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Saturday, 16 October 2010

प्रोटोकॉल की सीमा में बंधा मौन ‘आक्रोश’

फिल्म समीक्षा: आक्रोश

बिहार-झारखंड के ग्रामीण परिवेश में आज भी दिल्ली की सरकार के समानांतर एक और ही सरकार चलती है, इसमें सरकारी अफसर हैं, लेकिन वे सरकारी राज को मजबूत नहीं बनाते। दलित और सवर्ण परिवार के युवक-युवती के बीच पनपी प्रेम कथा में बाहुबली के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़े हैं सांसद, पुलिस अधीक्षक और कलक्टर समेत तमाम सरकारी अमला।
फिल्म में निर्देशक ने आक्रोश के जरिए इज्जत के नाम पर प्रेमियों की हत्या के संवेदनशील मुद्दे को तो उठाया ही है, साथ ही सही मायनों में इन इलाकों के हालतों को भी प्रदर्शित किया है। हेराफेरी, हंगामा और मालामाल वीकली जैसी सफल कॉमेडी फिल्मों की परम्परा को कायम रखने में विफल रहे प्रियदर्शन एक बार फिर अपने पुराने रंग में लौटे हैं, जिनमें विरासत और कांजीवरम जैसी फिल्मों का प्रभावी निर्देशन झलकता है। फिल्म की कहानी दिल्ली के मेडिकल कॉलेज से गायब हुए तीन छात्रों की है, जिनका दो महीने तक पता नहीं चलने पर सीबीआई को जांच दी जाती है। मेडिकल छात्रों की खोज के लिए आए सीबीआई अफसर सिद्धांत चतुर्वेदी (अक्षय खन्ना) और प्रताप (अजय देवगन) झांझर पहुंचते हैं, तो कोई जुबान खोलने को तैयार नहीं होता और वे जिससे भी बातचीत करना चाहते हैं, उसे बाहुबली और त्रिशूल सेना के गुंडे जीवित नहीं छोड़ते। अत्याचार के खिलाफ जब जनता एकजुट होती है तो उसे बाहुबली के गुंडों की आगजनी के साथ ही पुलिस के बर्बरतापूर्णलाठीचार्ज का सामना करना पड़ता है। खोजबीन में पता चलता है कि इस घटना के पीछे मेडिकल छात्र दीनू और बाहुबली ठाकुर की बेटी के बीच की प्रेमकथा है। तीनों मेडिकल छात्रों की हत्या का केस खुलता है तो बाहुबली ठाकुर, पुलिस अधीक्षक और सांसद कठघरे में होते हैं, जिन्हें सीबीआई अफसर सिद्धांत प्रोटोकॉल की सीमा में रहते हुए शूट करवा देता है।

पूरी फिल्म में अजय देवगन छाए रहे हैं और उनका अभिनय भी काबिलेतारीफ है। अक्षय खन्ना का अभिनय सहज है, बिपाशा मध्यांतर बाद ही फिल्म में दिखी हैं और उनका रोल छोटा है। परेश रावल दर्शकों की तारीफ बटोरने में कामयाब रहे हैं। प्रियदर्शन की कॉमेडी टीम यहां भी शामिल है, जिसने कॉमेडी से इतर यहां गंभीर रोल अदा किए हैं।

फिल्म में प्रियर्दशन का निर्देशन और अरुण कुमार की एडिटिंग उम्दा है। गीत संगीत बहुत रोचक नहीं बन पड़े हैं, आइटम सॉन्ग पसंद किया जा सकता है। कुलमिलाकर इसे प्रियदर्शन की एक बेहतर वापसी माना जा सकता है।

