने पर कितना खर्चा होता है। आप क्या सरकारी पैसे को फिजूल का समझते हैं जो आपकी वाइफ पर खर्च दिया जाए। आपने शायद सुना नहीं सोनियाजी और उनके बेटे राहुल खर्चा बचाने के लिए कैटल क्लास में यात्रा कर रहे हैं। हम भी इकोनॉमी क्लास में टिकिट्स बुक करा रहे थे, पर पीए ने गलती से बिजनेस क्लास की टिकिट्स ले ली हैं।
डॉ. अय्यर के लिए यह अनुभव कुछ अटपटा था। वह देख रहे थे नेताजी के १३ सदस्यीय परिवार को। और उन तीन वैज्ञानिकों के साथ केवल उनकी एक पत्नी थी। लेकिन सर, मैं अपनी पत्नी का खर्चा खुद उठा लूंगा। फिर भी, नेताजी का पारा १०४ फॉरेनहाइट पर चढ़ गया था। आप वहां पर हनीमून मनाएंगे या नासा साइंटिस्ट्स के साथ रिसर्च पर ध्यान देंगे। बात बस बढऩे वाली थी कि डॉ. अय्यर की वाइफ ने हस्तक्षेप किया और अपने वापस लौटने की बात कही। डॉ. अय्यर नाखुश थे। जब डॉ. अय्यर की वाइफ वापस चलीं गईं, तो मंत्रीजी की अटकी सांस दुबारा वापस लौटी। मंत्रीजी अब पीए और अपने कुनबे समेत अमरीकन एयरलाइंस की फ्लाइट में बिजनेस क्लास की सीटों पर सवार हो गए थे। मंत्रीजी के साले के बेटे-बेटी सीटों पर लेटने का अभ्यास कर रहे थे, ऐसी सीट शायद उन्होंने पहली बार देखी थी, जिस पर बैठ सकते हैं और सोने का प्रयास भी।
मंत्रीजी की अमरीका यात्रा सफल रही। इसरो के चंद्रयान के नतीजे बड़े सुखद रहे थे। वास्तव में चंद्रयान ने ऐसी तस्वीरें जुटाई थीं, जो नासा के वैज्ञानिकों के लिए भी अब तक अजूबा रही थीं। मंत्रीजी दो हफ्तों के बिजी शेड्यूल के बाद वापस वतन लौटे तो उनका फूलमालाओं से स्वागत किया गया। हर किसी की माला मंत्रीजी और उनकी पत्नी की ओर मुड़ रही थी। मंत्रीजी के बच्चे और साली-सलहज की किस्मत भी चरम पर थी, इसलिए दो-तीन मालाएं उनके गले में भी पड़ गई थीं। रिसर्च वर्क से थके-मांदे वैज्ञानिक उपेक्षित से एक कोने में खड़े थे। उनकी इस हालत पर मंत्रीजी को तरस आ गया था, इसलिए आखिर में बची दो मालाएं तीन में से दो वैज्ञानिकों के गले में भी डलवा दीं। अगले दिन अखबारों में मंत्रीजी की बड़ी सी तस्वीर भी छपी थी और थे उनकी अमरीका यात्रा की सफलता के किस्से। वैज्ञानिकों की तस्वीर भी थी, इन्सैट में लगाई गई थी, छोटी सी, लिखा था इसरो के सफल वैज्ञानिक।