Wednesday, 5 August 2009
आजकल का 'लव'
अभी ताजा-ताजा फिल्म देखी है, लव आजकल। फिल्म देखने जब सिनेमाहॉल पहुंचे, गलती हुई, जो सिनेमाघर कह दिया। ऐसा कैसा सिनेमाहॉल जहां दोपहर के शो का टिकट 140 रुपए में मिलता है। तीन बजे का 160 में, छह बजे का 170 में और नाइट शो का टिकट मांगा तो 180 रुपए देने पड़ेंगे। यहां टिकट की कीमत भी 'लवÓ की सांसों की तरह हर घंटे के हिसाब से बढ़ती है। फिल्म में भी कुछ ऐसा ही दिखाया है। पहली बाईलॉन के चुनिंदा घंटों में सिनेतारिका सितारे की बांहों में आ जाती है और फिर इसे किस में बदलते देर नहीं लगती। अब आप हमारी बात को पुरानी मानसिकता कहकर खारिज कर देंगे। रूढि़वादी विचारधारा का मानुष कह कर हमें अपशब्द कहने की बात भी दिमाग में ला रहे होंगे। आज के जमाने में किस कर लेना कौंनसा गलत है। चलिए नहीं कहते गलत, अभी थोड़ी देर और झेलिए, आपको भी रुढि़वादी विचारक साबित न कर दिया तो हमारा नाम बदल दीजिएगा। यूं लव के भी आजकल कई मायने हो गए हैं। जवां छोकरे की जुबां और धड़कन में हर दूसरी लड़की के लिए यह कशिश जोर मारती है। बाईलॉन के बाद चंद मिनटों की बातचीत जब कुछ टाइम चल जाए और मोहतरमा आपको एक मुस्कराहट दे दे तो जनाब को आई लव यू कहते देर नहीं लगती। फिर लव की पटरी दौड़ती है रेस्टोरेंट और कॉफी हाउस की ओर, डिस्कोथेक में अधनंगे नांच की ओर, कुछ कसर बाकी रह जाए तो 'पीनेÓ की स्थिति का फायदा उठाने की हो सकती है। फिर 21वीं सदी के खुलेपन का एक और फायदा देखिए, बाद में आपस में बता भी देते हैं कि लव के किन क्षणों में उन्होंने 'लवÓ किस-किस तरह से किया था। फिल्म देखते-देखते हमने कितने ही लोगों को इन डायलॉग्स पर खीसें निपोरते देखा था। फिर बारी आती है ब्रेक अप की और एक-दूसरे से दूर चले जाने की। नायक-नायिका में अभी भी लव के कीटाणु जोर मार रहे हैं, इसलिए मन की असली बात एक दूसरे को बताने की कोशिश कर रहे हैं। 65 के टाइम के वीर सिंह को एक ही बार में पता चल गया था कि उसे लव हो गया। नायक भी कोशिश कर रहा है, 15-16 बार में से एकाध बार का लव तो ध्यान आ जाए। पर नहीं आता ध्यान, आता है तो बर्बाद करके। गोल्डन गेट के सपने को चकनाचूर करके। ठहरिए, हम बीच में एक बात तो भूल ही गए। जब दोनों को लव का पता ही नहीं चलता तो नायिका एक दूसरे 'कबाब में हड्डीÓ से शादी कर लेती है। 'कबाब में हड्डीÓ की उपमा हमने नहीं दी, ये फख्र हमारी पीछे वाली सीट पर बैठे एक भाई साहब को हासिल हुआ। शादी करते वक्त भी अमर प्रेमियों को पता नहीं चलता कि कीटाणु अब विशाल बीमारी का रूप लेने वाले हैं, लेकिन ऐन हनीमून से पहले नायिका को 'असली लवÓ का पता चल जाता है। वह 'कबाब की हड्डीÓ को छोडऩे को तैयार हो जाती है और कहती है कि वह उसके साथ नहीं रह सकती। अब पीछे की सीट पर बैठे भाई साहब की सारी सहानुभूति 'कबाब की हड्डीÓ के साथ थी। वो अब नायिका को गालियां देने के मूड में थे। अब वे रुढि़वादी हो गए थे। अब उन्हें नायक-नायिका से मतलब नहीं था, वे चाहते थे कि नायिका 'कबाब की हड्डीÓ को ही अपना पति मान ले। क्यों साहब हैं न आप भी हमारी तरह रूढि़वादी, ये सीन तो आपको भी नहीं सुहा रहा होगा। चलिए छोडि़ए आप भी सोच रहे होंगे कहां से लिखकर कहां तक घसीट दिया। सच बताएं जब हम ये आर्टिकल लिख रहे थे, शायद हमारे चढ़ी हुई थी।अजी नहीं साहब दारू नहीं, लव की खुमारी!
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