वे झुंझलाए हुए थे और चेहरे पर चिंता की कई लकीरें उभरी हुई थीं। सुबह से परेशान थे, पुलिसवालों को मात करती मोटी तोंद पर भी शायद माथे की शिकन का असर दिखने लगा था, सो वो भी अब सिकुडऩे लगी थी। आखिर क्या हो गया जो एक छोटी सी फिल्म देख ली, पहले भी तो मैडम के राज में बहुत सारी फिल्में देखी हैं और यूं ही नहीं जनाब, एक से एक मजे ले लेकर। हमने शहर के सबसे उम्दा और महंगे सिनेमाघर में फिल्म देखी, पिकनिक मनाई, पर पहले तो इतना हल्ला कभी नहीं हुआ। नेताजी के खफा चेहरे को देखकर कोई उनके नजदीक नहीं आना चाहता था, लेकिन एक छुटभैये कार्यकर्ता झिझकते सकुचाते सरककर करीब पहुंचे और कान में फुसफुसाकर बोले, सर सब ‘राज’ की बात है। अगर हमारा ‘राज’ होता तो एक ‘राजनीति’ के देख लेने से कौंनसा इतना हंगामा हो जाता। फिर चोरी-छुपे तो हिन्दुस्तान की ८० परसेंट जनता ऐसे ही हर छोटी-बड़ी फिल्म को देखती है, पिक्चर देखने के लिए पर्दे से तीन दिन पहले ही डीवीडी घर पहुंच जाती है, यूं तो किसी पर मुकदमा नहीं होता।
चार्ज क्या लगाया है ? पायरेटेड डीवीडी से पिक्चर देखी, नियमों का उल्लघंन किया, जानते-बूझते भी एक्ट का ध्यान नहीं रखा, इसलिए कम से कम तीन साल की सजा और दो लाख का जुर्माना। एक्ट का ध्यान नहीं रखा, अरे ऐसे क्या सारे एक्ट जुबानी याद रखें, यूं तो अदालत हर किसी को हर तरह का कानून सिखा देगी, फिर क्या सबको एलएलबी की डिग्री भी जारी करेगी। सर, वैसे एक बात कहें, कार्यकर्ता ने मौके की नजाकत समझी और अपनी वैल्यू बढ़ाने के लिए आइडिया सरका ही दिया, ये भी अगले चुनावी एजेंडे के लिए सही मुद्दा है। आखिर हर किसी को कानून की जानकारी तो होनी ही चाहिए। जब नीलेकनी सबके लिए यूनिक आइडेंटिटी का प्रचार कर सकते हैं और सरकार में बात चल भी रही है। तो हम भी इसे अपनी पार्टी का चुनावी मुद्दा बना सकते हैं कि कानून की जानकारी तो सबको रखनी ही पड़ेगी। एलएलबी डिग्री को अनिवार्य करवा दिया जाए। हम कहेंगे, जब सबको कानून पता होगा तो कोई अपराध ही नहीं करेगा और हमारा देश विश्व का एकमात्र अपराधमुक्त देश बन जाएगा।
उनकी गर्दन हिली, लेकिन अभी चिंता कुछ और थी, बोले अगले चुनाव तो अभी दूर हैं, पहले इसका हल तो सोचो, उपाय क्या है, वो तो एक ही दिखता है, फुसफुसाहट कुछ और धीमी हो गई। हम तो राज्यसभा के चुनाव करवा रहे हैं, हम कौंनसे घर-ग्रहस्थी का सामान यहां लेकर डटे हैं, यहां तो सब होटल वालों की माया से मौज हो रही है। मतलब समझकर, नेताजी ने सशंक भाव से नजरें फेरकर कार्यकर्ता को देखा, होटल वालों पर मंढ़ दें, कि उन्होंने ही नकली सीडी मुहैया कराई थी। अब सर, खी..खी.. करते कार्यकर्ता ने मुंह पर हाथ रखकर हंसी रोकने का असफल प्रयत्न करते हुए कहा, अब इस चुनाव में इतनी सी ‘राजनीति’ तो आपको भी करनी पड़ेगी। लेकिन यार, आइडिया तो हमारा ही था, इसमें बेचारे होटल वाले की क्या गलती ? सर, गलती के पीछे जाता कौंन है, वो तो जांच का मुद्दा है। नेताजी संतुष्ट से दिखे तो कार्यकर्ता को अगले चुनाव में अपना टिकट पक्का लगने लगा।
अब नेताजी की सांस वापस लौटने लगी है, तोंद भी राहत की मुद्रा में आ गई है। लेकिन, वे अब चोर नजरों से उसे ढूंढऩे में लगे हैं, जिन्होंने ये आइडिया सरकाया था, कि टाइम पास के लिए तो ‘राजनीति’ देखना सबसे अच्छी बात है...
Sunday, 27 June 2010
Subscribe to:
Comments (Atom)