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Friday, 13 November 2009

ये प्रेम कहानी का सुखद अंत है

आज मैं जब सिनेमाहॉल पहुंचा तो हिसाब से मुझे इमरान खान और सोहा अली की तुम मिले मूवी देखनी चाहिए थी। लेकिन इस बार हालात कुछ जुदा थे। नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी के भय और प्रलय के लम्बे-चौड़े पोस्टर देखकर मेरी पिछले तीन रोज से ही इच्छा हो रही थी कि इस बार बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड में किस्मत आजमाई जाए कि कितना मजा आता है। यूं मेरे लिए हॉलीवुड फिल्म देखना कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले तीन माह के अरसे में मैंने कोई हॉलीवुड फिल्म नहीं देखी थी या शायद कोई फिल्म ऐसी नहीं आई थी, जिसके सदके मैं सिनेमाहॉल में बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड फिल्म की अंग्रेजीदा टिकट खिड़की की ओर मुड़ता। फिर एक बात और, कि हालिया जब इमरान खान और शरमाती हुई सोहा अली होटल रामाडा में जयपुर के मीडिया से रूबरू हो रही थीं तो एक मौका हमें भी मिला और हमने भी उनकी एक झलक देख ली, इसलिए आधी उत्सुकता वहीं ढेर हो गई और इस बार हमने हिम्मत दिखाकर पलय-२०१२ का टिकट खरीद लिया। सहीं कहें जनाब, हिंसा के ढेर सारे सीन और धरती में उथल-पुथल की ये घटनाएं हमें सहज कम बनावटी अधिक दिखीं, दूसरे शब्दों में प्रलय का ये नजारा इमेजिनेशन की हदों को पार करने वाला था। वैसे हमारी हिन्दी फिल्मों में इस तरह के दृश्यों की कभी कल्पना भी नहीं की जाती और सैट पर इतना खर्चा करने की बात सुनकर शायद डायरेक्टर-प्रोड्यूसर फिल्म बनाने का इरादा ही मुल्तवी कर दें। इसलिए फिल्म को युवाओं के एक बड़े वर्ग ने सराहा और कहानी की रफ्तार की प्रशंसा की। मैं भी फिल्म में एक के बाद एक बदलते सीन्स और कॉमेडी को देखकर सुखद आश्चर्य महसूस कर रहा था। लेकिन फिर भी ये फिल्म मुझे इतनी अच्छी नहीं लगी, जितनी कि पिछले हफ्ते राजकुमार संतोषी की अजब प्रेम की गजब कहानी लगी थी। इस फिल्म को देखकर पहली नजर में ही कहा जा सकता है कि राजकुमार संतोषी की दर्शकों पर गहरी पकड़ है और वे यह भी जानते हैं कि फिल्म देखने के लिए मल्टीप्लेक्स में केवल ११वीं क्लास से लेकर यूजी फाइनल ईयर के स्टूडेंट ही जाते हैं, जिनके साथ यदि उनकी गर्लफ्रेंड होती है तो वे जरूर पिछली कतार में कोने की सीट कबाड़ते हैं और ऐसे मनचले किशोर युवाओं की संख्या अब कमतर विकसित शहरों में भी बढ़ रही है। निर्जीव पात्र के जरिए पत्रकार को सुनाते हुए कहानी की शुरुआत ही ऐसे हसोड़ सीन से होती है, जहां पांच युवाओं के हैप्पी क्लब का प्रेसिडेंट बिना ब्रेक वाली साइकिल पर सवार है। जो कि एक डाकू को पकड़वाने में सहायक बनता है। प्रेसिडेंट के इस किरदार को रणबीर कपूर ने बड़ी शिद्दत से निभाया है और यह सीधे युवाओं के दिल में उतरता है। कैटरीना कैफ की एंट्री बिल्कुल नेगेटिव तरीके से होती है, जो हैप्पी क्लब के नेक कार्य करने के इरादों से इस कदर प्रभावित होती है कि रणबीर से दोस्ती करना मंजूर कर लेती है। एकतरफा प्यार में डूबे रणबीर के लिए यह बात जन्नत की एक झलक पा लेने से कम नहीं होती। ख्वाबों में डूबा वह हर वो काम करने की कोशिश करता है जो कैटरीना पसंद करे। लिहाजा एक महीने तक शेफ की नौकरी करने पर भी उसे गुरेज नहीं होता। कहानी में ट्विस्ट तब पैदा होता है जब कैटरीना बगैर कुछ बताए गोवा निकल जाती है। यहां सड़क पर पैदा हुई अनाथ कैटरीना को उसके पालने वाले माता-पिता अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए एक अमीर गोवानी के हवाले कर देना चाहते हैं जो उसे अपने साथ शादी नहीं करने पर उसके साथ जबरजिना करने के अपने धृष्ट और घृणित इरादे भी जता देता है। प्यार में नो डिमांड नो कम्प्लेंट का उसूल रखने वाले रणबीर और उसकी मित्र मंडली के सखा ऐन वक्त पर कैटरीना को वहां से सुरक्षित निकाल लाते हैं। एक प्यार करने वाले असली प्रेमी और दोस्त की असली परख यहीं होती है कि वह सबकुछ जानते-बूझते कि कैटरीना उससे प्यार नहीं करती, बल्कि पहले से ही किसी और को चाहती है, फिर भी रिस्क लेकर अपने घर में रखता है। कई रोचक मोड़ पार करने के बाद आखिर में कैटरीना को रणबीर के प्रति अपने प्यार का अहसास होता है।एक अहम बात मैं कहना चाहूंगा कि कैटरीना से एकतरफा प्यार करने वाले रणबीर ने एकबार भी अपनी ओर से प्यार का इजहार ही नहीं किया या फिर हिम्मत ही नहीं हुई। कुछ भी कहेंं, लेकिन एकतरफा प्यार ने आखिर रंग दिखाया और ऐन शादी के मौके पर कैटरीना ने अपने प्रेमी का दामन छोड़ रणबीर को अपना जीवनसाथी कबूल किया। शायद ये असली प्यार का ही असर है। मैं फिल्म की गजब कहानी, हल्के एक्शन, अच्छी कॉमेडी, बेहतर म्यूजिक के बदले इसे पांच में से साढ़े तीन स्टार देना पसंद करूंगा।

