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यदि आपके पास समय की कमी नहीं है और फालतू चीजें पढऩे के शौकीन है तो मुझे झेलने के लिए तैयार हो जाइए


Monday, 28 September 2009

ये दूरियां

आजकल कहानी लिखने का चस्का लगा है। कुछ समय पहले मैंने अपने गांव की पृष्ठभूमि को लेकर एक रियल स्टोरी लिखी थी। आज कुछ शहरी सीमा में अतिक्रमण करने का प्रयास कर रहा हूं। कह नहीं सकता कि शहरी युवा मन को किस हद तक समझ सका हूं, यह निर्णय आप पर छोड़ता हूं। ....फुर्सत हो तो आप भी कुछ मिनट भुगतें।

ये दूरियां
निखिल का रोम-रोम खुशी से झूम रहा था, शाम को ऑफिस से घर के लिए निकलने में नौ बज गए थे। यूं तो आठ बजे तक घर पहुंचना बहुत जरूरी होता था, क्योंकि इस वक्त के बाद घर पहुंचने पर उसके पापा इसे बच्चों में गलत संस्कार की नीति से देखते थे। पिताजी के संस्कार भी अजीब थे, सही कहें तो मेट्रो सिटी के लिहाज से इनमें मॉडर्नाइजेशन होना ही चाहिए था, ऐसा केवल निखिल की सोच कहती थी। भई, आठ बजे तो शाम होती है, इसके बाद ही शहर में रंगीनी और रोशनियों को देखने का मजा आता है। लेकिन निखिल को यह सब देखने की इजाजत नहीं थी। शाम आठ बजे तक ऑफिस से आकर खाना खाना और बाद में बीस-पच्चीस मिनट कम्प्यूटर पर वर्क करना, एक-दो घंटे मन लगा तो किसी किताब को पढऩा, फिर गहरी नींद सुबह छह बजे ही खुल पाती थी। दो घंटे अखबार पढऩा निखिल की रोज की आदत थी। और दीन-दुनिया की खबर रखने के लिए अखबार पढऩा जरूरी है, यह निखिल की बचपन से मान्यता थी, जो उसके पिताजी ने ही सिखाई थी। बात गुरुवार शाम की हो रही थी, जब निखिल को ऑफिस से निकलते-निकलते नौ बज गए थे। यूं तो सात बजे ही उसने अपना काम पूरा कर लिया था, लेकिन आज बात कुछ खास थी। वह एक एड एजेंसी में क्रिएटिव राइटिंग के जॉब पर था, जिसमें केवल चंद उम्दा और आकर्षित करने वाले शब्द लिखने के एवज में उसे कामचलाऊ मासिक सैलेरी मिलती थी। रोज की पढऩे की आदतों ने ही शायद उसे क्रिएटिव बना दिया था, उसे भी याद नहीं कि उसने प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों और वेदप्रकाश शर्मा जैसे थड़ी पर बिकने वाले राइटर्स के कितने नोवल्स पढ़ लिए थे। इसका असर उसकी क्रिएटिविटी पर भी था, शायद इसीलिए वह हर एड को नया क्रिएटिव मोड देता और बॉस हमेशा उसकी पीठ थपथपाता, लेकिन इसका असर कभी सैलेरी में देखने को नहीं मिला, क्योंकि सैलेरी पीठ थपथपाने की तुलना में उतनी अच्छी नहीं थी। फिर भी उसे अपने ऑफिस वर्क से कोई गिला नहीं था। आज जब उसने एक नई इम्पोर्टेड गाड़ी के खाडिय़ों में दौड़ते जैसे विज्ञापन को आखिरी टच दिया था तो घड़ी में केवल पौने सात बजे थे। लेकिन वह ऑफिस में रात नौ बजे तक रुका रहा।
