Tuesday, 20 October 2009
मेरे गांव की दिवाली
Thursday, 15 October 2009
आगमन
जिन के अकुलाहट है भारी, तीन घड़ी तक कुछ नहीं कीन्हे।।
चौ. नगर द्वार आए जन-जन प्रभु राह तके और कछु नहीं दीखे।
सब ही बने गुरु इक-दूजे, अब आएंगे राम और सीते।।
चौ. दूर देखि उड़ती पग धूलि, मात् संग आए शत्रुघ्न।
भ्रात भरत की गति नहीं उज्ज्वल, बिसरे सब मात्-बांधवजन।।
चौ. नयन भरे जल, दरसन इच्छुक, प्रभु कैसे हों दरस तुम्हारे।
मो सम कौंन कृतघ्न दुनिया में, मोसे अच्छे लखन प्यारे।।
चौ. मंद गति, दीपक से उज्ज्वल, लखन संग आए त्रिपुरारी।
पीछे सीता और कपीश्वर, अवधजनों की भीड़ है भारी।।
चौ. चंचल नयन, गात कोमल और सिर पर जटा-जूट है भारी।
चौदह बरस बाद अवधीश्वर, झलक देख हर्षे नर-नारी।।
चौ. ज्यों पहुंचे प्रभु नगर द्वार पे, आशीर्वचन दियो कैकेई मां।
गुरू वशिष्ठ ने वचन सुनाए, सबसे गले मिले प्रभु कर्मा।।
सो. सब प्रसन्न नर-नारि, हर्षित मन दीपक जले।
अवध भाग गए जाग, भ्रात प्रेम की ये कथा।।
यदि आप उपरोक्त चौपाई और सोरठा का सारांश समझ गए हैं तो नीचे लिखी पंक्तियों पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, ये चौपाईयां रामायण या किसी अन्य धर्मग्रन्थ से नहीं ली गई हैं। इन चौपाईयों का लेखन मैंने अपनी अल्पबुद्धि से किया है। यदि किसी बंधुजन को कुछ गलत लगे और सुझाव देना चाहें तो स्वागत है।
अनुवाद: अयोध्या में भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की अवधि के बाद वापस लौटने की खबर है। इससे लोग प्रसन्न हैं और अकुलाए हुए हैं। कई लोग तो अपना घरेलू कार्य छोड़े तीन प्रहर से प्रभु श्रीराम के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ब्राह्मण जन लोगों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास कर रहे हैं। सारे नगरवासी द्वार पर इकट्ठे हो गए हैं लेकिन उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। प्रभु श्रीराम के आगमन के बारे में अटकलें लगाते हुए सब एक दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं और समझा रहे हैं कि प्रभु श्रीराम सीता और लक्ष्मण समेत जल्द ही यहां आएंगे। पैरों से उडऩे वाली रेत को देखकर सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न तीनों माताओं को लेकर नगर द्वार पर पहुंचे। लेकिन भ्राता भरत की स्थिति अच्छी नहीं है। वे अभी भी श्रीराम के वनवास जाने के लिए खुद को उत्तरदायी मान रहे हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि उन्हें ध्यान ही नहीं है कि उनके आस-पास कौंन खड़ा है, वे केवल बड़े भाई राम के आगमन की राह तक रहे हैं। उनके नयनों में जल भरा हुआ है और उदास से खड़े भरत की प्रबल इच्छा है कि उन्हें जल्द से जल्द भगवान श्रीराम के दर्शन हो जाएं। वे मन में विचार कर रहे हैं कि मेरे समान कृतघ्न इस दुनिया में कौंन है। मुझसे अच्छा तो छोटा भाई लक्ष्मण है, जिसे चौदह वर्ष तक भैया की सेवा का मौका मिला है।