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Saturday, 18 July 2009

लालू की रेल में घुसपैठ

बात एकदम सही है और वाजिब भी, दो मंजिला ट्रेन चलाने का आइडिया भूतपूर्व मंत्री साहब दें और वाहवाही लूटें ममतादी। इसलिए लालूजी का गुस्सा दिखाना एकदम उचित है। और हो भी क्यों नहीं साहब वर्षोंं से घाटे में चल रही रेल को मुनाफे में इस तरह दिखाया कि आईआईएम और हार्वर्ड मैनजमेंट के तुर्रमखां विशेषज्ञ भी अन्दाजा नहीं लगा पाए कि रेल को इतना फायदा हो कैसे रहा है। अब ममता दीदी भी उनकी तर्ज पर रेल का प्रबंधन करना चाहती हैं, तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन बात एक ही बुरी है कि सारे आइडिए निकले लालूजी की खोपड़ी से और लागू करने की जय-जय ममता उठा रही हैं। लालू यादव ने उन्हें जो खुले चैलेंज दिए हैं उनसे हम तो सौ फीसदी सहमत हैं और प्रतीक्षा करिए आर्टिकल पूरा पढऩे तक आपकी मुंडी भी सहमति में ऊपर-नीचे हिलने लगेगी।
सबसे बड़ी बात मैनेजमेंट की है। जिस रेल को बड़े-बड़े मैनेजमेंट विशेषज्ञ मुनाफे में लाने की तरकीब नहीं ला पाए उसे हमारे लालूजी ने साबित कर दिखाया। शुरू से ही इसके लिए विलायती प्लानिंग्स की बजाय देशी नुस्खों से काम चलाया। अरे साहब बड़े-बड़े वीवीआईपीज को मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पिलवा दी। मालभाड़े में भले ही आपकी जेब निचोड़ी हो, लेकिन आवाजाही में एक पैसा भी किराया नहीं बढ़ाया। और ऐसा पूरे पांच साल चला। रेल के अन्दर भी छप्पनभोग उपलब्ध कराए। कुली भाईयों की तो जैसे लॉटरी लग गई, लालूजी अवतार की कुछ ऐसी कृपा हुई कि सबको पक्की नौकरी दे दी। रेल दुर्घटनाएं भले ही खूब हुई हों, और होनी को भला टाल भी कौंन सकता है, लेकिन मृतकों के परिजनों को क्या कम सहायता दी। लालूजी के इन मंत्रों की गूंज तो आईआईएम के गुरुओं तक पहुंची इसलिए लालूजी से गेस्ट लेक्चर कराया। और विदेशी हार्वर्ड के मैनेजर्स ने भी अपने लालूजी का लोहा माना और उन्हें अपना गुरू बना लिया।
अब आप बार-बार यह मत कहो कि लालूजी ने रेलवे को अपनी गायों की तरह दुहा। सब फायदे के पद अपने लम्बे-चौड़े कुटुम्ब वालों को दे दिए। सारी रेल योजनाएं बिहार के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गईं। बिहार के गांव-गांव को लोहपथगामिनी से जोड़ दिया और बेचारे हमारे करौली वाले अभी रेल को काले धुंए वाले लम्बे वाहन के अलावा पहचान ही नहीं पाते। रेल के डिब्बे बनाने वाले कारखाने और दूसरे उद्योग संयंत्र भी बिहारियों को दे दिए। दरअसल ये सब बातें आपकी दकियानूसी और छोटी सोच की हैं। अरे भई जब सारा देश रेलवे के फायदे से मंत्रमुग्ध हो तो अपने भाई-भतीजों को नौकरियों में फिट कर देना कौंनसी बुरी बात है। अब रेल के डिब्बों की फैक्ट्री कहीं तो खुलनी ही थीं, बिहार में खोल दीं तो कौंनसा गुनाह कर दिया। और अन्त-पन्त तो रेल ने करौली में भी दर्शन देने ही हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालूजी ने एक से एक योजनाएं बनाईं। पैसा तो हर योजना में खर्च होता है। लागू करने में टाइम तो लगता ही है, अब टाइम कुछ ज्यादा लग गया तो यह तो कोई बात नहीं हुई कि ममताजी फायदा उठा लें। लालूजी की बात से हम एकदम सहमत हैं कि दो मंजिला ट्रेन को चलाओगे कैसे, कहां-कहां ऊपर के बिजली के तार हटाओगे और कहां-कहां सुरंगों को ऊंची करोगे। ऐसे काम अंजाम देने का नुस्खा तो केवल अपने लालूजी को आता है। आपने भले ही न सुना हो, पर हमारे कान इतने कच्चे नहीं हैं, चारे की पूरी आमदनी कैसे राख हो गई, इसकी भनक हमें भी है। इसलिए लालूजी से बड़ा मैनेज कर सकने वाला विशेषज्ञ कोई हो ही नहीं सकता। अब ममतादी बिना बात के ही उन्हें श्वेत पत्र जारी करने की धमकी दें यह अच्छी बात तो नहीं है। हमारी नजर में लालूजी जैसा ईमानदार आदमी अब तक रामराज्य में भी नहीं हुआ होगा, इसलिए ममतादी समझ लीजिए कि वे आपकी गीदड़ भभकियों में आने वाले नहीं ।