पिछले कुछ महीनों से वह अपने ऑफिस के नीचे वाली फ्लोर पर एक मोबाइल कम्पनी में जॉब करने वाली लड़की पर फिदा था। इन मायनों में नहीं कि दिल हथेली पर रखकर कुछ दिन बाद कह दिया हो कि मैं तुम्हारे लिए चांद तोड़कर ला सकता हूं या तुम जैसी खूबसूरत तो कैटरीना कैफ भी नहीं है। इस तरह की लच्छेदार बातें करना तो उसे जैसे आता ही नहीं था। हां, कागज पर भले ही वह उन लच्छेदार बातों को हजार गुना बेहतर तरीके से अंजाम दे सकता हो, लेकिन लड़की के सामने पड़ते ही जैसे जीभ हकलाने लगती, गला सूखने लगता और क्रिएटिव माइंड से सोचने पर भी गिने-चुने शब्द ही निकल पाते थे। इस बात का अंदाजा उसे अब तक नहीं था कि लड़कियों से बात करते वक्त उसके साथ ऐसा क्यों होता था। पिछले तीन-चार माह से तनुजा से उसकी बात होने लगी थी। यूं उन दोनों के परिचय को सालभर का अरसा हो गया था, लेकिन यह परिचय कभी हाय-हल्लो के रूप में मुंडी हिलाने से आगे कभी नहीं बढ़ पाया था। लेकिन अब इसमें बदलाव दिख रहा था। पिछले तीन-चार महीने से उनमें ठीक-ठाक बात होने लगी थी। चार महीने पहले की बात है जब वह ऑफिस से निकल रहा था। उसी समय तनुजा से मुलाकात हो गई। निखिल आज बॉस के बिहेवियर से खफा था, उसने इतना अच्छा एड क्रिएट किया था, लेकिन क्लाइंट की ओर से कम्प्लेन आने के बाद बॉस ने उस एड को वाहियात करार दे दिया था। उसका मूड खराब था, सो लिफ्ट से नीचे आते वक्त भी चेहरा गुस्से से भरा हुआ था। एक फ्लोर नीचे जब लिफ्ट में तनुजा अंदर दाखिल हुई तो निखिल का गुस्सा भी कम हो गया। शायद वह तनुजा को अपनी कमजोरी दिखाना नहीं चाह रहा था, लेकिन वह इमोशनली बहुत कमजोर था और यदि कोई उसके साथ थोड़ी भी सुहानुभूति दिखाता तो पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देता। आज तनुजा ने भी बस ऐसे ही पूछ लिया कि मूड खराब क्यों है। फिर तो बस वह अपनी रामकहानी बयां करने लगा। लिफ्ट से नीचे आते ही पार्किंग में बीसियों मिनट अपनी प्रतिभा और बॉस की खामियों की डींग हांकता रहा। उसे यह भी ख्याल न रहा कि तनुजा उसकी बातों से बोर तो नहीं हो रही है। तनुजा ने जब उसे कुछ सुहानुभूति दिखाई तो वह निपट बालकों की तरह अपनी हर बात उसे बताने लगा। यह शायद निखिल का भरोसा था या तनुजा की सुहानुभूति कि अब वह अपनी बहुत सारी पर्सनल बातें भी तनुजा को बता देता। अब उनकी अक्सर फोन पर तो नहीं, लेकिन एसएमएस के जरिए बातें होतीं। बीच में एक बात तो भूल ही गए निखिल जितना रिजर्व किस्म का था, तनुजा उतनी ही चंचल। चंचल इस किस्म में नहीं कि हर किसी के साथ बातचीत करती हो या हर किसी से मुस्कराकर बात करती हो। तनुजा की चंचलता का दायरा भी कुछ लोगों के साथ तक सीमित था। वह जिनसे बात करती थी, उनमें चुनिंदा लोग ही शामिल होते थे। वह केवल कुछ लोगों के साथ ही हंस-मुस्कराकर बात करती थी। निखिल को आज तक समझ में नहीं आया कि तनुजा उससे बात कैसे कर लेती थी, क्योंकि खुद उसकी तो कभी भी आगे से बात करने की हिम्मत ही नहीं होती थी। तनुजा कुछ पूछ भी लेती तो एक बार सुनने पर तो वह सवाल ही नहीं समझ पाता और हड़बड़ाहट में कुछ भी नहीं बोल पाता था। हां, ये अलग बात थी कि तनुजा उसे बहुत समय से पसंद आ गई थी। तनुजा