इसी समय धीमे-धीमे चलते हुए प्रभु श्रीराम, जिनके चेहरे की आभा चारों ओर दीपक की रोशनी के समान फैली हुई है। लक्ष्मण और सीता समेत नगर द्वार पर पहुंचे। उनके पीछे ही वानर राजा सुग्रीव, हनुमान और बहुत सारे नगरवासी हो लिए हैं।चंचल नयनों वाले प्रभु श्रीराम जिनकी त्वचा अत्यन्त कोमल है, लेकिन सिर पर उनके अभी भी जटाएं लिपटी हुई हैं। लेकिन अयोध्यापति श्रीराम की चौदह वर्ष बाद झलक देखकर अयोध्या का हर नर-नारी प्रसन्न है और प्रभु श्रीराम की जय-जयकार कर रहा है।प्रभु श्रीराम जैसे ही नगर द्वार पर पहुंचे, सबसे पहले उन्होंने माता कैकेई के चरण छुए और उन्होंने श्रीराम को आर्शीवाद दिया। गुरू वशिष्ठ का आर्शीवाद लेकर प्रभु श्रीराम ने बहुत सारे नगरवासियों को भी गले लगाया।प्रसन्न मनों से अपने घर लौट रहे नगरवासियों ने घर-घर में दीपक जलाए, जिससे पूरी अयोध्या रोशन हो गई। दूसरी ओर भगवान श्रीराम और भरत के देर तक हुए मिलाप ने दो भाईयों के प्रेम की कथा कही, जिसे देखकर लगा कि अब सही मायनों में अयोध्या का भाग्योदय हुआ है।
Tuesday, 6 October 2009
धवन साहब आप बोर नहीं होते ?
Sunday, 4 October 2009
विदेश यात्रा
आज उनकी बांछें खिली हुई थीं। शायद इतनी प्रसन्नता उन्हें तब भी नहीं हुई होगी जब वे शादी के मंडप में सात फेरों को निभाने की प्रक्रिया में उलझे हुए थे। शायद यही शब्द ठीक है, वे बचपन से ही बड़े तेज बुद्धि रहे थे। समय की बर्बादी उन्हें कभी नहीं सुहाती और फेरों की प्रक्रिया में पंडितजी ने कोई दो-ढाई घंटे से ज्यादा ही टाइम ले लिया था। कॉलेज टाइम से पैसे कमाने की ऐसी चाहत लगी कि जब छात्रनेता थे तो चंदे से इकट्ठे हुए पैसों में से साठ फीसदी तो उन्हीं की जेब में आते थे। फिर वे कार्यकर्ता बन गए थे। किसके तबादले को मंत्रीजी से सहमति दिलानी है और किसको ठंडे बस्ते में लगाना है, यह उनके लिए बड़ा आसान था। और अब तो वे विदेश मंत्रालय के मुखिया हो गए थे। विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का रुतबा कम तो नहीं होता।
अभी कल ही सूचना मिली थी कि इसरो वाले वैज्ञानिकों ने चांद पर झंडा गाड़ दिया था। आज एक खुशखबरी उन्हें मिल गई थी कि यहां के वैज्ञानिकों ने जो सूचनाएं जुटाई थीं, उनके कुछ मामलों का अध्ययन नासा के वैज्ञानिकों से कराया जाए और वे इस दल का नेतृत्व करें। मंत्रीजी के शरीर का रोंया रोंया खुशी के मारे कांप रहा था, हाथों-हाथ बीवी को सूचना दी और मायके तक के लोगों के अमरीका जाने की पैकिंग शुरू हो गई। साला तो जाएगा ही, साले की बीवी और उनके बेटे-बेटियों का जाना जरूरी है। आखिर इसरो के वैज्ञानिकों ने नासा के वैज्ञानिकों से कुछ साठगांठ कर ली और यहां की गुप्त बातें वहां के वैज्ञानिकों को बेच दीं तो उन्हें वॉच कौंन करेंगा, मंत्रीजी की बीवी ने सीख दी। आखिर फाइनल हो गया कि तीन वैज्ञानिकों की गैरजिम्मेदराना हरकतों पर नजर रखने के लिए परिवार के कम से कम १३ लोग तो होने ही चाहिएं।