Monday, 2 November 2009

कामयाबी का लंदन प्रेम

मैं इस फिल्म को लेकर लम्बे अरसे से उत्सुकता से घिरा हुआ था। हम दिल दे चुके सनम, जिसमें अजय देवगन और सलमान एक साथ आए थे, मुझे बहुत पसंद आई थी। इसलिए इन दोनों अभिनेताओं को एक साथ देखने की लालसा थी और फिर उड़ते-उड़ते यह बात भी कानों में पड़ी थी कि कहानी का प्लॉट बहुत अच्छा है। शुक्रवार को मेरे अवकाश के रोज मुझे ऐनवक्त पर तब ऑफिस बुला लिया गया, जब मैं इस फिल्म का फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने जा रहा था, खिन्नता हुई, लेकिन ऑफिस आना भी आवश्यक था। शुक्रवार का अवकाश मैंने शनिवार को लिया और फिर इस फिल्म को देखने पहुंचा। हर किसी के कहानी कहने का तरीका अलग होता है। विपुल शाह अपनी शैली में पहले हास्य का रंग डालते हैं और फिर कहानी की कसावट के सहारे इसे भावुक बना देते हैं। नमस्ते लंदन के बाद अब लंदन ड्रीम्स इनकी हालिया फिल्म है। शुरुआत में ही बता दें, फिल्म को बहुत अच्छे तरीके से गढ़ा गया है, कहानी यूनिक न हो, लेकिन एक आम भारतीय को पसंद आने वाली है। फिर अजय देवगन का नैसर्गिक गंभीर रोल और सलमान का मस्तमौला अभिनय देखने के आदी दर्शकों को यहां अभिनय की नई ऊंचाईयां देखने को मिलेंगी। फिल्म का संगीत इसे दर्शकों के लिए एक बेहतर फिल्म बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।कहानी अजय देवगन के सपने को लेकर शुरू होती है जो उसने पंजाब के एक छोटे से गांव में देखा था। इस फिल्म को देखकर मुझे एक बात फिर से याद आ गई अधजल गगरी छलकत जाए। भरे हुए मटके में से पानी कभी उछलता नहीं है। इसलिए जो वास्तव में प्रतिभाशाली होते हैं, वे अपने बारे में डींग नहीं हांकते। अजय देवगन, पिता की मृत्यु के बाद अपने गांव के एक चाचा के साथ लंदन आ जाते हैं, मजेदार बात ये भी है कि बचपन से म्यूजिक सीखते हुए वो लंदन की गलियों में जवान हो जाते हैं और जो लंदन पुलिस उन्हें केवल कुछ मिनट फुटपाथ पर गाने की एवज में जेल में डाल देती है, इतने साल तक इल्लिगल रूप से बगैर वीजा के रहने पर एक नोटिस तक जारी नहीं करती। गांव से ही अजय का एक दोस्त है सलमान खान, जो उन्हीं गलियों में रहते हुए अलमस्त नौजवान के रूप में अपने कस्बेवालों को परेशान किए हुए है। फिल्म का ये हिस्सा दर्शकों को पर्याप्त रूप से हंसाने में कामयाब रहा है।एक दोस्त के लिए तो कम से कम ऐसा नहीं होता, लेकिन ईष्र्या की धधकती आग में अजय देवगन अपने उस दोस्त को, जिसने कभी गांव की गलियों में उसके सपने के जज्बे को देखकर अपने बचाए कुछ पैसों से एक बांसुरी खरीदकर उसे भेंट की थी, कई तरह के ड्रग्स, जिनके नाम गिनना भी मुहाल है, सलमान क बॉडी में पहुंचा देता है। सलमान अपने दोस्त की इस दगाबाजी से अनजान है और वह अभी भी अजय को अपने दोस्त से बढ़कर भगवान मानता है। कहानी यहां तक पहुंचती है कि अपने अंतिम शो, जो वेंबली स्टेडियम में हो रहा था, अजय देवगन सलमान के प्रति दर्शकों के प्यार को बर्दाश्त नहीं कर पाता और सच्चाई अपने आप सामने आ जाती है। सलमान का सुखद अभिनय जितना काबिलेतारीफ है, उससे कहीं अधिक प्रशंसा अजय देवगन के अभिनय की की जानी चाहिए। असिन अपने चुलबुले रंग में दर्शकों के सामने हैं और अपनी दूसरी हिन्दी फिल्म में ही बेहतर ढंग से अपनी भूमिका निभाने में सफल रही हैं। यह फिल्म उनके कॅरियर को नई ऊंचाईयां देने में सहायक होगी। वक्त, नमस्ते लंदन के बाद लंदन ड्रीम्स भी कामयाब रहेगी, ऐसी आशा की जा सकती है। फिल्मांकन और संगीत की दृष्टि से भी फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार दिए जा सकते हैं।