की निश्छल मुस्कान और सीधी साफ बातें उसे बहुत पसंद थीं। एसएमएस की बातें अब निखिल के दिल तक उतरने लगी थीं, वह अब मन ही मन शायद तनुजा को चाहने भी लगा था, लेकिन इस मामले में उसका स्वभाव उसका साथ नहीं दे रहा था। एसएमएस पर तो वह काफी बातें कर लेता, लेकिन अभी भी तनुजा के सामने कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं होती थी, कि पता नहीं कौंनसी बात तनुजा को बुरी लग जाए और वह उसकी बात का बुरा मानकर उससे बातचीत करना ही बंद कर दे। वह हमेशा यही सोचता कि किस तरह तनुजा को खुश रखे और किस प्रयास से तनुजा को खुशी मिलेगी। ऑफिस वर्क में भी उसका कम मन लगता, वह तो अब दिन-रात बस तनुजा के ख्वाबों में डूबा रहता। और आज तो कमाल ही हो गया था, जब तनुजा उसके साथ-साथ ऑफिस के नीचे से आधा किलोमीटर दूर तक घूमते हुए आ गई थी। इस वक्फे में उनके बीच एक-दूसरे की फैमिली और फ्रेंड्स के बारे में कई बातें हुई थी। इसलिए वह आज इतना खुश था। नौ बजे तक ऑफिस में ही बैठा रहा, खुशी इतनी ज्यादा थी कि न पापा की डांट की चिंता थी न ही मम्मी के बनाए हुए स्वादिष्ट खाने की। वह ऑफिस के नीचे पार्किंग में था कि राजन का फोन आ गया, बोला गुरुजी आज तो आ जाओ, निखिल इंकार न कर सका, वह चल पड़ा।
वह एक मयखाना था। मयखाना शब्द शायद पुराना हो गया है, आज की मेट्रो सिटी में अब ये नाम बार और पब में तब्दील हो गए हैं। बार में राजन और उसके दो दोस्त पहले ही मौजूद थे। बीयर मंगवाई गई। ऐसा नहीं था कि आज निखिल पहली बार बीयर पीने जा रहा था, पापा-मम्मी से चोरी-छुपे कई बार वह दोस्तों के साथ बीयर के घूंट लगा चुका था। बार में किसी परिचित के मिलने की संभावना हो सकती थी। एक बीयर के सिप लेते हुए उसने बीच में तीन सिगरेट भी फूंक दी थीं। राजन भी फुल मूड़ में था। राजन कुछ समय पहले एक कम्पनी में जॉब करता था, लेकिन आजकल खुद का कुछ बिजनेस खड़ा करने की फिराक में था। राजन पास के ही गांव का रहने वाला था और निखिल का अच्छा दोस्त था। लास्ट सिप लेते हुए पता चला कि वह पूरी एक बीयर पेट में उतार चुका है। दस बजे पापा का फोन आया तो झूठ बोल दिया कि प्रमोशन मिला है, इसलिए फ्रेंड्स के साथ पार्टी में है और आज घर नहीं लौट पाऊंगा। उस रात वह राजन के घर पर ही सोया। यह बीयर पीने की आदत अब जोर पकडऩे लगी थी और जो बीयर के घूंट वह साल में एक-दो बार लगाता था, वह आंकड़ा अब महीने में पूरा होने लगा था। पापा उसके घर न पहुंचने की आदत से परेशान हो चले थे, अक्सर घर नहीं आने पर रोज डांटते भी थे, लेकिन वह ऑफिस वर्क की वजह से लेट होने का बहाना बना देता। रात में राजन के घर सो जाने की बात कह देता। यह बहाने चल रहे थे, पापा सहन कर रहे थे। रात तीन बजे की बात थी, जब झपाक से निखिल की नींद उड़ गई थी, लाइट जलाकर देखी तो पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था। शायद उसने कोई बुरा ख्वाब देखा था। क्या देखा था, यह सोचने की जरूरत नहीं थी, उसे सपने की घटना पूरी तरह याद आ गई थी। वह साढ़े दस बजे सोया था। आज ख्वाब में उसने तनुजा को दुल्हन के रूप में देखा था। आज उसकी किसी और के साथ शादी हो रही थी, यह कल्पना करते ही जैसे निखिल का दिमाग फटने जैसी स्थिति में हो गया था। वह तनुजा की शादी की कल्पना भी नहीं कर सकता था।