मंत्रीजी विमान में चढऩे को तैयार हो गए थे। उनके साथ कुल १३ लोगों का लवाजमा था। बेटे-बेटियों समेत ६ लोग तो वे ही थे, बाकी बीवी के मायके और खुद के घर के लोग थे। तीन वैज्ञानिक भी थे, एक के सिर और दाढ़ी के बाल ऐसे बढ़े हुए थे, जैसे वर्षोंं से शेविंग के लिए समय ही नहीं मिला हो। मंत्रीजी की बड़ी बेटी ने नाक सिकोड़ी, नॉनसेंस, कैसे भालू की तरह लग रहा है। साथ में छोटी बेटी भी मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी थी। वैज्ञानिकों की टोली में एक के साथ उनकी वाइफ भी थीं। अब मंत्रीजी की भोंहें टेढ़ी हो गई थी। डॉ. अय्यर, क्या हम किसी हनीमून पर जा रहे हैं। आपको पता है एक आदमी के अमरीका जाने पर कितना खर्चा होता है। आप क्या सरकारी पैसे को फिजूल का समझते हैं जो आपकी वाइफ पर खर्च दिया जाए। आपने शायद सुना नहीं सोनियाजी और उनके बेटे राहुल खर्चा बचाने के लिए कैटल क्लास में यात्रा कर रहे हैं। हम भी इकोनॉमी क्लास में टिकिट्स बुक करा रहे थे, पर पीए ने गलती से बिजनेस क्लास की टिकिट्स ले ली हैं।
डॉ. अय्यर के लिए यह अनुभव कुछ अटपटा था। वह देख रहे थे नेताजी के १३ सदस्यीय परिवार को। और उन तीन वैज्ञानिकों के साथ केवल उनकी एक पत्नी थी। लेकिन सर, मैं अपनी पत्नी का खर्चा खुद उठा लूंगा। फिर भी, नेताजी का पारा १०४ फॉरेनहाइट पर चढ़ गया था। आप वहां पर हनीमून मनाएंगे या नासा साइंटिस्ट्स के साथ रिसर्च पर ध्यान देंगे। बात बस बढऩे वाली थी कि डॉ. अय्यर की वाइफ ने हस्तक्षेप किया और अपने वापस लौटने की बात कही। डॉ. अय्यर नाखुश थे। जब डॉ. अय्यर की वाइफ वापस चलीं गईं, तो मंत्रीजी की अटकी सांस दुबारा वापस लौटी। मंत्रीजी अब पीए और अपने कुनबे समेत अमरीकन एयरलाइंस की फ्लाइट में बिजनेस क्लास की सीटों पर सवार हो गए थे। मंत्रीजी के साले के बेटे-बेटी सीटों पर लेटने का अभ्यास कर रहे थे, ऐसी सीट शायद उन्होंने पहली बार देखी थी, जिस पर बैठ सकते हैं और सोने का प्रयास भी।
मंत्रीजी की अमरीका यात्रा सफल रही। इसरो के चंद्रयान के नतीजे बड़े सुखद रहे थे। वास्तव में चंद्रयान ने ऐसी तस्वीरें जुटाई थीं, जो नासा के वैज्ञानिकों के लिए भी अब तक अजूबा रही थीं। मंत्रीजी दो हफ्तों के बिजी शेड्यूल के बाद वापस वतन लौटे तो उनका फूलमालाओं से स्वागत किया गया। हर किसी की माला मंत्रीजी और उनकी पत्नी की ओर मुड़ रही थी। मंत्रीजी के बच्चे और साली-सलहज की किस्मत भी चरम पर थी, इसलिए दो-तीन मालाएं उनके गले में भी पड़ गई थीं। रिसर्च वर्क से थके-मांदे वैज्ञानिक उपेक्षित से एक कोने में खड़े थे। उनकी इस हालत पर मंत्रीजी को तरस आ गया था, इसलिए आखिर में बची दो मालाएं तीन में से दो वैज्ञानिकों के गले में भी डलवा दीं। अगले दिन अखबारों में मंत्रीजी की बड़ी सी तस्वीर भी छपी थी और थे उनकी अमरीका यात्रा की सफलता के किस्से। वैज्ञानिकों की तस्वीर भी थी, इन्सैट में लगाई गई थी, छोटी सी, लिखा था इसरो के सफल वैज्ञानिक।