कमाई की गणित

लो जी साब ये तो कमाल हो गया! हमारे मीडिया वाले जिस तरह सचिन और माही की कमाई पर निगाह गड़ाए बैठे रहते हैं। और हर दस-पन्द्रह दिन में एक नॉन स्टॉप खबर बना देते हैं, कि बोर्ड फलां खिलाड़ी को इतना पैकेज दे रहा है और फलां खिलाड़ी ने गेम-कम-एड की कमाई से नया रेस्टोरेंट खरीद लिया है। लेकिन कमाई क्या होती है ये तो पहली बार अब पता चला है। आपको भले ही यह सुनकर कोई फर्क नहीं पड़ा हो, लेकिन सच मानिए हमारे होश तो अब तक ठिकाने नहीं हैं। टेनिस में बादशाहत की कुर्सी तक पहुंच चुके फेडरर से हमें तो बहुत जलन हो रही है। जनाब ने एक साल में ही 48 करोड़ की कमाई की है और हमारे धोनी-सचिन आठ नौ करोड़ ही कमा पाते हैं। बापूजी ने खूब समझाया कि बेटा पढ़ाई-लिखाई करके या तो डॉक्टर बन जाना नहीं तो कहीं किसी खेल-वेल में ही लग जाना। हमने भी कोशिश खूब की पर पढ़ाई की मोटी-मोटी किताबों को देखते ही नींद आने लगती। पिताजी खूब कहते पर हमारा मन चन्द्रकांता संतति और प्रेमचंद के ज्ञान खजाने के अलावा कहीं न लगा। साथ में रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाले सस्ते उपन्यासों का भी ऐसा चस्का लगा कि जनाब स्नातक आते-आते हमारी गाड़ी पचास प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाई। खैर गलती हुई और अब हो भी क्या सकता है। पर एक बात आपको बता दें हमारा किस्मत पर अटल विश्वास है, इसलिए जब तकदीक में कलमघसीट बनना लिखा था तो भला होनी को कौंन टाल सकता है।ऐसा नहीं है कि हमने बापू का नाम बिल्कुल ही मिट्टी में मिल जाने दिया। जब डॉक्टरी में दाखिला नहीं मिल पाया तो हमने बापूजी के दूसरे नुस्खे पर अमल करना शुरू कर दिया। रोज सुबह सवाई मान सिंह स्टेडियम में जाते और क्रिकेट की प्रैक्टिस करते। अब आप यह कहेंगे कि हमने क्रिकेट में जाने की ही क्यों सोची, तो आपको बता दें कि टीवी पर मैच आते वक्त आदमी खाने का कौर निगलना भूल सकता है पर नजर टीवी से इतर नहीं फिरा सकता। तो हम रोज एसएमएस स्टेडियम जाते। पर ससुर किस्मत ने यहां भी दगा दिया, जब कोच साहब के सामने हमने पहली बार खेला तो गेंद नजदीक आते-आते हमारी आंखें मिच गईं और गेंद ने हमारी विकेट उड़ा दी। गेंद के डर से हमारी आंख बंद होने को कोच साहब ने ताक लिया और अगले रोज से न आने की हिदायत दी।हिम्मत हमने यहां भी नहीं हारी और पांच फुट तीन इंच की अपनी कम लम्बाई बढ़ाने के लिए दोस्त की सलाह पर जिम जाना शुरू कर दिया। क्रिकेट खेलने के पीछे एक वजह यह भी थी कि साहब इतनी कम लम्बाई पर हमें और कहीं तो दाखिला मिल नहीं सकता था। खैर खुद को दूसरा सचिन समझने की भूल हमारी खत्म हुई और हमने जिम में कदम रखा। जिम वाले भाई साहब ने पहले दिन ही धमका दिया कि लम्बाई तो बढ़ेगी नहीं, सीना बढ़ाने-बाजू फुलाने के चक्कर में लम्बाई कम होने के चांस अधिक हैं। तो साहब यहां से भी तौबा बुली और हम इस दुनिया में आ गए। आज आपके सामने व्यथा कह दी तो दिल हल्का हो गया। हालांकि बापूजी ने यहां भी हमारी नालायकी समझी और कहा कि हमने जानबूझकर क्रिकेट में नाम रोशन नहीं किया। जब कलमघसीट नौकरी में कदम रख रहे थे तो फिर बापूजी ने नई सीख दी, बेटा प्रेमचन्द और दूसरे लेखक, पत्रकार अपनी कमाई से बच्चे नहीं पाल पाते। पर लेखकी का शौक ऐसा सिर चढ़ा कि अब तक नहीं उतरा। इसलिए रोज कहीं न कहीं कुछ लिखकर अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। आज आपके सामने यह नया तुर्रा छोड़ दिया इसलिए आप अब तक हमें भुगत रहे हैं। खुदा खैर करे!