ऐसा नहीं है कि तनुजा उसकी बुरी आदतों से बिल्कुल अपरिचित थी। निखिल को भले ही यह खामख्याली रही हो। एक बार जब वह दोनों एक शादी के फंक्शन में मिले तो निखिल ताजा-ताजा बीयर के घूंट और सिगरेट फूंककर राजन के साथ शादी में पहुंचा था। शायद बातचीत के दौरान सिगरेट की बू या बीयर की बदबू का झोंका तनुजा की नाक तक पहुंच गया था कि तनुजा का हाथ स्वयमेव ही नाक पर पहुंच गया। तनुजा ने उस वक्त तो नहीं लेकिन अगले रोज ऑफिस में उसे चेताया कि ये आदतें अच्छी नहीं हैं। निखिल तनुजा से कितना प्यार करता है, शायद तनुजा इस बात से परिचित नहीं थी, लेकिन वह उसे अपना एक दोस्त मानने लगी थी। तनुजा की इस चेतावनी का बिल्कुल सीधा असर हुआ और उसी रोज निखिल ने बीयर और सिगरेट नहीं पीने की कसम ले ली। शायद निखिल ने इस बात को इस तरह लिया था कि तनुजा भी अब उससे ज्यादा नहीं तो कुछ-कुछ प्यार करने लगी है। अब उसके कदम जमीन पर नहीं, आसमान पर पहुंच गए थे। अब वह बिल्कुल बदल गया था। राजन के उकसाने पर भी बार की ओर उसके कदम नहीं उठते थे। अब वह अपनी पुरानी दिनचर्या में, एक शरीफ युवक बनने की प्रक्रिया में लौट रहा था। अब बीयर और सिगरेट से उसने दूरियां पैदा कर ली थीं। निखिल और तनुजा की दोस्ती सही ट्रेक पर चल रही थी कि दो महीने बाद तनुजा ने अपनी सगाई पक्की होने की सूचना निखिल को सुनाई। धरती में दरार पैदा होने की बातें तो शायद गलत होती हों, लेकिन निखिल यह एक वाक्य सुनते ही जड़वत रह गया था। तनुजा ने पूछा कि क्या हुआ तो, एक मिनट बाद वह कुछ सोच पाने की स्थिति में आ पाया था। तब उसने चकनाचूर दिल के साथ तनुजा को सगाई की बधाई दी। उसने हालांकि तनुजा को कभी प्रपोज नहीं किया था, और न ही कभी प्यार करने की बात बोली थी। लेकिन उसकी ख्वाबों की फेहरिस्त तनुजा को अपने घर दुल्हन के रूप में लाने तक पहुंच चुकी थी। वह अपने और तनुजा के भावी जीवन की बड़ी-बड़ी कल्पनाएं कर चुका था। ठीक पन्द्रह दिन बाद तनुजा की सगाई होनी थी। बीच के चौदह दिन निखिल का दिल कितने खून के आंसू रोया था, यह बयां कर पाना मुश्किल है। घर में गुमसुम रहना, ऑफिस में सिरदर्द की बात कहकर काम को टालना और हर वक्त अपनी गलतियों को कोसना। अब निखिल की रिजर्व किस्म और क्रिएटिव माइंड भी जैसे कुंद पडऩे लगे थे। सगाई के ठीक एक रोज पहले तनुजा ने फोन किया था कि उसे सगाई में जरूर आना है। वह सगाई के रोज घर में कमरे में ही बंद रहा। पता नहीं क्या-क्या सोचता रहा। वह सोच रहा था कि तनुजा ने उसका साथ क्यों छोड़ दिया, लेकिन असल में उनका साथ था ही कब, वे तो आपस में एक अच्छे मित्र ही बन पाए थे। उनके बीच शायद