Wednesday, 6 October 2010

फिल्म बनी है, सिनेमाघरों में लगी है, इसलिए देखना मजबूरी है

आप कह सकते हैं कि यह तो आपके मर्जी पर मुनहसर है कि आप फिल्म देखें या नहीं, लेकिन खबरनवीस होते हुए एक आदत यह भी लगी हुई है कि हर सप्ताह जैसे ही नई फिल्म का नाम सुना, कि चल दिए थिएटर की ओर। अंग्रेजीदां संस्कृति के इन थिएटर्स में घुसने के ही १६० से २०० रुपए तक लग जाते हैं, ऐसे में यदि फिल्म का लब्बोलुआब ही समझ न आए तो निर्माता-निर्देशकों को कोसना वाजिब है। अपनी महिला मित्र के संग गलफांस डाले हमारे पड़ौसी सीट पर बैठे साहबान ने एक चौथाई मूवी देखकर ही घोषणा कर दी थी कि फिल्म बकवास है। मेरी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर धारणा बनाने की आदत नहीं है, लेकिन कोई क्या करे, जब फिल्म की कहानी ही समझ से परे हो। इसी हफ्ते आई अंजाना-अंजानी देखने की तमन्ना काफी दिनों से थी, इसकी एक वजह तो यह थी कि नए आए एक्टर्स में रणबीर कपूर कदरन मुझे अधिक पसंद है और दूसरे राजनीति के बाद मैं उसकी एक्टिंग का भी प्रशंसक हो गया हूं। थिएटर में २० मिनट गुजारने पर ही यह खामख्याली हवा हो गई कि फिल्म की कहानी में आगे कुछ ट्विस्ट आएगा।
फिल्म आत्महत्या के बोझिल प्रयास से शुरू होती है और कोई दर्जनभर नाकाम प्रयासों के बाद उसी पर आकर खत्म होती है। फिल्म में हीरो रणबीर कपूर, जिसने एक संघर्षरत बिजनेसमैन आकाश का किरदार निभाया है और कियारा बनी प्रियंका अपने मंगेतर जाएद खान के धोखे से आजिज आ आत्महत्या करना चाहती है। शुरुआती सीन अच्छा बन पड़ा है, लेकिन इसके बाद नए-नए तरीकों से आत्महत्या करने के असफल प्रयास उबाऊ लगते हैं। इसके बाद दोनों एक-दूसरे की विश पूरी करने की प्रक्रिया में अगले बीस दिन खुशी से बिताने की ठानते हैं। कई मोड़ पार करने के बाद आकाश को कियारा से प्यार हो जाता है, लेकिन कियारा के दिल में अभी भी अपने मंगेतर जाएद खान के लिए लगाव है। हर हिन्दी मूवी की तर्ज पर कियारा बीस दिन बाद आत्महत्या वाले न्यूयॉर्क के ब्रिज पर मिलती है। पूरी फिल्म में बोरियत महसूस होती है। एक बार फिर लगा है कि अभी रणबीर को अभिनय से प्रभावित होने वाले दर्शकों को प्रशंसक बनाने में समय लगेगा। राजनीति में उनकी जो परिपक्वता झलकी थी वो यहां सिरे से गायब है और केवल ऐसे दर्शकों को पंसद आ सकते हैं जिनकी उम्र १७ से २४ के बीच है और जो स्कूल या कॉलेज से बाकायदा हर शुक्रवार को बंक मारकर पहुंचे होते हैं और साथ में हर तीन माह में कपड़ों की तरह बदल जाने वाली या वाला मित्र होता है। प्रियंका अपने काम में अच्छी रही हैं। जाएद खान से अभिनय की उम्मीद करना बेमानी है। गीतों में एक ही नगमा गुनगुनाने लायक है, तुझे भुला दिया.. जिसे मोहित चौहान और श्रुति पाठक ने मस्ती भरे लहजे में सूफियाना अंदाज में गाया है। कुलमिलाकर फिल्म को देखने में १८० रुपए खर्चना कतई समझदारी नहीं है और इसे एक चलताऊ फिल्म कहा जा सकता है, जिसमें सिद्धार्थ आनंद का निर्देशन काबिलेतारीफ नहीं कहा जा सकता।