Tuesday, 7 July 2009

निवेश का खेल

ऑस्ट्रेलिया में दिनों-दिन हो रही हमारे छात्रों की पिटाई ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के दिल में चिंता का गहरा जख्म बना दिया है। मंत्री साहब की चिंता वाजिब है और अब उन्होंने इसके लिए एक रामबाण इलाज भी खोज लिया है। ऐसा नहीं है की अब हमारे बच्चे कहीं पढ़ नहीं पाएंगे या विदेशी शिक्षा नहीं ले पाएंगे। जनाब की मानें तो अब यहीं पर सारे छात्रों को बुला लिया जाए और छात्र ही क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों को यहीं खुलवा लेंगे। हमारे पास क्या जर- जमीन की कमी है जो विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुदान में नहीं दे सकते! भई आखिर ये हमारे सपूतों के भविष्य का मामला है। और इसकी चिंता मंत्री साहब को नहीं होगी तो क्या हमें होगी। विदेशी संस्थानों को यहाँ बुलाने को पढ़ी- लिखी भाषा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। और जब विदेशी विश्वविद्यालय यहाँ आयेंगे तो हमारी शिक्षा अपने आप विलायत के स्तर की हो जायेगी। वैसे भूलने की बात नहीं है, पर मंत्री साहब के पास बहुत काम होते हैं, इसलिए भूलना बड़ी बात भी नहीं है। साहब आपको याद दिला दें, जब- जब यहाँ विदेशी निवेश हुआ है, हमेशा घाटा ही हुआ। अपनी मूंछ ऊँची रखने वाले राजाओं की आपसी मारकाट में तेमूरलंग, मुग़ल राजाओं का निवेश हुआ तो ऐसी लूटमार मची कि सोने कि चिडिया कहलाने वालोँ के खाने के लाले पड़ गए। फिर गोरों की 'फूट डालो और राज करोÓ की कूटनीति के निवेश को हमने दो सदी तक भुगता। एक कम्पनी के नाम से घुसपैठ बनाकर गोरे साहब ऐसे जमे कि निकलने का नाम ही नहीं लिया, ये तो भला हो अपने गांधी बाबा का, जिन्होंने एक अधझुकी लाठी के सहारे ही फिरंगियों को धूल चटा दी। मियां मुर्शरफ ने भी यहां गजब का निवेश किया। एक तरफ तो साहब आगरा में बातचीत करने आए और दूसरी तरफ करगिल में घुसपैठियों की पूरी फौज घुसा दी। हमारी सरकार भी इतने दिन बाद जागी कि सैकड़ों जवानों की बलि चढ़ गई। चीनी भाईयों के निवेश की चोट तो सीमारेखा की क्षति के रूप में अब भी दुखती है। सेबी ने निवेश की खुली छूट दी तो हमारे दौड़ते सांड की हवा निकल गई और सेंसेक्स 25 से 8 हजार पर गिर गया। और अपनी बातें याद नहीं हैं तो पड़ौसी मुल्क की तरफ निगाह घुमा लें। मियां मुर्शरफ और उनके पूर्वज राष्टï्रपतियों ने अमरीकी अंकल को पाकिस्तान में घुसने की इजाजत क्या दी, अंकलजी लाठी के बल पर जमकर ही बैठ गए, और साहब ऐसा निवेश किया कि अब वायु, जल, थल सब तरह के अड्डे पाक सीमा में बना लिए हैं। अब तो पाकिस्तान इन अड्डों की जमीन पर अपना हक भी नहीं जता सकता। अफगानिस्तान में तालिबान की उत्पत्ति और पतन, नेपाल में माओवादियों की दादागिरी, सब विदेशी निवेश के परिणाम हैं। इसलिए विदेशी निवेश को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझना हर चमकती चीज को सोना समझना है। यूं मंत्री साहब की मर्जी है, वे जब चाहें, जिसे चाहें झण्डाबरदार बनाकर यहां निवेश करा सकते हैं, हम कौंन होते हैं, रोकने वाले। अपन तो साहब खाली-पीली सलाह दे सकते हैं, मानो या न मानो।

yeh alekh न्यूज़ टुडे jaipur के 7 july ke ank me prakashit hua है।