प्यार का रिश्ता तो अभी पनपा ही नहीं था। नहीं, निखिल ने इस विचार को झटक दिया, अगर ऐसा ही था तो क्यों निखिल का दिल दर्द से डूबा हुआ लग रहा था, क्यों तनुजा का चेहरा याद आते ही उसकी आंखें पलभर में गीली होने लगती हैं। उसे प्यार हुआ था, तनुजा को वह दिलोजान से चाहने लगा था, यहां तक कि तनुजा के साथ अपनी जिंदगी बसाने के लिए वह अपने संस्कारवादी परिवार के संस्कारों को भी तोड़ सकता था। वह अपने पापा और मम्मी की डांट, उनका गुस्सा, बड़े भैया की फटकार भी सहन कर सकता था। लेकिन शायद यह प्यार एकतरफा होकर रह गया था। उसने तनुजा को कभी अपनी बात समझाने की चेष्टा ही नहीं की थी। दो महीने बाद तनुजा की शादी हो गई। निखिल शादी में जाने की सोच भी नहीं सकता था। तनुजा की शादी के रोज भी उसने छुट्टी नहीं ली थी। उस रोज शाम आठ बजे जब वह ऑफिस से निकला तो सोच रहा था कि अब तनुजा के दरवाजे पर उसकी बारात आ गई होगी। इन दो महीनों में उसकी हालत दयनीय हो गई थी। वह ऑफिस से निकलकर पार्किंग में आया तो राजन का फोन आ गया। राजन कह रहा था, अरे गुरुजी आप तो याद ही नहीं करते, यहीं बार में बैठे हैं, मूड़ हो तो आप भी आ जाओ। निखिल ने फोन काट दिया, उसे तनुजा की चेतावनी याद आ रही थी। तनुजा की चेतावनी पर उसने अपने आपको बिल्कुल सुधार लिया था। उसे बीयर और सिगरेट से चिढ़ हो गई थी। तनुजा के लिए उसने खुद को बिल्कुल बदल लिया था। लेकिन आज तनुजा की शादी है। निखिल यह दर्द सहन नहीं कर पा रहा था। डेढ़ घंटे तक वह पार्किंग में इन्हीं बातों पर मनन करता रहा, आखिर दस बजे उसके कदम मयखाने की ओर उठने लगे थे, अब उसे पापा की डांट और तनुजा की चेतावनी बेमानी लग रही थी। उसके और शराब के बीच की दूरियां घट रही थीं और बढ़ गई थीं तनुजा और उसके बीच की दूरियां। प्यार के दर्द, शराब और सिगरेट के जंजाल में वह कितने दिन जी पाया, यह कह पाना मुश्किल है। कहानी लिखने से पहले मैंने भी इस कहानी के ऐसे क्लाइमेक्स की कल्पना नहीं की थी।
- एक बात आखिर में और कह दूं, लव आजकल फिल्म का गीत ये दूरियां मुझे बहुत पसंद आया है, कहानी का टाइटल इसी की उपज है। कहानी के बारे में यह भी याद रखें कि निखिल के पिता के रूप में मैं यदि ५० वर्ष की उम्र का रहा होता और मेरा फरजन्देआलम ऐसी आदतों का शिकार होता तो शायद उसके गम में मैं भी इस फानी दुनिया से रुख्सत हो गया होता। क्योंकि जालिम हम भी कम इमोशनल नहीं हैं इस दुनिया में।

Monday, 7 September 2009

शीशे की अयोध्या

तब मेरी उम्र बमुश्किल आठ या नौ बरस रही होगी, हमारे छोटे से गांव में एक मिडिल तक स्कूल था, बचपन में पढ़ाई करने कम, हम खेलकूद के लिए स्कूल अधिक जाते। कभी नीम, पीपल के पेड़ों पर चढ़कर लुकाछिपी खेलना तो कभी गुल्ली डंडा के खेल में फैसला नहीं होने पर एक दूसरे से झगड़ पडऩा। दोपहर में आधे घंटे के लिए स्कूल से छुट्टी मिलती तो रास्ते में धूल उड़ाते, एक दूसरे को टंगड़ी लगाते घर पहुंचते। मैं शाम को घर पर बड़े भैया के साथ रामायण पाठ करता, यही कोई एक-डेढ घंटे। रामायण के अंतिम कांड में रामराज्य का वर्णन था, मुझे भी अपने गांव का माहौल उस समय रामराज्य से कम नजर नहीं आता था। और मैं गांव को अयोध्या समझता।
... यह रोज की बात थी, हमारे घर के बड़े से आंगन में हमें एक हरिजन वृद्धा झाड़ू बुहारते हुए मिलती। उम्र यही कोई साठ वर्ष रही होगी, चेहरे पर घनी झुर्रियां और आगे से दांतविहीन पोपले होठों को खोलकर वह हंसते हुए हमारा स्वागत करतीं। अम्मा से रोटी की मांग करते मैं जब आंगन में उछलकूद मचाता, तो वह मुस्कुराते हुए कहतीं कि बेटा ज्यादा शैतानी नहीं करते। मैं रोटी खाता रहता और उनको झाड़ू बुहारते देखता रहता। इस मेहनत के बदले उन्हें हमारे घर से मिलती एक गेहूं की मोटी रोटी। यह हमारे घर की रीत नहीं, बल्कि गांव के सभी घरों से उन्हें झाड़ू के बदले एक-एक रोटी दी जाती। फिर भी वह खुश थीं।
कह नहीं सकता, लेकिन मुझे शुरू से ही उनसे कुछ लगाव हो गया। नाम था बादामी। मैं उन्हेंं अम्मा कहने लगा। हल्की झीनी पैबन्द लगी साड़ी और हाथ में झाड़ू लिए वह पूरे गांव का फेरा लगातीं। एक बात और उनके साथ गबरू कुत्ता होता। गधे से थोड़ा कम ऊंचाई का यह कुत्ता देखने में ही खतरनाक लगता, इसलिए गांव के लोग कुत्ते के नजदीक नहीं आते। मैं बादामी अम्मा का थोड़ा नजदीकी था, इसलिए गबरू मुझसे कुछ नहीं कहता था। इस बात से दूसरे बच्चों के बीच मेरी कुछ धाक जम गई थी। दूसरे बच्चों को मैं गबरू के नाम से उन्हें डरा भी देता था। इतनी समझ नहीं थी, फिर भी १५० घरों के छोटे गांव में सबसे परिचित हो गया था। बादामी अम्मा के सात बेटे थे।
ज्यादा कुछ काम तो उनका परिवार करता नहीं था। न तो गांव के दूसरे किसानों की तरह खेती का काम था, न ही कभी भेंस या गाय जैसे पशुओं का पालन करते थे। हरिजन होने के कारण गाय रखने पर तो शायद पूरा गांव उनके विरोध में उतर आता। मेरी अम्मा भी कैसे अक्सर मुझे डांटती थीं, जब मैं बादामी अम्मा को छू लेता। डांटते हुए हाथ के हाथ नहलाने की जिद करतीं, मैं रोने लगता तो पानी के छींटे मारकर मुझे पवित्र करतीं और फिर बादामी से दूर रहने को कहतीं। इसमें क्या रहस्य था, तब समझ नहीं आता था। और हां, एक बात और अक्सर मेरी बड़ी दीदी कहानी सुनातीं कि पहले बादल धरती पर बहुत नीचे थे। एक बार बादामी सिर पर कूड़े का टोकरा उठाए जा रही थीं। बादल कुछ ज्यादा नीचे हो गए, तो बादामी का टोकरा बादलों से अटक गया। बादामी को गुस्सा आया तो झाड़ू से बादल को पीटने लगीं, पिटाई के डर से बादल इतना ऊंचा हो गया कि फिर कभी धरती के नजदीक नहीं आया। कहानी सुनाते ही दीदी हंसने लगती और मैं बादामी अम्मा के इस चमत्कार का लोहा मानता कि बादामी अम्मा से तो बादल भी डरते हैं।
बादामी अम्मा का छठा बेटा सुनील मेरी ही क्लास में था। वह हरिजनों का पहला बच्चा था, जो स्कूल तक पहुंचने में कामयाब हुआ था, वरना उससे बड़े दूसरे बेटे तो सुअर, भेड़-बकरी ही चराते थे। बादामी अम्मा के पांच बेटों की शादी हो गई थी। इस बार जब उनके पांचवें बेटे की शादी हुई तो वो नई-नवेली बहू को लेकर पूरे गांव में झाड़ू लगाने आई। अब बादामी अम्मा को काम से राहत हुई, अब उन्हें झाड़ू लगाने और कूड़े का टोकरा उठाने से मुक्ति मिल गई थी। ऐसा शायद बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन मेरी अम्मा बतातीं थीं कि बादामी अम्मा की बड़ी बहुएं मेहनत नहीं करना चाहतीं, इसलिए वे बादामी अम्मा से अलग रहती हैं। ऐसा शायद दस दिन हुआ होगा जब बादामी अम्मा को झाड़ू नहीं लगाना पड़ा। ग्यारहवें दिन जब मैं स्कूल से इंटरवैल के टाइम पर घर पहुंचा तो बादामी अम्मा को फिर झाड़ू पकड़े पाया। आज अम्मा के साथ उनकी पांचवीं बहू भी नहीं थी, साथ था तो गबरू और झाड़ू। अब बादामी अम्मा को फिर से काम करना पड़ रहा था, पांचवा बेटा भी अब उनसे अलग हो गया था। लेकिन हमारे लिए बादामी अम्मा का वही प्यार बरकरार था। शायद बादामी अम्मा को काम करना अच्छा लगता था, इसलिए वह पूरे गांव का झाड़ू निकालने के बाद भी हंसती रहती थीं।
दिन गुजरते गए, मैं गांव के मिडिल स्कूल से पास होकर सैकण्डरी स्कूल में आ गया, चार साल बाद भी हालत जस के तस थे। बादामी अम्मा की दिनचर्या यथावत थी, वह रोज झाड़ू निकालतीं और गावं के हर घर से एक रोटी पातीं। मैं अब भी दिल से उनके नजदीक था। टाइम मिलने पर उनके गबरू के साथ खेलता, बादामी अम्मा अब भी मुझे दुलार करतीं। मेरी अम्मा के साथ अपने बेटे-बहुओं की बातें बतातीं, पर उन्हें शायद कोई गिला नहीं था। इन दिनों एक आश्चर्यजनक परिवर्तन मैं अपनी अम्मा में देख रहा था, अब जब मैं बादामी अम्मा के साथ खेलता तो वह मुझे डांटती नहीं थी। न ही कभी नहलाने की जिद करतीं। अब बादामी अम्मा के हाथ-पैर जवाब देने लग गए थे। कुछ दिन पहले उनके छठे बेटे सुनील, जो आठवीं क्लास तक मेरा क्लासमेट रहा था, की शादी हो गई थी। अब वह भी अपनी बीवी के साथ अलग रहने लग गया था।
पन्द्रह दिन की छुट्टियों के बाद वापस भाई साहब ने जयपुर बुला लिया अब डॉक्टरी में प्रवेश के लिए पीएमटी का एग्जाम देना था। मैं डॉक्टर तो नहीं बन पाया, लेकिन एक समाचार पत्र में संवाददाता हो गया था। गांव का जीवन भी जैसे एक बिसरी पृष्ठभूमि की तरह पीछे छूटने लगा था। पिताजी ने फोन कर गांव आने को कहा। चार दिन की छुट्टी थी। मैं गांव पहुंचा ही था, कि अम्मा ने सूचना दी, बेटा आज सुबह बादामी चल बसी। मैं एकाएक कुछ समझ न सका। लेकिन अभी तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। मेरे पूछने पर अम्मा ने बताया कि सभी बहुएं अलग रह रही थीं, हाथ-पांव भी साथ छोड़ गए थे। पिछले कुछ दिनों से झाड़ू लगाने भी नहीं आई। शायद बीमारी से मौत हो गई। एक बेटे ने चिता को मुखाग्नि दी। बादामी अम्मा अब सब कष्टों से दूर थीं। मेरे बचपन के गांव का रामराज्य और अयोध्या जैसा अनुभव अब पीछे छूट गया था। वह शायद शीशे की अयोध्या थी, जो अब चकनाचूर हो गई थी।